US Iran Peace Deal: युद्ध का आगाज होते ही दुनिया को लगा था कि ईरान ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, तस्वीर बिल्कुल उलट होती चली गई. जंग के मैदान में ईरान न सिर्फ मजबूती से खड़ा रहा, बल्कि कूटनीति के मोर्चे पर भी उसने खुद को एक ताकतवर खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर दिया. उसने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद अगर रणनीति लंबी हो, आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता मजबूत हो और राजनीतिक इच्छाशक्ति अडिग हो, तो बड़ी से बड़ी ताकत को भी बातचीत की मेज तक लाया जा सकता है.

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ईरान की असली ताकत उसकी मिसाइलें नहीं थीं, बल्कि उसका स्पष्ट संदेश था- हम प्रतिबंध झेलेंगे, हमले सहेंगे, लेकिन अपनी संप्रभुता और रणनीतिक पहचान से समझौता नहीं करेंगे. यही वजह रही कि अंततः अमेरिका को भी बातचीत की राह चुननी पड़ी और शांति समझौते पर सहमति बनानी पड़ी. यह समझौता फ्रांस के ऐतिहासिक पैलेस ऑफ वर्साय में हुआ, जो अपने आप में इतिहास का गवाह रहा है. वही वर्साय, जहां 107 साल पहले प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी पर कठोर और अपमानजनक शर्तें थोपी गई थीं, अब एक नए वैश्विक समीकरण का मंच बना.

डील टेबल से नेतन्याहू की गैर-मौजूदगी

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसी महल में बैठकर इस डील पर हस्ताक्षर किए, लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी—यहां कोई एक पक्ष पूरी तरह विजेता या पराजित नहीं था, बल्कि संतुलन की कोशिश दिख रही थी. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में इजरायल की गैरमौजूदगी ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए. खासकर तब, जब युद्ध की शुरुआत में इजरायल की भूमिका अहम मानी जा रही थी, लेकिन अंतिम समझौते में उसे जगह नहीं मिली. वर्साय का इतिहास इस संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

1919 की वर्साय संधि ने जर्मनी पर ऐसी शर्तें थोपी थीं, जिसने वहां अपमान और बदले की भावना को जन्म दिया. जमीन का नुकसान, सेना पर प्रतिबंध, आर्थिक जुर्माना, इन सबने जर्मनी को अंदर से झकझोर दिया और यही माहौल आगे चलकर एडोल्फ हिटलर के उदय का कारण बना. इतिहास गवाह है कि उस संधि ने शांति नहीं, बल्कि दूसरे विश्व युद्ध की नींव रखी थी. यही वजह है कि आज जब वर्साय में एक और बड़ी डील हुई है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस बार भी कोई ऐसा ही असंतुलन भविष्य में नए तनाव को जन्म देगा.

परिस्थितियां बदलने के संकेत

मौजूदा परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो यह समझौता मनोवैज्ञानिक तौर पर ईरान की जीत के रूप में सामने आ रहा है. इजरायल के लिए, जो हमेशा निर्णायक जीत की सोच रखता है, इस डील में हासिल करने के लिए बहुत कम और खोने के लिए काफी कुछ नजर आता है. आर्थिक प्रतिबंध हटने से ईरान अपनी सैन्य और तकनीकी क्षमताओं को और मजबूत कर सकता है, उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, और उसके क्षेत्रीय प्रभाव पर भी कोई स्पष्ट लगाम नहीं लगाई गई है. इसके साथ ही अमेरिका का रुख सैन्य कार्रवाई से हटकर कूटनीति की ओर झुकना यह संकेत देता है कि परिस्थितियां बदल चुकी हैं.

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर युद्ध की शुरुआत की थी, वही अमेरिका अब उसके बिना समझौता कर चुका है. यह बदलाव सिर्फ एक डील नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत है. अगर इस वजह से अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में दरार आती है, तो इसका असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया नए अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकती है. यही कारण है कि यह समझौता सिर्फ एक युद्ध का अंत नहीं, बल्कि आने वाले समय की बड़ी भू-राजनीतिक कहानी की शुरुआत भी माना जा रहा है.

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