एक्सप्लोरर

Afghanistan-Pakistan Conflict: अंग्रेजों की वो गलती, जिसकी वजह से पाकिस्तान से भिड़ गया तालिबान!

पहले अंग्रेज-अफगान युद्ध में हारने के करीब 36 साल बाद अंग्रेजों ने एक और कोशिश की. 1878 में अंग्रेजों ने फिर से अफगानिस्तान पर हमला किया और इस बार अंग्रेज फतह हासिल करने में कामयाब रहे.

अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज आतंकी संगठन तालिबान अब पाकिस्तान पर कब्जा करने का मन बना चुका है. पाकिस्तान की एक सैन्य चौकी पर तालिबानी आतंकियों का कब्जा भी हो चुका है. अब वो धीरे-धीरे करके पाकिस्तान में दाखिल हो रहे हैं, लेकिन जो पाकिस्तान आतंकियों का सबसे बड़ा मसीहा रहा है और जो अफगानिस्तान आतंकियों का सबसे बड़ा ट्रेनिंग सेंटर रहा है, उनके बीच ऐसी नौबत आखिर आई क्यों. जिन दो देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता रहा हो, गोला-बारूद-हथियार-आतंकी, जब जिसको जिसकी जरूरत पड़ी, दूसरे देश ने उसे पूरा किया, उनके बीच ऐसा क्या हुआ है कि दोनों ही एक दूसरे का अस्तित्व खत्म कर देना चाहते हैं. आखिर अफगानिस्तान के बनाए तालिबान को पाकिस्तान से इतनी नफरत क्यों हो गई है और इस नफरत के लिए क्यों वो अंग्रेज जिम्मेदार हैं, जिन्होंने करीब 130 साल पहले ही इस दुश्मनी की नींव रख दी थी. आज बात करेंगे विस्तार से.

14 अगस्त, 1947 को जब धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान नया देश बना तो उसे विरासत में अफगानिस्तान से लगती सीमा रेखा मिली. इसे कहा जाता है डूरंड लाइन. 2670 किमी लंबी इस सीमा रेखा का एक सिरा चीन से मिलता है और दूसरा ईरान से. यही डूरंड लाइन अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की लड़ाई की असल वजह है, जिसका इतिहास करीब 130 साल पुराना है. तब भारत पर अंग्रेजों का शासन था और शासन का विस्तार करने के क्रम में अंग्रेजों ने साल 1839 में अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. तब कहा जाता था कि अंग्रेजी राज में कभी सूरज डूबता नहीं है, लेकिन अफगानिस्तान में अंग्रेजों का सपना टूट गया. जंग में शुरुआती कामयाबी के करीब दो साल बाद अफगानी सेनाओं ने अंग्रेजी सेना को मात दे दी और अंग्रेजों को अफगानिस्तान से खाली हाथ लौटना पड़ा.

अंग्रेजों ने हार नहीं मानी. पहले अंग्रेज-अफगान युद्ध में हारने के करीब 36 साल बाद अंग्रेजों ने एक और कोशिश की. 1878 में अंग्रेजों ने फिर से अफगानिस्तान पर हमला किया और इस बार अंग्रेज फतह हासिल करने में कामयाब रहे. इतिहास की किताबों में इसे दूसरे एंग्लो-अफगान वॉर के रूप में दर्ज किया गया. इस जंग को जीतने के बाद अंग्रेजों की ओर से सर लुईस कावानगरी और अफगानिस्तान की ओर से किंग मोहम्मद याकूब खान के बीच एक संधि हुई, जिसे गंदमक की संधि कहा गया. चंद दिनों के अंदर ही मोहम्मद याकूब खान ने इस संधि को मानने से इनकार कर दिया. उसने दोबारा पूरे अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमाना चाहा और नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजों ने पलटवार किया. कंधार में जमकर जंग हुई, जिसमें अंग्रेज फिर से जीत गए. इसके बाद अंग्रेजों ने अपनी पसंद के अब्दुल रहमान खान को शासक बना दिया और नए सिरे से गंदमक की संधि की, जिसमें तय हुआ कि अब अंग्रेज अफगानिस्तान के किसी हिस्से पर हमला नहीं करेंगे.

इस संधि के बाद ब्रिटिश इंडिया की सरकार ने एक अंग्रेज अधिकारी मॉर्टिमर डूरंड को 1893 में काबुल भेजा ताकि वहां पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार के साथ ही सांस्कृतिक, आर्थिक, मिलिट्री और राजनीति के स्तर पर अफगानिस्तान के शासक अब्दुल रहमान खान के साथ एक समझौता किया जा सके. 12 नवंबर, 1893 को ब्रिटिश इंडिया और अफगानिस्तान के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण किया गया. दोनों ओर के अधिकारी अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत के पास बने पाराचिनार शहर में बैठे और दोनों देशों के बीच नक्शे पर एक लकीर खींच दी गई. इसी लाइन को कहा जाता है डूरंड लाइन. इस लाइन के जरिए एक नए प्रांत नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस को बनाया गया, जिसे आम तौर पर खैबर पख्तूनख्वा कहते हैं. ये हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के पास आ गया. इसके अलावा फाटा यानी कि फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्राइबल एरियाज और फ्रंटियर रिजंस भी ब्रिटिश इंडिया के ही पास आ गए, जबकि नूरिस्तान और वखान अफगानिस्तान के पास चले गए.

इस बंटवारे के साथ ही एक जातीय समूह का भी बंटवारा हुआ. ये समूह था पश्तून का, जो डूरंड लाइन के पास रहते थे. लाइन खींचने की वजह से आधे से ज्यादा पश्तून ब्रिटिश इंडिया में रह गए और बाकी के अफगानिस्तान में चले गए. एक और भी जातीय समूह था जो ब्रिटिश इंडिया वाले हिस्से में था और ये समूह था पंजाबियों का. पश्तून और पंजाबी हमेशा एक दूसरे से लड़ते रहते थे, लेकिन लाइन खिंचने की वजह से पश्तून कमजोर पड़ गए क्योंकि उनकी ताकत अफगानिस्तान में चली गई. अफगानिस्तान में गए यही पश्तून ऐसे लड़ाके बन गए, जिन्होंने ब्रिटिश इंडिया की आर्मी में बहुतायत में भर्ती हुए पंजाबियों के खिलाफ हमले शुरू कर दिए.

बंटवारे के बाद हुआ ये कि अंग्रेजों ने तो अपने हिस्से के प्रातों को रेलवे से जोड़ना शुरू किया, वहीं अफगानिस्तान के पास जो नूरिस्तान गया था, उनके लोगों को अफगानिस्तान के शासक अब्दुल रहमान खान ने जबरन मुस्लिम बना दिया. ब्रिटिश इंडिया और अफगान शासकों के बीच ये समझौता ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाया. मई 1919 में ब्रिटिश इंडिया ने अफगानिस्तान पर फिर से हमला कर दिया, जिसे इतिहास में थर्ड एंग्लो-अफगान वॉर के रूप में जाना जाता है. इस जंग को खत्म करने के लिए 8 अगस्त 1919 को ब्रिटिश साम्राज्य और अफगानिस्तान के बीच रावलपिंडी में एक समझौता हुआ और तय हुआ कि ब्रिटिश साम्राज्य अफगानिस्तान को एक स्वतंत्र देश की मान्यता देगा, जबकि अफगानिस्तान डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा मानेगा.

14-15 अगस्त, 1947 के बाद स्थितियां एक बार फिर से बदल गईं. भारत आजाद हुआ और पाकिस्तान एक नया मुल्क बन गया. अब आजादी के साथ ही पाकिस्तान को विरासत में ये डूरंड लाइन मिल गई, जो पाकिस्तान को अफगानिस्तान से अलग करती थी. इस दौरान सबसे ज्यादा मुश्किलें आईं पश्तून लोगों को, जो अफगानिस्तान से सटी सीमा पर रहते थे. उनके साथ दिक्कत ये थी कि डूरंड लाइन खींचे जाने के वक्त ही उनके परिवार इस कदर बंट गए थे कि कुछ लोग अफगानिस्तान में चले गए थे और कुछ पाकिस्तान में रह गए थे. इसको लेकर दोनों देशों के बीच लगातार मतभेद बने रहे. इस बीच अफगानिस्तान की ओर से डूरंड लाइन के पास फायरिंग कर दी गई. नए-नवेले बने पाकिस्तान ने इस फायरिंग का जवाब एयरफोर्स को भेजकर दिया और पाकिस्तानी एयरफोर्स ने डूरंड लाइन के पास बने अफगानिस्तान के एक गांव पर हवाई हमला कर दिया. 26 जुलाई, 1949 को हुए इस हमले के बाद अफगानिस्तान ने ऐलान कर दिया कि वो डूरंड लाइन को नहीं मानता है.

फिर ब्रिटेन ने हस्तक्षेप किया. जून 1950 में ब्रिटेन की ओर से साफ कर दिया गया कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की सीमा रेखा तो डूरंड लाइन ही होगी, लेकिन ये मसला कभी सुलझ नहीं सका. पाकिस्तान और अफगानिस्तान इस मुद्दे पर अक्सर भिड़ते ही रहे. फिर 1976 में अफगानिस्तान के शासक सरदार मोहम्मद दाऊद खान पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के आधिकारिक दौरे पर गए. वहां उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा के तौर पर मान्यता देता है.

फिर पाकिस्तान-अफगानिस्तान के रिश्ते सुलझ गए. दोनों के बीच दोस्ती हो गई और इतनी गाढ़ी दोस्ती हुई कि जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजीं तो सोवियत सेनाओं से लड़ने के लिए पाकिस्तान ने अपने लड़ाकों को अफगानिस्तान की सीमा पर तैनात कर दिया. पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने भी अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की शह पर मुजाहिदिनों को लड़ने के लिए अफगानिस्तान भेज दिया. फिर जब अफगानिस्तान में थोड़ी शांति बहाली हुई और अमेरिका-रूस के वहां से निकलने के बाद जंग की नौबत नहीं रही तो अफगानिस्तान के मुजाहिदीन भारत के खिलाफ पाकिस्तान की भी मदद करने आ गए.

जब 1996 में अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हुआ तो तालिबान ने फिर से डूरंड लाइन का विरोध कर दिया. तालिबान का कहना था कि दो इस्लामिक देशों के बीच में किसी सीमा रेखा की जरूरत ही नहीं है और जो मामला करीब 20 साल से शांत था, वो अचानक से फिर से तूल पकड़ने लगा. इतना ही नहीं, जब अमेरिका ने अफगानिस्तान को तालिबान के कब्जे से छुड़ाया और हामिद करजई को नया राष्ट्रपति बनाया तो हामिद करजई ने भी इस डूरंड लाइन को मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि हामिद करजई खुद भी एक पश्तून हैं. हामिद करजई ने कहा कि ये डूरंड लाइन दो भाइयों के बीच नफरत की दीवार है. हामिद करजई के अफगानिस्तान की सत्ता से बेदखल होने के बाद फिर से अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा है. तालिबान अपने पुराने रवैये पर कायम है कि वो डूरंड लाइन को मानता ही नहीं है. नतीजा ये है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है.

अगर दुनिया की सबसे खतरनाक जगहों की लिस्ट बनाई जाती है तो अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बीच खींची ये डूरंड लाइन हमेशा उस लिस्ट का हिस्सा होती है क्योंकि यहां पर कब क्या हो जाए, कब बम धमाके शुरू हो जाएं, कब गोली-बारी होने लगे, किसी को नहीं पता है. डूरंड लाइन के पास रहने वालों की ये नियति है कि उन्हें हमेशा मौत के खौफ के बीच जिंदगी की तलाश करनी होती है. इस खौफ को कम करने और अफगानिस्तान के हमलों से खुद को बचाने के लिए पाकिस्तान ने साल 2017 में इस डूरंड लाइन पर फेंसिंग करनी शुरू की थी, जो अब लगभग पूरी होने वाली है, लेकिन अफगानिस्तान और खास तौर से अफगानिस्तान में बॉर्डर इलाके में रहने वाले पश्तून ने पाकिस्तान की इस फेंसिंग का हमेशा से विरोध किया है.

15 अगस्त 2021 को जब से तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता दोबारा हासिल की, इस डूरंड लाइन को लेकर दोनों देशों के बीच का टकराव और बढ़ गया. बाकी की कसर पूरी कर दी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने. तो अब दोनों ही तालिबान यानी कि अफगानिस्तान वाला तालिबान और पाकिस्तान वाला तालिबान मिलकर पाकिस्तान पर कब्जा करना चाहते हैं, क्योंकि पाकिस्तान के खिलाफ दोनों की भाषा और दोनों का मकसद एक है. अफगानी तालिबान भी यही कहता है कि डूरंड लाइन गलत है और पाकिस्तान पश्तून लोगों पर अपनी हुकूमत चला रहा है. टीटीपी का भी कार्यक्षेत्र डूरंड लाइन के पास वाला ही इलाका है और वो भी यही कहता है कि डूरंड लाइन के पास खैबर पख्तूनख्वा में उसका शासन चलेगा और पाकिस्तानी आर्मी को यहां से हटना होगा.

कुल मिलाकर जब बात सिर्फ इस्लाम की आती है तो ये दोनों देश और इनके आतंकी भले ही दुनिया के खिलाफ एक दिखते हैं और दुनिया के तमाम देशों के खिलाफ एकजुट होकर आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं, लेकिन बात जब खुद की आती है तो ये दोनों देश और इनके शासक असल में एक दूसरे के खिलाफ ही रहते हैं, जिसके मूल में अंग्रेजों के जमाने की खींची गई वो लाइन है, जिसे डूरंड लाइन कहते हैं.

 

यह भी पढ़ें:-
सिर्फ एक महीने में निमिषा प्रिया को हो सकती है फांसी, क्या कतर की तरह यमन में भी इंडियन नर्स को मृत्युदंड से बचा पाएगी भारत सरकार?

और पढ़ें
Sponsored Links by Taboola

टॉप हेडलाइंस

Iran-US War: जंग रुकवाएगा रूस! ईरान को बड़ा ऑफर! पुतिन के मंत्री और अराघची के बीच फोन पर हुई बात, जानें
जंग रुकवाएगा रूस! ईरान को बड़ा ऑफर! पुतिन के मंत्री और अराघची के बीच फोन पर हुई बात, जानें
US Israel Iran War Live: इस्लामाबाद पीस टॉक में शामिल होगा ईरान, अमेरिका की तरफ से जेडी वेंस करेंगे बात, तेहरान के एयरपोर्ट फिर खुले
Live: इस्लामाबाद पीस टॉक में शामिल होगा ईरान, अमेरिका की तरफ से जेडी वेंस करेंगे बात, तेहरान के एयरपोर्ट फिर खुले
कृपाण, चाकू और गन.... जर्मनी के गुरुद्वारे में हुई खूनी झड़प में 11 लोग घायल, क्या है पूरा मामला
कृपाण, चाकू और गन.... जर्मनी के गुरुद्वारे में हुई खूनी झड़प में 11 लोग घायल, क्या है पूरा मामला
Iran-US War: भारतीय टैंकर पर फायरिंग के बाद चीन ने ऐसा क्या कहा, जिसकी हो रही चर्चा, चौंक जाएंगे ट्रंप
भारतीय टैंकर पर फायरिंग के बाद चीन ने ऐसा क्या कहा, जिसकी हो रही चर्चा, चौंक जाएंगे ट्रंप

वीडियोज

Bollywood: क्या कपूर खानदान में फिर आएगी खुशखबरी? | Khabar Filmy Hain | Alia Bhatt
Sansani: इंटरनेशनल मंच पर... ट्रंप को खुला चैलेंज ! | Iran-israel war update
Chitra Tripathi: ईरान का 'मालिक' कौन? | Trump | Hormuz | China | Netanyahu | Breaking
Prayagraj Viral Video: क्या रसूख के नशे में चूर इन थार सवारों पर लगेगी लगाम? | UP | Breaking
Pratima Mishra: शांति का शिप डूबा, होर्मुज में संकट गहराया! | Bharat Ki Baat | Iran US Israel War

फोटो गैलरी

Petrol Price Today
₹ 94.77 / litre
New Delhi
Diesel Price Today
₹ 87.67 / litre
New Delhi

Source: IOCL

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
नेपाल ने भारतीयों को दिया तगड़ा झटका, कस्टम ड्यूटी बढ़ाई, अब इतने रुपए से ज्यादा पर भरना पड़ेगा टैक्स
नेपाल ने भारतीयों को दिया तगड़ा झटका, कस्टम ड्यूटी बढ़ाई, अब इतने रुपए से ज्यादा पर भरना पड़ेगा टैक्स
बिहार में भीषण गर्मी से लोग परेशान, पटना में स्कूलों का बदला समय, DM ने जारी किया निर्देश
बिहार में भीषण गर्मी से लोग परेशान, पटना में स्कूलों का बदला समय, DM ने जारी किया निर्देश
'ईरान के साथ युद्ध में हम जीत रहे हैं...' इस्लामाबाद पीस टॉक से पहले ट्रंप का बड़ा दावा, किसे कहा गद्दार
'ईरान के साथ युद्ध में हम जीत रहे हैं...' इस्लामाबाद पीस टॉक से पहले ट्रंप का बड़ा दावा, किसे कहा गद्दार
Tilak Varma Century: सबसे तेज शतक... तिलक वर्मा ने रचा इतिहास; 101 रन बनाकर इन रिकॉर्ड्स की उड़ाई धज्जियां
सबसे तेज शतक... तिलक वर्मा ने रचा इतिहास; 101 रन बनाकर इन रिकॉर्ड्स की उड़ाई धज्जियां
Dhurandhar 2 BO Day 33: 'भूत बंगला' के आगे भी ‘धुरंधर 2’ का क्रेज नहीं हो रहा कम, 5वें मंडे छाप डालें करोड़ों, होश उड़ा देगा 33 दिनों का कलेक्शन
'भूत बंगला' के आगे भी ‘धुरंधर 2’ का क्रेज नहीं हो रहा कम, 5वें मंडे छाप डालें करोड़ों
Iran-US War: जंग रुकवाएगा रूस! ईरान को बड़ा ऑफर! पुतिन के मंत्री और अराघची के बीच फोन पर हुई बात, जानें
जंग रुकवाएगा रूस! ईरान को बड़ा ऑफर! पुतिन के मंत्री और अराघची के बीच फोन पर हुई बात, जानें
SBI ग्राहक सावधान! ये खतरनाक मैसेज मिनटों में खाली कर देगा अकाउंट, ऐसे बचें इस ऑनलाइन स्कैम से
SBI ग्राहक सावधान! ये खतरनाक मैसेज मिनटों में खाली कर देगा अकाउंट, ऐसे बचें इस ऑनलाइन स्कैम से
Jammu-Kashmir Pahalgam Baisaran Valley Tourism : क्या अब बैसरन घाटी नहीं जा सकते टूरिस्ट, जानें पहलगाम हमले के एक साल बाद कैसे हैं हालात?
क्या अब बैसरन घाटी नहीं जा सकते टूरिस्ट, जानें पहलगाम हमले के एक साल बाद कैसे हैं हालात?
Embed widget