दुखी अपने होश में न था. न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी. वह थकान, भूख, कमजोरी सब मानो भाग गई. उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था. एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी. आधा घण्टे तक वह इसी उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से फट गई और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी. इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा. भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया.
सद्गति
प्रेमचंद
दुखी ने चिलम पीकर फिर कुल्हाड़ी सँभाली. दम लेने से जरा हाथों में ताकत आ गई थी. कोई आधा घण्टे तक फिर कुल्हाड़ी चलाता रहा. फिर बेदम होकर वहीं सिर पकड़ के बैठ गया. इतने में वही गोंड़ आ गया. बोला, ‘क्यों जान देते हो बूढ़े दादा, तुम्हारे फाड़े यह गाँठ न फटेगी. नाहक हलाकान होते हो.‘
दुखी ने माथे का पसीना पोंछकर कहा, ‘अभी गाड़ी भर भूसा ढोना है भाई!’
गोंड़ –‘क़ुछ खाने को मिला कि काम ही कराना जानते हैं. जाके माँगते क्यों नहीं?’
दुखी –‘क़ैसी बात करते हो चिखुरी, बाह्मन की रोटी हमको पचेगी!’
गोंड़ –‘पचने को पच जायगी, पहले मिले तो. मूँछों पर ताव देकर भोजन किया और आराम से सोये, तुम्हें लकड़ी फाड़ने का हुक्म लगा दिया. जमींदार भी कुछ खाने को देता है. हाकिम भी बेगार लेता है, तो थोड़ी बहुत मजूरी देता है. यह उनसे भी बढ़ गये, उस पर धर्मात्मा बनते हैं.
दुखी –‘धीरे-धीरे बोलो भाई, कहीं सुन लें तो आफत आ जाय.
यह कहकर दुखी फिर सँभल पड़ा और कुल्हाड़ी की चोट मारने लगा. चिखुरी को उस पर दया आई. आकर कुल्हाड़ी उसके हाथ से छीन ली और कोई आधा घंटे खूब कस-कसकर कुल्हाड़ी चलाई; पर गाँठ में एक दरार भी न पड़ी. तब उसने कुल्हाड़ी फेंक दी और यह कहकर चला गया तुम्हारे फाड़े यह न फटेगी, जान भले निकल जाय.‘
दुखी सोचने लगा, बाबा ने यह गाँठ कहाँ रख छोड़ी थी कि फाड़े नहीं फटती. कहीं दरार तक तो नहीं पड़ती. मैं कब तक इसे चीरता रहूँगा. अभी घर पर सौ काम पड़े हैं. कार-परोजन का घर है, एक-न-एक चीज घटी ही रहती है; पर इन्हें इसकी क्या चिंता. चलूँ जब तक भूसा ही उठा लाऊँ. कह दूँगा, बाबा, आज तो लकड़ी नहीं फटी, कल आकर फाड़ दूँगा. उसने झौवा उठाया और भूसा ढोने लगा. खलिहान यहाँ से दो फरलांग से कम न था. अगर झौवा खूब भर-भर कर लाता तो काम जल्द खत्म हो जाता; फि र झौवे को उठाता कौन. अकेले भरा हुआ झौवा उससे न उठ सकता था. इसलिए थोड़ा-थोड़ा लाता था. चार बजे कहीं भूसा खत्म हुआ. पंडितजी की नींद भी खुली. मुँह-हाथ धोया, पान खाया और बाहर निकले. देखा, तो दुखी झौवा सिर पर रखे सो रहा है. जोर से बोले –‘अरे, दुखिया तू सो रहा है? लकड़ी तो अभी ज्यों की त्यों पड़ी हुई है. इतनी देर तू करता क्या रहा?
मुट्ठी भर भूसा ढोने में संझा कर दी! उस पर सो रहा है. उठा ले कुल्हाड़ी और लकड़ी फाड़ डाल. तुझसे जरा-सी लकड़ी नहीं फटती. फिर साइत भी वैसी ही निकलेगी, मुझे दोष मत देना! इसी से कहा, है कि नीच के घर में खाने को हुआ और उसकी आँख बदली.
दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई. जो बातें पहले से सोच रखी थीं, वह सब भूल गया. पेट पीठ में धॉसा जाता था, आज सबेरे जलपान तक न किया था. अवकाश ही न मिला. उठना ही पहाड़ मालूम होता था. जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा. पंडित हैं, कहीं साइत ठीक न विचारें, तो फिर सत्यानाश ही हो जाय.
जभी तो संसार में इतना मान है. साइत ही का तो सब खेल है. जिसे चाहे बिगाड़ दें. पंडितजी गाँठ के पास आकर खड़े हो गये और बढ़ावा देने लगे हाँ, मार कसके, और मार क़सके मार अबे जोर से मार तेरे हाथ में तो जैसे दम ही नहीं है लगा कसके, खड़ा सोचने क्या लगता है हाँ बस फटा ही चाहती है! दे उसी दरार में! दुखी अपने होश में न था. न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी. वह थकान, भूख, कमजोरी सब मानो भाग गई. उसे अपने बाहुबल पर स्वयं आश्चर्य हो रहा था. एक-एक चोट वज्र की तरह पड़ती थी. आधा घण्टे तक वह इसी उन्माद की दशा में हाथ चलाता रहा, यहाँ तक कि लकड़ी बीच से फट गई और दुखी के हाथ से कुल्हाड़ी छूटकर गिर पड़ी. इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा. भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया.
पंडितजी ने पुकारा, ‘उठके दो-चार हाथ और लगा दे. पतली-पतली चैलियाँ हो जायँ. दुखी न उठा. पंडितजी ने अब उसे दिक करना उचित न समझा. भीतर जाकर बूटी छानी, शौच गये, स्नान किया और पंडिताई बाना पहनकर बाहर निकले! दुखी अभी तक वहीं पड़ा हुआ था. जोर से पुकारा –‘अरे क्या पड़े ही रहोगे दुखी, चलो तुम्हारे ही घर चल रहा हूँ. सब सामान ठीक-ठीक है न? दुखी फिर भी न उठा.‘
अब पंडितजी को कुछ शंका हुई. पास जाकर देखा, तो दुखी अकड़ा पड़ा हुआ था. बदहवास होकर भागे और पंडिताइन से बोले, ‘दुखिया तो जैसे मर गया.'
पंडिताइन हकबकाकर बोलीं—‘वह तो अभी लकड़ी चीर रहा था न?’
पंडित –‘हाँ लकड़ी चीरते-चीरते मर गया. अब क्या होगा?’
पंडिताइन ने शान्त होकर कहा, ‘होगा क्या, चमरौने में कहला भेजो मुर्दा उठा ले जायँ.‘
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(प्रेमचंद की कहानी सद्गति का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)
