ईरान को पूरी तरह से तबाह करने की धमकी देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर बीते कुछ दिनों से बदल-बदले हैं. वह लगातार बातचीत की बात कह रहे हैं, जबकि ईरान हर बार ट्रंप के दावे को नकार रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका और इजरायल इस जंग में धीरे-धीरे अकेले पड़ते जा रहे हैं? 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए इस युद्ध की शुरुआत में अमेरिका-इजरायल की आक्रामक रणनीति दिखी, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. कई पारंपरिक सहयोगी देश खुलकर साथ नहीं दिख रहे और इससे जंग का समीकरण बदलता दिख रहा है.
इस पूरे संघर्ष में एक अहम बदलाव यह दिखा कि अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी देश खुलकर साथ नहीं आए. कई यूरोपीय देशों ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी, जबकि खाड़ी देशों ने भी सीमित समर्थन दिया. यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन की रणनीति पर सवाल उठने लगे. विशेषज्ञों का मानना है कि यह ओवर-एक्सटेंडेड कॉन्फ्लिक्ट बनता जा रहा है, जहां अमेरिका को कई मोर्चों पर एक साथ चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
इजरायल इस युद्ध में सक्रिय बना हुआ है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर उसे भी लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है. खासकर यमन और लेबनान से आने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों के रूप में. इस बीच, अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है. अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा बढ़ाई गई है, लेकिन इसके बावजूद यह साफ दिख रहा है कि यह युद्ध लंबा खिंच रहा है.
यूरोप ने जंग से क्यों दूरी बनाई?
ईरान युद्ध के दौरान सबसे बड़ा रणनीतिक सवाल यह उभरा कि यूरोप ने अमेरिका और इजरायल का खुलकर साथ क्यों नहीं दिया. पारंपरिक तौर पर ट्रांस-अटलांटिक सहयोग मजबूत माना जाता है, लेकिन इस बार तस्वीर अलग दिखी. युद्ध की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों से हुई. शुरुआती दिनों में यूरोपीय देशों ने चिंता जरूर जताई, लेकिन उन्होंने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी. विश्लेषकों के मुताबिक, इसके पीछे कई वजहें थीं. सबसे पहली वजह थी- युद्ध के विस्तार का खतरा. यूरोप पहले से ही यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है. ऐसे में मिडिल ईस्ट में नए सैन्य मोर्चे में शामिल होना उसके लिए जोखिम भरा था.
दूसरी अहम वजह कूटनीतिक संतुलन रही. फ्रांस, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों ने लगातार तनाव कम करने और बातचीत की जरूरत पर जोर दिया. उनका फोकस युद्ध में शामिल होने के बजाय 'डी-एस्केलेशन' पर रहा. तीसरी वजह आर्थिक हित भी हैं. यूरोप की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं. ऐसे में सीधे सैन्य पक्ष लेने से तेल और गैस आपूर्ति पर असर पड़ सकता था. इसके अलावा, घरेलू राजनीति भी एक बड़ा फैक्टर रही. कई यूरोपीय देशों में जनता युद्ध के खिलाफ रही है, जिससे सरकारों पर दबाव बना कि वे सैन्य कार्रवाई से दूर रहें.
यही कारण है कि यूरोप ने बयानबाजी और कूटनीतिक समर्थन तक खुद को सीमित रखा, लेकिन जमीनी स्तर पर अमेरिका और इजरायल को वह सैन्य सहयोग नहीं मिला जिसकी उन्हें उम्मीद थी. इस रुख ने साफ संकेत दिया कि बदलते वैश्विक हालात में अब हर सहयोगी हर युद्ध में साथ खड़ा हो यह जरूरी नहीं रह गया है.
डोनाल्ड ट्रंप का घर में ही हो रहा विरोध
ईरान युद्ध को लेकर जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं अमेरिका के भीतर भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है. युद्ध शुरू होने के बाद से ही देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन और राजनीतिक असहमति खुलकर सामने आई है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद जैसे ही संघर्ष बढ़ा, वैसे ही अमेरिका में युद्ध विरोधी आवाजें तेज हो गईं. न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, लॉस एंजेलिस जैसे बड़े शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे और नो वॉर के नारे लगाए.
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यह युद्ध अमेरिका को एक और लंबे और महंगे संघर्ष में धकेल सकता है. कई समूहों ने इसे अनावश्यक युद्ध बताया और सरकार से तुरंत संघर्ष विराम की मांग की. राजनीतिक स्तर पर भी ट्रंप को चुनौती का सामना करना पड़ा. विपक्षी नेताओं और कुछ डेमोक्रेट सांसदों ने इस सैन्य कार्रवाई पर सवाल उठाए और कांग्रेस की मंजूरी के बिना युद्ध शुरू करने को लेकर आलोचना की.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विरोध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक चिंताओं से भी जुड़ा है. अमेरिका पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में शामिल रहा है और जनता में वॉर फटीग यानी युद्ध से थकान साफ दिख रही है. इसके अलावा, बढ़ते रक्षा खर्च और संभावित आर्थिक दबाव भी लोगों की चिंता का कारण बने हैं. हालांकि ट्रंप प्रशासन ने अपनी रणनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है, लेकिन घरेलू विरोध ने यह संकेत दिया है कि इस युद्ध को लेकर अमेरिका के भीतर भी सहमति नहीं है.
इजरायल में भी मिलाजुला असर
ईरान युद्ध के बीच इजरायल के भीतर भी माहौल पूरी तरह एकतरफा नहीं है. जहां एक ओर सरकार युद्ध को सुरक्षा के लिए जरूरी बता रही है, वहीं दूसरी ओर देश के कई शहरों में जनता सड़कों पर उतरकर सवाल पूछ रही है. तेल अवीव, हाइफा और यरुशलम में बढ़ते एंटी-वॉर प्रदर्शन यह संकेत दे रहे हैं कि जंग के साथ-साथ घरेलू दबाव भी बढ़ रहा है. हाल के दिनों में इजरायल में एंटी-वॉर प्रदर्शन तेज हुए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेल अवीव में सैकड़ों लोग सड़कों पर उतरे और युद्ध खत्म करने की मांग की. कई जगह ये प्रदर्शन बिना अनुमति के हुए, जिन्हें पुलिस ने बलपूर्वक हटाया.
तेल अवीव और हाइफा में पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया. कुछ मामलों में प्रदर्शनकारियों को जमीन पर गिराकर हटाया गया और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. एक प्रदर्शनकारी ने कहा, 'कोई नहीं जानता कि इस युद्ध का लक्ष्य क्या है.' ये बयान जनता के बीच बढ़ती अनिश्चितता और नाराजगी को दर्शाता है. इन प्रदर्शनों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है. पहले जहां सीमित संख्या में लोग शामिल हो रहे थे, वहीं अब पूर्व सांसदों और सिविल सोसायटी समूहों जैसे Standing Together भी खुलकर सामने आ रहे हैं.
मल्टीपोलर वर्ल्ड- ग्लोबल पावर बैलेंस का नया रूप
28 फरवरी 2026 को ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. यह संघर्ष अब सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है. एक ओर अमेरिका और इजरायल की साझेदारी मजबूत दिखी, वहीं दूसरी ओर ईरान ने प्रॉक्सी नेटवर्क और क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए जवाबी ताकत दिखाई. इससे पारंपरिक सैन्य ताकत बनाम नेटवर्क आधारित युद्ध का नया मॉडल सामने आया.
यूरोप का सीमित रुख और खाड़ी देशों का संतुलन साधने वाला रवैया यह दिखाता है कि वैश्विक गठबंधन अब पहले जैसे स्पष्ट नहीं रहे. कई देश खुलकर पक्ष लेने के बजाय रणनीतिक दूरी बना रहे हैं. इस बीच, ऊर्जा मार्गों और समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे ने आर्थिक ताकत को भी इस समीकरण का अहम हिस्सा बना दिया है. कुल मिलाकर यह युद्ध एक मल्टी-पोलर दुनिया की ओर बढ़ते वैश्विक संतुलन का संकेत दे रहा है.
बड़े देशों ने खुलकर साथ क्यों नहीं दिया ईरान का साथ?
ईरान युद्ध के दौरान एक अहम पहलू यह भी सामने आया कि इतने बड़े संघर्ष के बावजूद ईरान को किसी बड़े देश का खुला और सीधा समर्थन नहीं मिला. चीन और रूस जैसे देश, जिन्हें अक्सर ईरान के करीब माना जाता है, उन्होंने भी सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखी. दोनों देशों ने बयान जरूर दिए और कूटनीतिक स्तर पर तनाव कम करने की अपील की, लेकिन जमीन पर ईरान के पक्ष में खुलकर नहीं उतरे. इसकी सबसे बड़ी वजह यह मानी जा रही है कि कोई भी बड़ा देश अमेरिका और इजरायल के साथ सीधे टकराव का जोखिम नहीं लेना चाहता.
चीन के लिए मिडिल ईस्ट ऊर्जा का अहम स्रोत है, इसलिए वह स्थिरता बनाए रखना चाहता है. वहीं रूस पहले से ही दूसरे मोर्चों पर उलझा हुआ है, जिससे उसके लिए इस युद्ध में सीधे शामिल होना मुश्किल था. इस स्थिति में ईरान ने मुख्य रूप से अपने प्रॉक्सी नेटवर्क और स्वदेशी सैन्य क्षमता पर भरोसा किया.
