एक ऐसा संन्यासी जो सियासी जगत के शिखर पर है. हिंदू विचाराधारा के पोस्टर ब्यॉय के तौर पर जिसने पहचान बनाई. 5 सालों तक जिसने संसद की चौखट पर गोरखपुर के विकास का खाका रखा. 25 सालों के सफर के बाद जो सिर्फ योगी नहीं राजयोगी बन गए. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहचान में और भी बहुत कुछ ऐसा है जिसे लेकर दिलचस्पी खत्म नहीं होती. अपने फैसलों से जिसने उत्तर प्रदेश की सियासत में जड़ता को तोड़ा है और नई पहचान लिखी है. देश की सियासत के साथ प्रदेश की सियासत में योगी आदित्यनाथ भाजपा का वो चेहरा है जिसने चुनौतियों से लड़ना सीखा, झुकना नहीं. सांसद से मुख्यमंत्री तक के सफर में योगी आदित्यनाथ ने अपनी पहचान में बहुत कुछ बदला है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सुर्खियों में रहने वाले नेता रहे, भले ही सांसद रहे या फिर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. उनका अंदाज हमेशा सुर्खियों में रहा, उनकी शैली  हमेशा सुर्खियों में रही.

मुद्दे सियासी हो तो आदित्यनाथ की बेबाकी भी चर्चा बटोरती रही, गोरखपुर की विकास यात्रा के साथ प्रदेश की विकास यात्रा की कमान संभालने वाले आदित्यनाथ को सियासत विरासत में मिली है. आज जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 48 के हो गए तो एक बार फिर चर्चा उनके सियासत और संन्यास के सफर की करना लाजमी है. वैसे भी बीते दिनों जिस तरह से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कोरोना महामारी के खिलाफ मोर्चा संभाला, उसने प्रदेश की जनता को नया हौसला दिया और सियासत को नया नजरिया भी.

उत्तर प्रदेश की सियासत के कई चेहरे आपने देखे तो हैं लेकिन योगी आदित्यनाथ को हमेशा अलग अंदाज में देखा है. वजह कि वो खालिस सियासी शख्सियत नहीं है, वो एक संन्यासी हैं, संन्यासी के साथ सियासी जिम्मेदारी उन्हें अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से मिली है जिस उम्र में दीक्षा ली, जिस उम्र में सियासत शुरू की, वो उम्र ऐसी नहीं थी कि एक युवा के लिए संन्यास और सियासत के रास्ते तय कर पाना आसान हो. लेकिन सत्ता के शीर्ष पर आज बैठे योगी आदित्यनाथ को देख कर लगता नहीं कि उन्हें इसमें कोई खास मुश्किलें आईं, बल्कि मुश्किलों से और वो मंझ कर निकले, मजबूत हुए.

आज यूपी की सियासत में अगर कोई सबसे चर्चित चेहरा है तो वो सिर्फ और सिर्फ सीएम योगी अदित्यनाथ हैं. एक ऐसा नेता जिसने कई सालों से हिन्दू और हिन्दुत्व के मुद्दे पर यूपी ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में अपनी ललकार दिखाई है. अब वो सीएम के तौर पर जनता की हर कसौटी पर खरा उतरने की कवायद में लगे हुए हैं.

योगी आदित्यनाथ का ये अंदाज फिल्मी जरूर लगेगा, लगेगा कि वो अभिनेता अनिल कपूर की तरह एक किरदार निभा रहे हैं लेकिन ये फिल्मी कहानी नहीं है, ये हकीकत से भी काफी आगे है. योगी आदित्यनाथ फुल एक्शन में हैं, वो व्यवस्था को सुधारने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हुए हैं, चाहे मंत्री हो या फिर अधिकारी-कर्मचारी हर किसी से वो जवाब-तलब कर रहे हैं. अपने जन्मदिन पर 25 करोड़ वृक्ष लगाने का संकल्प उसी की एक कड़ी है.

सीएम योगी आदित्यनाथ वाकई में एक नायक के तौर पर जनता के लिए फैसले कर रहे हैं, उस जनता के बीच जिसने सूबे में 2014 के बाद लगातार तीन बार विधानसभा, निकायों और उपचुनावों में जिस तरह भाजपा पर भरोसा जताया है, उस जनता का दुख दर्द जानने पहुंच रहे हैं जिसने विरोधियों को पस्त कर भाजपा को विजयपथ पर आगे बढ़ाया है. योगी आदित्यनाथ उसी जनता की तकलीफे दूर करने की कोशिश में लगे हुए हैं जो पिछली सरकारों के कार्यकाल में डरी हुई थी सहमी हुई थी, उसका पिछली सरकारों से भरोसा उठ गया था, अधिकारी उसकी सुनते नहीं थे, जनता त्रस्त थी, उसे योगी आदित्यनाथ पर भरोसा जगा है और योगी आदित्यनाथ भी उस भरोसे को टूटने नहीं देना चाहते.

जिस जनता के अधिकारी, विधायक और मंत्री के दर्शन नहीं होते थे, जो कभी लोगों की फरियाद तो दूर लोगों की बात सुनने को तैयार नहीं थे, आज योगी आदित्यनाथ ने उस तस्वीर को बदल दी है, जो लोगों के बीच पहुंच रहे हैं, वो कभी जनता से तकलीफ से पूछते हैं.

योगी आदित्यनाथ अपने पुराने अंदाज में लौट आए हैं. पहले तो वो महंत और सांसद के तौर पर लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे और अब सीएम के तौर पर लोगों से सीधे न सिर्फ जुड़ रहे हैं बल्कि तत्काल लोगों की समस्याओं का हल निकालते हैं वो लोगों के बीच चौपाल लगाते हैं तो वहीं अधिकारियों के लिए ये चौपाल योगी सर की क्लास बन जाती है. वो लोगों के बीच ही अधिकारियों से हर एक-एक योजना की जानकारी लेते हैं, अगर काम पूरा नहीं होता है तो तुरंत संज्ञान लेते हैं और वो अधिकारियों को जरूरी निर्देश भी देते हैं.

सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ फुल एक्शन में हैं, लोगों का और हालात का जायजा लेते हैं, हर चीजों की बारीकी से जनकारी लेते हैं, फैसला करने में देर नहीं लगाते, उनकी कार्रवाइयों का असर भी दिखता है और लोगों को योगी आदित्यनाथ का यही अंदाज तो एक नायक की तरह दिखता है.

देश के साथ-साथ दुनिया कोरोना जैसी महामारी से जूझ रही है. जाहिर है उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है और कोरोना के आने के बाद ये माना जा रहा था कि 22 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले उत्तर प्रदेश के लिए बड़ी चुनौतियां होंगी.

ठीक इसी वक्त में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कमान संभाल कर फैसले लेने शुरू कर दिए, उनके मंत्रिमंडल के तमाम मंत्री कोरोना के चलते घरों में कैद होने को मजबूर हो गए, ऐसे में कोरोना के खिलाफ जंग में अकेले योद्धा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बचे. मंत्रिमंडल के फैसलों के साथ उन्हें अधिकारियों के जरिए व्यवस्थाओं को जमीन पर उतारना था.

देश के अलग-अलग राज्यों में फंसे यूपी के मजदूरों, यूपी के छात्रों, अर्थव्यवस्था और सरकारी खजाने की हालत पर काबू पाने जैसे उपाय करने शामिल रहे.

सेहत के मोर्चे पर एक्शन

04 करोड़ 07 लाख 20 हजार 044 लोगों का घरों में जाकर सर्वे किया जा चुका है

कोविड-19 की टेस्टिंग हेतु प्रदेश में 32 लैब संचालित हैं. रोज लगभग 10 हजार सैम्पल की टेस्टिंग हो रही है. 12 नई टेस्टिंग लैब की स्थापना होनी है.

प्रदेश में 1,01,236 आइसोलेशन और 26,419 क्वारेंटाइन बेड है। वेंटिलेटर बेडों की संख्या 1,466 है।

228 एल-1, 75 एल-2, तथा 25 एल-3 कोविड चिकित्सालय स्थापित किए जा चुके हैं।

कोरोना संक्रमितों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पूरे प्रदेश कुल 67,198 स्वास्थ्य दल क्रियाशील हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गांव एवं शहर में निगरानी समितियां गठित की गई हैं।

प्रदेश के 660 से ज्यादा निजी अस्पतालों में समस्त प्रोटोकॉल सुनिश्चित कर इमरजेंसी सेवाएं प्रारम्भ की जा चुकी हैं

सेहत के मोर्चे पर इंतजाम करने के साथ ही अफसरशाही को भी कसौटी पर परखने में योगी आदित्यनाथ कोताही नहीं कर रहे हैं.

अफसरशाही की परीक्षा

कोरोना की आहट लगते ही राज्य सरकार ने टीम 11 गठित की। सबकी अलग-अलग जिम्मेदारी और जवाबदेही तय की।

अन्य राज्यों में फंसे श्रमिकों की मदद के लिए 32 नोडल अधिकारी नियुक्त किया। जिसमें 16 आईएएस और 16 आईपीएस अधिकारी शामिल रहें।

कोरोना वारियर्स पुलिस, सफाईकर्मी, डॉक्टर, नर्स और अन्य मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा की दिशा में बड़ा फैसला किया. महामारी बीमारी कानून 1897 में बदलाव कर दण्ड को और सख्त किया.

सीएम हेल्पलाइन 1076 से प्रदेश के 20125 ग्राम प्रधानों से बातचीत की. 60 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों से जानकारियां जुटाई गईं.

लेबर लॉ में 3 साल तक की छूट दी है. सभी उद्योगों को अगले 3 वर्षों के लिए लगभग सभी श्रम कानूनों में से छूट दी जाएगी.

माइग्रेशन कमीशन बनाने की घोषणा की, इसके जरिए प्रदेश में वापस आए श्रमिकों एवं कामगारों को उनके हुनर के मुताबिक रोजगार और मानदेय दिलाया जाएगा

श्रमिकों-कामगारों की स्किल मैपिंग शुरू की है। अब तक ऐसे 23 लाख श्रमिकों की पहचान की जा चुकी है। इसमें 93 से ज्यादा श्रेणियां बनाई गई हैं।

अपने इन फैसलों के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली बॉर्डर पर फंसे 4 लाख मजदूरों, कोटा में फंसे 12 हजार छात्रों और प्रयागराज में मौजूद प्रदेश के दूसरे जिलों को छात्रों को बसों का इंतजाम कर घर पहुंचाया. सिर्फ इतना ही नहीं प्रदेश के किसानों के लिए कोरोना के दौर में गेहूं खरीद के इंतजाम करने में भी देरी नहीं लगाई. कोरोना में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ पूरे एहतियायत बरते जाए, इसके लिए रजिस्ट्रेशन और ई पर्ची की व्यवस्था की गई. बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कोरोना संकट से जूझ रहे लोगों की हर मुश्किलों का हल ढूंढ़ने की कोशिश की. जनता भी उनकी इस पहल को महसूस करती दिखी, अब जगह अनलॉक शुरू हो चुका है तो फिर कानून व्यवस्था पर काबू पाने के लिए पुलिस और दूसरे तंत्र जुट गए हैं.

देश की सियासत के सिरमौर माने जाने वाले उत्तर प्रदेश के मुखिया का ताल्लुक उस देवभूमि से है जो कभी उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा हुआ करता था. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ताल्लुक उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले से है. जहां उन्होंने न केवल अपना बचपन गुजारा बल्कि अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी की. आगे की राह अचानक ऐसे मोड़ की तरफ मुड़ गई जो संन्यास के रास्ते सियासत के गलियारों तक जा पहुंची. संन्यास लेने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहचान अजय सिंह बिष्ट हुआ करती थी.

योगी आदित्यनाथ का जन्म उत्तराखंड के सामान्य राजपूत परिवार में हुआ, इनके पिता का नाम आनंद सिंह बिष्ट और माता का नाम सावित्री देवी है, योगी ने 1989 में ऋषिकेश के भरत मंदिर इंटर कॉलेज से 12वीं पास की, 1992 में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से गणित में बीएससी की पढ़ाई पूरी की, छात्र जीवन में ही वो राममंदिर आंदोलन से जुड़ गए थे,  90 के दशक में उनकी मुलाकात महंत अवैद्यनाथ से हुई जिसके बाद 1993 में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर आ गए और यहीं उन्होंने महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा ली और उनके उत्तराधिकारी भी बने.

मंदिर में रहते हुए योगी आदित्यनाथ न सिर्फ गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने बल्कि उनके सियासी उत्तराधिकारी बने क्योंकि तब तक गोरखपुर के सांसद महंत अवैद्यनाथ ही हुआ करते थे. सियासी उत्तराधिकारी बनने के बाद 1998 में महज 26 साल की उम्र में उन्होंने चुनाव जीत कर गोरखपुर अगुवाई की. इसके बाद योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से अजेय रहे. 2017 तक लगातार चुनाव जीत कर आते रहे. 2017 में विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली बंपर बहुमत के साथ जीत ने उन्हें पार्टी का मुख्य चेहरा बनाया और मुख्यमंत्री के पद पर ताजपोशी कर दी.