बैक पेपर
दिलीप कुमार
कॉलेज में ये बात तुरंत जंगल की आग के मानिंद फैल गई. नॉर्थ कैंपस में काफी तनाव था. गाली-गुप्ते का अंदेशा तो था ही, तोड़ फोड़ की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता था. दूसरे कैंपस के लड़के भी नॉर्थ कैंपस में इकट्ठा होने लगे थे. लड़कियां हमेशा की भांति भावातिरेक में होते हुए भी निर्विकार दिख रही थीं. साइंस की छात्राओं ने ‘‘सॉरी’’, ‘‘वेरी सॉरी’’, ‘‘वेरी-वेरी सॉरी’’ और ‘‘सो सैड’’ कहा तथा चलती बनीं. उन्हें एक अच्छा साथी खोने की चिंता तो थी, मगर वे तर्क देना भी नहीं भूली थीं, ‘‘मेन एक्जाम भी मिस किया, ये मौका भी चूक गया. शर्मा को उसकी शराफत खा गई. उसे मास्टरों के गेहूं-सब्जी से फुर्सत ही नहीं मिली होगी.’’ आर्ट तथा कॉमर्स वर्ग की छात्राओं ने उस अनजान सहानभूति पाए शख्स के लिए ‘‘बेचारा’’, ‘‘सो सैड’’, ‘‘वेरी बैड’’ कहकर आहें भरीं तथा नाक-भौं भी सिकोड़ी.
मगर इन दोनों संकायों के लड़के नॉर्थ कैंपस में आ जुटे थे. नॉर्थ कैंपस की कक्षाएं हमेशा की भांति परवान चढ़ रही थीं. मगर उनमें लड़कियां ही थीं या ऐसे लड़के थे, जो हमेशा दब्बू माने जाते थे. वे साहिबान आज लड़कियों के इकलौते सानिध्य का मौका गंवाना नहीं चाहते थे. प्रायः कक्षाओं में ही दिखने वाले विद्यार्थी आज दुखी एवं तनावग्रस्त थे. वे हजरात न तो नेता थे और न ही गुटों के जमावड़े के प्रेमी. अमूमन वे लोग इकट्ठे या इक्के-दुक्के ही सही, रहा करते थे. फिर भी, सब में, आपस में काफी मेलजोल था. मगर आज भी कलम के ये सिपाही, डॉक्टर साहबों को अपनी शक्ल नुमाया नहीं कराना चाहते थे.
उन सबकी कोशिश यही थी, कि उनमें से कोई भी मिशन का अगुआ न समझा जाए. हालांकि सबके सब कैरियरिस्ट थे, मगर आज उनकी ‘‘नीट एंड क्लीन’’ इमेज के किले में सुराख साफ दिख रहा था. लोग गुस्से में तो थे, मगर पहले वे शर्मा से मिलकर अपनी सहानुभूति जताना चाहते थे. कुछेक जो बैक पेपर में पास हुए थे, वे खुश तो थे. मगर इतने सारे गमगीन चेहरों के बीच वे अपनी खुशी प्रदर्शित करके खुद का सतहीपन जाहिर नहीं होने देना चाहते थे. लोगों की फुसफुसाहट के साथ उनका तनाव भी बढ़ रहा था. मगर उन सभी को इस लक्ष्यविहीन मिशन के अगुआ जीतू बघेल की प्रतीक्षा थी.
काफी देर से अखबार को तोड़-मरोड़ रहे अजीजुद्दीन से लैब असिस्टेंट यादव ने चाशनी भरे लफ्जों में पूछा, ‘‘कैसा रहा खां साहब, इंप्रूवमेंट में तो आपका नॉर्म, फिफ्टी फाइव परसेंट मिल ही गया होगा, नेट डाल रहे हैं ना?’’बेवकूफ की हद तक हंसोड़ माने जाने वाले अजीजुद्दीन ने इस प्रकार घूरकर विस्फरित नेत्रों से उसे देखा, मानो यादव ही इस कारस्तानी की जड़ में है. अजीजुद्दीन ने नजरें फिरा लीं, उसने महसूस किया उसे हर सरकारी शख्स से घिन आने लगी है. वैसे वहां मौजूद हर लड़का इस हादसे के लिए पूरे सरकारी अमले को गुनाहगार मान रहा था.
तब तक बघेल आता दिखा. वो काफी खुश दिख रहा था. उसके हाथ में डिब्बे जैसी कोई चीज थी. हमेशा की तरह बघेल सिर झुकाए, जमीन में कुछ खोजता हुआ सा कैंपस में दाखिल हुआ. इतनी भीड़ इकट्ठे दिखी, वो भी हमेशा सुनसान रहने वाले नॉर्थ कैंपस में तो वो चौंक पड़ा. उसने मन ही मन सोचा, ‘‘जरूर कोई सीटियाबाजी का मसला होगा. ये लड़के कब टेंडर भरना बंद करेंगे. और ये लड़कियां थोड़ा-सा बर्दाश्त कर लेतीं तो इनका क्या चला जाता. पहले चारा, फिर मारा.’’ गेट पर ठिठककर उसने चारों ओर का मुआयना किया तो खुद को विशिष्ट पाया. इसमें कोई खास बात नहीं थी. स्थानीयता और चतुरता के कारण अक्सर वो ‘‘मैन ऑफ मोमेंट’’ होता था.
तब तक बस्ती जिले वाला पिलपिलाया पटेल बोला, ‘‘कहां थे बघेल, ये तुम्हारे हाथ में क्या है.’’ एकाएक बात शुरू करने से पहले उसने भूमिका बांधी थी. उसी की बात का जवाब देते हुए, मगर उसे नजरअंदाज करके अजीजुद्दीन की तरफ मुखातिब होते हुए बघेल बोला, ‘‘सौ स्लाइड हैं यार, घर पे उठा ले गया था. आज साफ-वाफ करके लाया हूं. सोचता हूं आज ही जमा कर दूं वरना फिर रस्टेड हो जाएंगी. टूर वाला सारा मामला फाइनल है. परसों सुबह छह बजे कुआना रेंजरी चलना है. सुबह डीएफओ साहब से फोन पर फिर प्रोग्राम कनफर्म किया है. पूरे ग्रुप की व्यवस्था हो गई है. नाइट स्टे जरूर करेंगे. लच्छू हलवाई पूरे ऑर्डर को पूरा करने में आनाकानी कर रहा था. टाइट किया तो अब दिन का नाश्ता तो दे ही रहा है, एक लौंडा भी भेज रहा है. वही बनाएगा भी, धोएगा भी. अबे, तुझे अब सिर्फ अपनी मिमिक्री ही करनी है. मोहतरमा बुशरा को इंप्रेस करना है. जानता है ना. प्लान्ट कलेक्शन हो न हो, प्यार का एक्शन हो जाना चाहिए. वहीं होगा जंगल में मंगल.’’
मसखरी पर उतर रहे बघेल को पिलपिलाए पटेल ने इस बार मिमियाती आवाज में टोका, ‘‘अमां यार, शर्मा का रिजल्ट.’’ बघेल फिर शुरू हो गया ‘‘अरे हां यार, साइटोजेनेटिक्स वाले थर्ड पेपर में सोलह नंबरों की इंप्रूवमेंट हुई है. फर्स्ट क्लास में सात नंबर कम, फाइनल में सब बैलेंस हो जाएगा. क्यों बे पटेलवा, मौलाना को बुशरा जुतियायी है क्या. इसका चेहरा काहे उतरा है. बेटा, पास हो गए हो तभी कैंपस में खड़े हो. नहीं तो तुम प्रतापगढ़िए अब तक यूनिवर्सिटी में खड़े चुनहीं मल रहे होते. है ना हो मौलाना. सॉरी, खां साहेब.’’
बघेल के इस व्यंग्य पर तमाम लड़के खीझ उठे. शरीफ एवं पढ़ाकू माना जाने वाला टंडन बोला, ‘‘जीतू भाई, शर्मा की बात करो यार. कहां है वो, उसका रिजल्ट.’’ बघेल, टंडन की बात को बीच में ही काटते हुए बोला ‘‘बायोकेमेस्ट्री के जो सेकेंड शुक्ला सर हैं ना. उनके यहां पिछले साल जो अखंड-भागवत बैठा था. अब शायद उसी का उद्दीपन कर रहे हैं. उन्होंने शर्मा को एक मजदूर के साथ टिकरी भेजा है, बांस लाने के लिए. शर्मा भी साइकिल से गया है. दोनों जन दो साइकिलों पर बांधकर बांस ला रहे होंगे. मैंने तो कहा था कि, शर्मा लगे हाथ इस सेकेंड शुक्ला के लिए चिता की लकड़ियां भी फ्री में लेता आ. कैसा लगेगा अगर एडवांस में इस सेकेंड शुक्ला के तेरहवीं की लकड़ियां पैक करवाकर दें, ‘‘विद लव फ्रॉम शर्मा कर्टसी बघेल एंड पार्टी.’’ (शर्मा की तरफ से सप्रेम भेंट, बघेल एंड पार्टी के सौजन्य से).’’
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(दिलीप कुमार की किताब का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)
