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डोनाल्ड ट्रंप को तगड़ा झटका, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ पर सुनाया फैसला

ट्रंप ने भारत पर पहले 25 फीसदी टैरिफ लगाया था, जिसे बाद में रूसी तेल खरीद को लेकर 25% जुर्माना के रूप में बढ़ाकर 50 फीसदी कर दिया गया था. हालांकि ट्रेड डील के बाद इसे घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है.

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 फरवरी, 2026) को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका दिया है. शीर्ष अदालत ने ट्रंप की ओर से दूसरे देशों पर लगाए गए टैरिफ को गैरकानूनी बता दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इतने देशों पर टैरिफ लगाते समय ट्रंप ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया था. फैसले में कहा गया कि ट्रंप ने राष्ट्रीय आपात स्थितियों में उपयोग के लिए बनाए गए कानून के तहत टैरिफ लगाए थे.

अदालत के 6-3 के इस फैसले के अमेरिकी अर्थव्यवस्था, उपभोक्ताओं और राष्ट्रपति की व्यापार नीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे. ट्रंप प्रशासन ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में हार की स्थिति में सरकार को अन्य देशों के साथ किए गए व्यापार समझौतों को वापस लेना पड़ सकता है और आयातकों को भारी-भरकम रिफंड भी देना पड़ सकता है.

राष्ट्रपति नहीं, संसद को मिला है टैरिफ लगाने का अधिकार: US सुप्रीम कोर्ट

ट्रंप पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने 1970 के दशक के एक आपातकालीन कानून का हवाला देकर, जिसमें 'टैरिफ' शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है, बिना कांग्रेस की मंजूरी के एकतरफा रूप से टैरिफ लगाने का दावा किया. बहुमत की ओर से फैसला लिखते हुए मुख्य न्यायाधीश जॉन जी. रॉबर्ट्स जूनियर ने कहा कि यह कानून राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता.

मुख्य न्यायाधीश ने लिखा, 'राष्ट्रपति असीमित मात्रा, अवधि और दायरे में एकतरफा टैरिफ लगाने की असाधारण शक्ति का दावा करते हैं. इस दावे की व्यापकता, इतिहास और संवैधानिक संदर्भ को देखते हुए, उन्हें इसका प्रयोग करने के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति दिखानी होगी.'

जस्टिस क्लैरेंस थॉमस, सैमुअल ए. एलिटो जूनियर और ब्रेट एम. कैवनॉ ने इस फैसले से असहमति जताई.

ट्रंप ने 100 से ज्यादा देशों पर लगाए टैरिफ 

पिछले साल की शुरुआत में, उन्होंने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट का इस्तेमाल करते हुए 100 से अधिक देशों से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाए थे. उन्होंने कहा था कि उनका उद्देश्य व्यापार घाटे को कम करना और अमेरिका में विनिर्माण को बढ़ावा देना है. इसके बाद से उन्होंने इन टैरिफ का इस्तेमाल राजस्व बढ़ाने और व्यापार वार्ताओं में अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए किया.

ट्रंप के टैरिफ के खिलाफ कौन पहुंचा कोर्ट?

एक दर्जन राज्यों और छोटे व्यवसायों के एक समूह, जिनमें शैक्षिक खिलौने बनाने वाली एक कंपनी और एक वाइन आयातक शामिल हैं, ने इन टैरिफ के खिलाफ मुकदमा दायर किया. उनका कहना था कि राष्ट्रपति ने संविधान के तहत टैरिफ लगाने के कांग्रेस के अधिकार में अवैध रूप से दखल दिया है. आयातित वस्तुओं पर निर्भर इन व्यवसायों ने अदालत में दलील दी कि टैरिफ के कारण उनके कामकाज में बाधा आई, उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ीं और कर्मचारियों की संख्या में कटौती करनी पड़ी.

अदालत में दाखिल दस्तावेज़ों और सोशल मीडिया पोस्ट में राष्ट्रपति और उनके सलाहकारों ने सुप्रीम कोर्ट के इस मामले के नतीजे को उनकी व्यापार और विदेश नीति के लिए बेहद अहम बताया और यह स्पष्ट किया कि वे हार को व्यक्तिगत अपमान के रूप में देखेंगे. सॉलिसिटर जनरल ने न्यायाधीशों को चेतावनी दी थी कि यदि आपातकालीन शक्तियां नहीं रहीं, तो अर्थव्यवस्था को महामंदी जैसी तबाही झेलनी पड़ सकती है, इसके अलावा व्यापार वार्ताओं में रुकावट और कूटनीतिक शर्मिंदगी भी हो सकती है.

ट्रंप की ओर से क्या दी जाती है दलील?

हालांकि अदालत में कानूनी लड़ाई जारी थी, फिर भी राष्ट्रपति ने 1977 के कानून के विकल्प तलाशने शुरू कर दिए थे. ट्रंप के शीर्ष व्यापार वार्ताकार जेमिसन ग्रीयर ने पिछले महीने कहा था कि अदालत द्वारा अमान्य ठहराए गए किसी भी आपातकालीन टैरिफ की जगह प्रशासन तेजी से अन्य शुल्क लगाएगा. राष्ट्रपति पहले ही अन्य कानूनों के तहत भी टैरिफ लगा चुके हैं, जिनमें कुछ विशेष वस्तुओं और उद्योगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े शुल्क शामिल हैं. फिर भी, ऐसे अन्य कानून, जो राष्ट्रपति को शुल्क लगाने की अधिक स्पष्ट शक्ति देते हैं, आपातकालीन कानून की तुलना में अधिक सीमित और कम लचीले हैं.

ट्रंप ने पहले चीन, कनाडा और मैक्सिको पर लगाया था टैरिफ

ट्रंप ने शुरुआत में चीन, कनाडा और मेक्सिको से अमेरिका में आयात होने वाले सामान पर टैरिफ लगाए थे. उनका कहना था कि ये शुल्क इन देशों द्वारा फेंटानिल की तस्करी रोकने में विफल रहने की सजा के तौर पर लगाए गए हैं. अप्रैल में उन्होंने लगभग सभी व्यापारिक साझेदारों से आयात होने वाले सामान पर भी शुल्क बढ़ा दिए, यह कहते हुए कि ये दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ व्यापार घाटे को कम करने के लिए जरूरी हैं.

1970 के दशक के इस कानून के तहत, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात स्थिति के जवाब में 'किसी भी असामान्य और असाधारण खतरे' से निपटने के लिए कदम उठाने का अधिकार है, जो 'अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति या अर्थव्यवस्था' के लिए खतरा हो. इसमें विदेशी संपत्ति के 'आयात' को 'नियंत्रित' करने की शक्ति भी शामिल है. पूर्व राष्ट्रपति इस भाषा का इस्तेमाल अन्य देशों पर प्रतिबंध या नाकेबंदी लगाने के लिए करते रहे हैं, लेकिन टैरिफ लगाने के लिए नहीं. हालांकि, प्रशासन का तर्क है कि यही शब्दावली ट्रंप को टैरिफ लगाने का अधिकार भी देती है.

निचली अदालत ने 7-4 से सुनाया था फैसला 

प्रभावित व्यवसायों ने इसका विरोध करते हुए कहा कि 'नियंत्रित करना' शब्द का अर्थ टैरिफ लगाना नहीं हो सकता. इस कानून में 'टैरिफ', 'टैक्स' जैसे शब्द शामिल ही नहीं हैं. नवंबर में हुई मौखिक सुनवाई के दौरान, कई जजों ने ट्रंप प्रशासन के वकील से कड़े सवाल पूछे कि क्या कांग्रेस ने जानबूझकर राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ लगाने की शक्तियां सौंपी थीं, जबकि संविधान आम तौर पर यह अधिकार विधायिका के लिए सुरक्षित रखता है. 

तीन निचली अदालतों द्वारा टैरिफ को अवैध ठहराए जाने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. अगस्त में, अमेरिका की फेडरल सर्किट अपील अदालत ने 7-4 के फैसले में कहा कि आपातकालीन कानून इन व्यापक टैरिफ की अनुमति नहीं देता. हालांकि उसने यह तय करने से इनकार कर दिया कि क्या यह कानून ट्रंप को अधिक सीमित शुल्क लगाने की अनुमति दे सकता है. अपील अदालत के बहुमत ने कहा, 'जब भी कांग्रेस राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार देना चाहती है, वह ऐसा स्पष्ट रूप से करती है.'

पत्रकारिता के क्षेत्र में 12 साल से सक्रिय, सितंबर 2024 में ABP News के साथ जुड़े. विदेश मंत्रालय, संसद भवन, भारतीय राजनीति कवर करते हैं. यूपी की राजनीति को बहुत करीब से फॉलो करते हैं. ग्राउंड रिपोर्ट और स्पेशल स्टोरी पर फोकस. हाल ही में इजरायल वॉर डायरी पुस्तक भी लिखी है.
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