प्रशांत महासागर में एक बहुत मजबूत अल नीनो बनने की प्रक्रिया तेज हो रही है. अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एक सैटेलाइट ने समुद्र की सतह पर बढ़ी हुई गर्मी को रिकॉर्ड किया है. नासा के सेंटिनल-6 माइकल फ्रेलिच सैटेलाइट से मिले डेटा से पता चला है कि भूमध्यरेखा के पास समुद्र का स्तर सामान्य से ज्यादा ऊंचा है. इसका मतलब है कि समुद्र के नीचे बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है.

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प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में जब तापमान सामान्य से ज्यादा हो जाता है और समुद्र की सतह ऊपर उठती है तो उसे अल नीनो कहा जाता है. अमेरिका की मौसम और समुद्र से जुड़ी एजेंसी NOAA ने 11 जून को अल नीनो की शुरुआत की जानकारी दी थी. समुद्र की सतह बढ़ने से यह भी समझ आता है कि नीचे कितनी गर्मी जमा है, क्योंकि गर्म पानी फैलता है और सतह ऊपर उठ जाती है.

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वैज्ञानिकों ने अल नीनो के बारे में क्या बताया?

वैज्ञानिकों ने बताया है कि पश्चिमी प्रशांत महासागर की स्थिति 1997 जैसे बड़े अल नीनो से मिलती-जुलती है. 1997 में एक बहुत शक्तिशाली अल नीनो हुआ था, जिसे गॉडजिला अल नीनो कहा गया था. अब वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नया अल नीनो लगातार मजबूत हो रहा है और आने वाले समय में यह बहुत बड़ा प्रभाव डाल सकता है. नासा की लैब ने सैटेलाइट डेटा से समुद्र का एक नक्शा भी बनाया है. इसमें 8 जून की स्थिति दिखाई गई है. इसमें लाल रंग उन जगहों को दिखाता है, जहां समुद्र का स्तर ज्यादा है, सफेद रंग सामान्य स्थिति और नीला रंग कम स्तर को दिखाता है. इसी सैटेलाइट ने पहले गर्म पानी की बड़ी लहरों (केल्विन वेव्स) को भी रिकॉर्ड किया था, जो समुद्र में सैकड़ों मील तक फैलती हैं.

भारत पर पड़ेगा अल नीनो का असर

इस अल नीनो का असर सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा. मौसम संगठनों का कहना है कि इससे कई देशों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहेगा. यह पिछले 150 सालों में सबसे मजबूत अल नीनो में से एक हो सकता है. इससे गर्मी बढ़ेगी और बारिश के पैटर्न में बदलाव आएगा. भारत पर भी इसका असर पड़ सकता है. पहले से ही गर्मी का असर देखने को मिल रहा है और अगर मानसून कमजोर हुआ तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है, जो लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की है.

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