रासमणि का बेटा
रवींद्रनाथ टैगोर
रासमणि कालीपद की मां थीं! किंतु उन्हें बाध्य होकर पिता का पद ग्रहण करना पड़ा. मां, अगर मां-बाप दोनों बन जाए तो लड़के के लिए ठीक नहीं होता. उनके पति भवानीचरण पुत्र पर नियंत्रण रखने में बिल्कुल असमर्थ थे. यह पूछने पर कि वे इतना ज्यादा लाड़ क्यों करते हैं, वे जो उत्तर देते, उसे समझने के लिए पूर्व-इतिहास जानना जरूरी है.
बात यह थी! भवानीचरण का जन्म शानियाड़ी के विख्यात संभ्रांत धनी वंश में हुआ था. भवानीचरण के पिता अभयाचरण की पहली पत्नी के पुत्र थे श्यामाचरण. पत्नी-वियोग के पश्चात् अधिक आयु में अभयाचरण ने जब दूसरा विवाह किया तो उनके श्वसुर ने अपनी कन्या के नाम आलंदि ताल्लुका विशेष रूप से लिखा लिया था. जामाता की आयु का हिसाब करके उन्होंने मन-ही-मन सोचा कि यदि कन्या विधवा हो गई तो खाने-पहनने के लिए उसे सौतेले पुत्र के अधीन न रहना पड़े.
उन्होंने जो कल्पना की थी उसके प्रथम अंश को फलते देर न लगी. अपने दौहित्र भवानीचरण के जन्म के कुछ ही समय बाद उनके जामाता की मृत्यु हो गई. उनकी पुत्री ने अपनी विशेष संपत्ति पर अधिकार कर लिया. अपनी आंखों से यह देखकर वे भी परलोक-यात्रा के समय अपनी पुत्री के जीवन के संबंध में बहुत-कुछ निश्चिंत हो गए.
श्यामाचरण उस समय वयस्क हो चुका था. यहां तक कि उसका बड़ा लड़का उस समय भवानी से एक साल बड़ा था. श्यामाचरण अपने पुत्र के साथ-ही-साथ भवानी का भी पालन-पोषण करने लगे. भवानीचरण की माता की संपत्ति में से कभी एक पैसा भी न लेते और प्रतिवर्ष हिसाब साफ करके अपनी विमाता को दिखाकर वे उसकी रसीद लेते, यह देखकर सभी उनकी साधुता पर मुग्ध थे.
वस्तुत: प्राय: सभी ने सोचा कि इतनी साधुता अनावश्यक है, यहां तक कि यह मूर्खता का ही नामांतर है. अविभाजित पैतृक संपत्ति का एक भाग दूसरे विवाह की स्त्री के हाथ में पड़ जाए, यह गांव के किसी भी आदमी को अच्छा न लगा. यदि श्यामाचरण धोखा देकर लिखित दस्तावेजों को किसी प्रकार अस्वीकार कर देते तो पड़ोसी उनके पौरुष की प्रशंसा ही करते, और जिस उपाय से वे भली प्रकार सफल हो सकते हैं ऐसे परामर्शदाता निपुण व्यक्तियों का भी अभाव न था. किंतु, श्यामाचरण ने अपने पारिवारिक अधिकार का अंग-भंग करके भी अपनी विमाता की संपत्ति को पूरी तरह स्वतंत्र रखा.
इन्हीं कारणों से तथा सहज स्नेहशील स्वभाव के कारण विमाता ब्रजसुंदरी श्यामाचरण पर अपने पुत्र के समान स्नेह और विश्वास करती थीं. और उनकी संपत्ति को श्यामाचरण बिल्कुल अलग समझते थे. इसलिए उन्होंने अनेक बार फटकारा भी था, वे कहती थीं, ‘‘बेटा, यह सब तो तुम ही लोगों का है, इस संपत्ति को साथ लेकर तो मैं स्वर्ग नहीं जाऊंगी, यह तुम्हीं लोगों की रहेगीय इतना हिसाब-किताब देखने की मुझे जरूरत क्या है!’’
श्यामाचरण इस बात पर कान ही न देते. श्यामाचरण अपने लड़कों पर कठोर नियंत्रण रखते थे. किंतु भवानीचरण के ऊपर उनका कोई नियंत्रण न था. यह देखकर सभी एक स्वर से कहते, ‘अपने लड़कों की अपेक्षा भवानी के ऊपर उनका अधिक स्नेह है.’ इस तरह भवानी का पढ़ना-लिखना कुछ भी नहीं हुआ और रुपये-पैसे के मामले में हमेशा बच्चे के समान बने रहकर वे पूर्ण रूप से बड़े भाई पर निर्भर होकर दिन काटने लगे. धन-संपत्ति के विषय में उन्हें कभी कोई चिंता न करनी पड़ती थी! केवल बीच-बीच में एक-आध दिन हस्ताक्षर करने पड़ते. क्यों हस्ताक्षर करते, इसको समझने का वे प्रयत्न ही न करते, क्योंकि प्रयत्न करने पर भी सफल नहीं हो सकते थे.
दूसरी ओर श्यामाचरण का बड़ा लड़का तारापद हर काम में पिता की सहायता करते रहने के कारण काम-काज में पक्का हो गया. श्यामाचरण की मृत्यु के बाद तारापद ने भवानीचरण से कहा, ‘‘काकाजी, हम लोगों का साथ रहना अब और नहीं चल सकता. क्या पता किसी दिन किसी साधारण बात को लेकर मनोमालिन्य हो जाए, तो फिर गृहस्थी नष्ट-भ्रष्ट हो जाएगी.’’
अलग होकर किसी दिन अपनी संपत्ति की देख-भाल स्वयं करनी पड़ेगी, इस बात की भवानी ने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी. जिस गृहस्थी में बचपन से वे बड़े हुए थे उसको वे संपूर्ण, अखंड ही समझते थे! उसमें किसी एक स्थान पर जोड़ है और उस जोड़ की जगह से उसके दो हिस्से किए जा सकते हैं, सहसा यह समाचार पाकर वे व्याकुल हो गए.
वंश की सम्मान-हानि और आत्मीयजनों की मनोवेदना जब तारापद को तनिक भी विचलित न कर सकी, तब संपत्ति का विभाजन किस प्रकार हो सकता है, इस असाध्य चिंता में भवानी को प्रवृत्त होना पड़ा. उनकी चिंता देखकर तारापद ने अत्यंत विस्मित होकर कहा, ‘‘काकाजी, बात क्या है? आप इतनी चिंता क्यों कर रहे हैं, संपत्ति का बंटवारा तो हो ही चुका है. पितामह अपने सामने ही तो विभाजन कर गए थे.’’
हतबुद्धि होकर भवानी ने कहा, ‘‘सच! मैं तो इस विषय में कुछ भी नहीं जानता.’’
तारापद ने कहा, ‘‘कमाल है. जानते कैसे नहीं? देश-भर के लोग जानते हैं, बाद में आपके साथ हमारा कोई झगड़ा न हो इसलिए आलंदि-तालुका आपके हिस्से में लिखकर पितामह ने पहले से ही आपको अलग कर दिया है! इसी भांति तो अब तक चलता आया है.’’
भवानीचरण ने सोचा, ‘‘सभी-कुछ संभव है.’’ प्रश्न किया, ‘‘यह घर?’’
तारापद ने कहा, ‘‘चाहे तो यह घर आप ही रख सकते हैं. सदर महकमे में कोठी है वह मिल जाए तो हमारा काम किसी-न-किसी तरह चल जाएगा.’’
तारापद को इस तरह अनायास ही पैतृक घर छोड़ने के लिए राजी होते देखकर वे उनकी उदारता पर विस्मित रह गए. सदर महकमे का अपना मकान उन्होंने कभी नहीं देखा था और उसके प्रति उनकी तनिक भी ममता न थी.
भवानी ने जब अपनी माता ब्रजसुंदरी को सारा वृत्तांत बताया तो उन्होंने माथा ठोककर कहा, ‘‘मैया री क्या बात हुई. आलंदि तालुका तो अपने भरण-पोषण के लिए मुझे निजी संपत्ति के रूप में मिला था! उसकी आमदनी भी कोई ऐसी ज्यादा नहीं है. पैतृक संपत्ति में तुम्हारा जो हिस्सा है वह तुम्हें क्यों नहीं मिलेगा.’’
भवानी ने कहा, ‘‘तारापद कहता है, पिता ने इस ताल्लुके के अलावा हमें और कुछ नहीं दिया था.’’
ब्रजसुंदरी ने कहा, ‘‘यह बात क्या मैं कहने से ही मान लूंगी. मालिक ने अपने हाथ से अपने वसीयतनामे की दो प्रतियां लिखी थीं! उसकी एक प्रति उन्होंने मुझे सौंप दी थी. वह मेरे संदूक में ही है.’’
संदूक खोला गया. उसमें आलंदि ताल्लुके का दानपत्र तो था, किंतु वसीयतनामा नहीं था. वसीयतनामे की चोरी हो गई थी.
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(रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)