BRICS शिखर सम्मेलन में भारत सभी अहम मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है. भारत की कोशिश है कि सम्मेलन के आखिर में सभी देशों की सहमति से एक संयुक्त बयान जारी किया जाए. हालांकि, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष इस कोशिश के सामने बड़ी चुनौती बन सकता है.

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सूत्रों के मुताबिक, भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी अध्यक्षता में BRICS को अमेरिका या पश्चिमी देशों के खिलाफ एक मंच के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए. यही वजह है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर संयुक्त बयान में इस्तेमाल होने वाली भाषा पर भारत खास सावधानी बरत रहा है.

ईरान उठा सकता है अमेरिका-इजरायल के हमलों का मुद्दा

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बैठक में ईरान पश्चिम एशिया के मौजूदा संघर्ष का मुद्दा उठा सकता है और अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई की निंदा की मांग कर सकता है. ईरान इससे जुड़े मुद्दों पर BRICS के दूसरे सदस्य देशों का समर्थन भी मांग सकता है. दूसरी ओर, ईरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर भी अपनी जमीन का इस्तेमाल उसके खिलाफ किए जाने का आरोप लगाता रहा है.

ऐसे में BRICS के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग देशों के रुख सामने आ सकते हैं. चीन और रूस जैसे प्रमुख BRICS सदस्य ईरान के करीब माने जाते हैं, इसलिए भारत के लिए सभी देशों को एक साझा भाषा पर सहमत कराना आसान नहीं होगा.

संयुक्त बयान पर सहमति नहीं बनी तो क्या होगा?

अगर पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बनती है तो BRICS का संयुक्त बयान जारी करने में मुश्किल आ सकती है. ऐसी स्थिति में सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहा देश अलग से चेयर समरी जारी कर सकता है. पहले भी BRICS के विदेश मंत्रियों की बैठक में कुछ मुद्दों पर आम सहमति नहीं बनने के कारण इसी तरह की स्थिति पैदा हो चुकी है.

अमेरिका के खिलाफ बयान से बचना चाहता है भारत

भारत-अमेरिका संबंधों के मौजूदा दौर को देखते हुए नई दिल्ली नहीं चाहता कि भारत की अध्यक्षता वाले BRICS मंच से अमेरिका के खिलाफ सीधा निंदा प्रस्ताव सामने आए. सूत्रों के अनुसार, भारत ने कूटनीतिक माध्यमों से दूसरे सदस्य देशों को अपनी स्थिति से अवगत कराया है.

भारत की कोशिश है कि पश्चिम एशिया के संघर्ष का जिक्र संयुक्त बयान में हो, लेकिन भाषा ऐसी हो जिस पर सभी सदस्य देश सहमत हो सकें. यही वजह है कि सम्मेलन में शब्दों के चयन पर भी काफी ध्यान दिया जा रहा है.

डॉलर का मुद्दा भी बढ़ा सकता है भारत का दबाव

भारत के सामने चुनौती सिर्फ पश्चिम एशिया के संघर्ष तक सीमित नहीं है. BRICS देशों के बीच डॉलर पर निर्भरता कम करने और आपसी व्यापार को बढ़ाने की चर्चा भी लंबे समय से चल रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप BRICS देशों को कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि वे अमेरिकी डॉलर को कमजोर करने वाली किसी पहल से दूर रहें.

BRICS देशों के बीच व्यापार बढ़ रहा है और कई सदस्य देश आपसी कारोबार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं. सम्मेलन में इस दिशा में कोई नई पहल सामने आती है तो इससे अमेरिका की चिंता बढ़ सकती है.