ज़िंदगी में खुशियां कॉफ़ी जैसी हैं. कॉफ़ी मग ज़िंदगी है और इसमें भरी कॉफ़ी खुशियां...हां खुशियां एक समय बाद एक मग में नहीं रहेंगी लेकिन आप जब चाहो अपना कप दुबारा भर सकते हैं. हिमांशु सिंह की एक दिलकश कहानी.

नाम ही कॉफ़ी है

हिमांशु सिंह

लाइटर है क्या? मैंने बस इतना ही पूछा था. सामने जो आंखें थीं, वह कोई झील सी नहीं थी... जली हुई सी लगती थीं. जैसे एक सूरज की सारी धूप किस ने एक सांस में निकाल ली हो. और सूरज को बुझा दिया हो हमेशा के लिए. वह आंखें एकटक मुझे देखती रही. बिना झपके. बोलती आंखों की खामोशी क्या होती है उस ही रात जाना था मैंने.

सॉरी...उसने बस इतना बोला, वह भी चिढ़कर, जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी गुस्ताखी कर दी हो. पर अभी तो मैंने देखा था...आप बाहर आयीं थी, आपने सिगरेट जलाई, और सिगरेट पीने लगी. देखिये... मेरे पास सिगरेट है, पर बिना लाइटर के सिगरेट का क्या काम? इसलिए बस लाइटर मांगा. धीमी सी खामोशी के बाद...एक सिगरेट मिलेगी? उसने पूछा. मुझे अब यह डील समझ आ गयी थी.

बस फिर क्या था ...मेरे मुंह में लगी सिगरेट पर उसका लाइटर था और मेरी जींस की जेब में सांस लेने के लिए जद्दोजहद कर रहा सिगरेट का पैकेट उसके हाथों में. मुझे दिल से का वह सीन याद आने लगा जब शाहरुख खान मनीषा कोइराला से माचिस मांगता है. बस फिर मैंने उस ही सीन को याद करते अपने बाल ठीक करने की कोशिश की. पास खड़ी गाड़ी के शीशे को देख अपने बालों पर हाथ फिराया और ठीक कर लिए.

अगले एक मिनट तक कुछ नहीं हुआ. मैं और वह दोनों धुएं के घेर में खामोश थे.

एक लड़की को अपने साथ सिगरेट पीते देख कोई भी लड़का जो करेगा वही मैंने किया. सबसे पहले अपनी हालत देखी. मेरी शर्ट एक तरफ से बाहर निकली थी और बाल माथे को चूम रहे थे. उस लड़की की कैफियत मुझसे बुरी थी. वह शायद खड़े होने की हालत में नहीं थी. उस ही गाड़ी के सहारे अपनी कमर को टिकाकर वह जल्दी से जल्दी कश मार रही थे जैसे शायद अपनी ज़िंदगी की आखिरी सिगरेट पी रही हो. आज पहली बार सिगरेट पीते समय मेरा ध्यान अपनी सिगरेट से ज़्यादा किसी और पर था.

मुझे लगा कि शायद कोई है जो इसका इंतज़ार कर रहा है इसलिए जल्दी जल्दी पी रही है.

मेरा मन किया कि कुछ बात शुरू करूं. क्या पूछूं?? क्या पूछं? कैसे शुरू करूं? नाम पूछकर बात शुरू करूं. नहीं बहुत चीजी लगेगा...कहां रहती है? नहीं, पहली बार में ही घर...हट!! क्या पूछ लूं कि सिगरेट इतनी जल्दी जल्दी क्यूं पी रही है. यह भी अजीब सवाल है ...उसकी मर्ज़ी ...ऐसे जाने कितने सवाल मेरे मन में चल रहे थे कि बात कहां से शुरू करूं.

“कहां से शुरू करूं?”... बस इसी सवाल पे अटके रह गए ना जाने कितने लड़के आज तक शुरू नहीं कर पाए. कुछ देर बाद वह अंदर चली गयी...अंदर जाते वक्त उसने मुझे न कुछ कहा और मैं ...मैं तो कुछ कह ही नहीं पाया. वह जिस शीशे के दरवाजे के अन्दर गयी थी वहां बाहर बोर्ड लाग था: Beer Café Happy Hours 8 to 11 pm.

वह इस बार से ही बाहर आयी थी शायद. मैं तो सोचा था कि यह वैसे ही इस Beer café के बगल वाले कैफे कॉफ़ी डे से बाहर आयी है जैसे कि मैं आया हूं. उससे बात करने का जो स्कोप था अब वह भी चला गया था.

उसके जाने के बाद जब मैंने सर उठाकर देखा तो एक ही नजर में मुझे दो ग्लो साइन बोर्ड दिखाई दिए. Beer café और कैफे कॉफ़ी डे...एक दूसरे की बगल में. मेरी सिगरेट अभी ख़तम नहीं हुई थी. एक के बाद एक काश धीरे धीरे धुएं की शकल लेते रहे. मैं फिर से अपने कैफे में पहुंचा. वन कैफे लाते प्लीज़. मैंने कहा. और कुछ देर बाद मेरी टेबल पर एक और कॉफ़ी मग था.

ऑफिस के बाद घर पहुंचने से पहले...मैं इस कैफे में आकर करीब तीन चार कॉफ़ी रोज़ पी ही लेता था. हाथ में कॉफ़ी मग, टेबल पर लैपटॉप और लैपटॉप में वह...वह यानी नीलांजना.

जिसे मैं कभी जना. कभी निला तो कभी नीलू बुलाता था. अभी हमारे ब्रेक अप को एक महीना भी नहीं हुआ होगा. ऑफिस से मेरे घर का कितना समय लगता है यह मझे पिछले दो सालों में कभी पता ही नही चला था. न ही मुझे ऑफिस से घर के रास्ते के बारीकियां याद हुई थी. क्योंकि हर रोज़ मेरे ऑफिस से घर जाने के बीच मैं लगतार उस से फ़ोन पर ही बात करता रहता था. कितनों चौराहों पर मेरा auto रुकता, कितने फ्लाईओवर पे चढ़ता, कितनी इमारतों के सामने से गुजरता, लेकिन निला मेरे साथ रहती, फोन पर.

मैं नीला की तस्वीरें देख ही आहा था कि एक वेटर आकर बोला, Sir we are closing the café. मैंने अपना लैपटॉप बैग समेटा और चलता बना. बाहर देखा तो वही लड़की दुबारा सिगरेट पी रही थी. फिर से अकेले. मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने मेरी और एक सिगरेट बढ़ा दी. आपकी एक सिगरेट उधार थी मुझ पर. वापस ले लो.

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(हिमांशु सिंह की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)