पुरानी यादों को जवान करने के लिए एक पत्नी अपने पति के बालों को काला रंगती है पर क्या उसकी इच्छा एक सच है या झूठ

कालिख

देवी प्रसाद मिश्र

बरामदे में बैठे आदमी ने पास के पेड़ पर बैठी काली चिड़िया के झब्बेदार परों को देखकर यह सोचा कि देखो एक समय था कि जब मेरे बाल इस चिड़िया के पंखों जैसे काले थे. उस आदमी को लगा कि वह चिड़िया सायबेरिया से उसे चिढ़ाने आयी है.

स्त्री ने पुरुष से कहा कि चेहरा मेरी तरफ करो तो काला लगा दूं. पुरुष ने चेहरा सामने कर लिया. स्त्री काला लगा रही थी और बात भी कर रही थी.

स्त्री ने बालों में काला लगाते हुए कहा कि एक समय था कि पूरे बालों में एक सफेद बाल ढूंढ़े नहीं मिलता था. और अब एक काला बाल नहीं दिखता. पुरुष ने कहा कि एक दिन न काला रहेगा न सफेद. ये खोपड़ी भी नहीं जिस पर ये बाल उगे हैं. स्त्री ने कहा कि एक दिन तो तुड़ी-मुड़ी काली सफेद तस्वीर भी नहीं बचती. तो बचता क्या है, पुरुष ने पूछा. सत्य बचता होगा और क्या, स्त्री ने कह दिया. पुरुष ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि झूठ बचता हो.

सफेद बाल को काला करना एक झूठ है, इच्छाएं भी शायद झूठ हैं. पुरुष ने धीमी आवाज़ में कहा. स्त्री ने पुरुष की बात नहीं मानी. उसने कहा कि इच्छाएं सच हैं. इसमें तुम थोड़ा जवान दिखते हो, इसलिए मेरे लिए इस झूठ को बनाए रखो.

बालों में काला लगाने के बाद थोड़ी देर में पुरुष नहा-धोकर दफ्तर के लिए तैयार हो गया. उसकी पत्नी अपने पति को बालकनी से जाते हुए देखती रही. उसे लगा कि अगली दफा वह डार्क ब्राउन का इस्तमाल करेगी. काला ज़्यादा काला दिख रहा था. कम स्वाभाविक.

पुरुष घर से निकलकर गाड़ी की तरफ बढ़ा. उस ने कार के शीशे में अपना एक क्षीण अक्स देखा. उसे अपना चेहरा अच्छा नहीं लगा. वह ड्राइविंग सीट पर बैठ गया. उसने अपना सिर स्टियरिंग व्हील पर रख दिया. फिर वह गाड़ी के बाहर गया. उसे लगा कि क्या यह हो सकता है कि वह भूल जाए कि वह कहां जाने वाला है. उसने एक बार फिर गाड़ी का दरवाज़ा खोला. उसने गाड़ी के की होल में चाबी डालने के पहले सोचा कि काश, ऐसा हो पाता कि चाबी डालते ही गाड़ी में धमाका हो और सब कुछ उड़ जाए. ऐसा हो पाता तो वह तमाम दुविधाओं से बाहर आ पाता.

उसने गाड़ी स्टार्ट की. गाड़ी में धमाका नहीं हुआ. वह उसके भीतर हुआ.

वह गाड़ी को पता नहीं कहां-कहां घुमाता रहा. शायद वह अपने गंतव्य को लेकर आश्वस्त नहीं था. आखिर वह एक पुराने से घर के सामने रुका. बेतरतीब घास वाले लॉन से होता वह एक दहलीज़ के पहले रुक गया और उसने दरवाज़ा खटखटाया.

एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला और थोड़ा हताश होते हुए कहा कि मैंने कितनी बार कहा कि तुम्हारे बालों में मुझे ये नक़ली रंग पसंद नहीं है. पुरुष ने कहा कि यह उसकी पत्नी को पसंद है. वह मुझे बूढ़ा नहीं होने देना चाहती, उसने बहुत धीरे-से यह कहने की कोशिश की. उसे कैसा लगेगा जब उसे यह पता चलेगा कि उसने जिस पति के बाल रंगे वह किसी और स्त्री के साथ सोने गया है, उस स्त्री ने कहा.

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(देवी प्रसाद मिश्र की कहानी का अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)