केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने एक इंटरव्यू में कहा कि लोकसभा की संख्या बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण को प्राथमिकता देने वाले बिल पारित होने के बाद भी सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व पहले की तरह ही रहेगा. उन्होंने यह भी कहा कि संसद में इस संबंध में स्पष्टीकरण दिया जाएगा. 

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अभी बिल पेश करने को लेकर क्या कहाजब उनसे पूछा गया कि विपक्ष की शिकायत बिल के समय को लेकर है क्योंकि ये बिल चुनावों के बीच में आए हैं तो इस पर रिजिजू ने कहा कि अगर हम इसे लोकसभा चुनाव से पहले लाते हैं तो भी विपक्ष कहता कि सरकार फायदा उठाने के लिए कर रही है. अगर हम इसे अभी नहीं लात, तो 5 महीने बाद फिर से चुनाव होंगे. तब नेता कहेंगे कि आप इसे उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए ला रहे हैं. 

उन्होंने कहा कि हर साल दो बार चुनाव होते हैं. आप इस मुद्दे को कैसे टाल सकते हैं और इसे कैसे राज्य के चुनावों से जोड़ सकते हैं? इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है. विपक्ष द्वारा दिया जा रहा यह तर्क पूरी तरह से निराधार है. हम यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि महिला आरक्षण को किसी भी तरह के राजनीतिक एजेंडे से नहीं जोड़ा जा सकता या राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. विधेयक पहले ही पारित हो चुका है अब सिर्फ इसे लागू करना बाकी है.

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चुनाव खत्म होने तक ना रुकने पर क्या कहाजब केंद्रीय मंत्री से पूछा गया कि चुनाव खत्म होने तक 10 दिन और इंतजार क्यों न किया जाए?  इस सवाल का जवाब देते हुए किरेन रिजिजू ने कहा कि हर दिन बोझ बनता जा रहा है और वे 2-3 सप्ताह (इंतजार) की बात कर रहे हैं. कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके को समस्या क्या है? यह कोई गणितीय मुद्दा नहीं है और अगर हम ऐसा चाहते तो असम और केरल चुनावों से पहले ही कर सकते थे.

सीटों में 50% की वृद्धि के सवाल पर रिजिजू ने कहा कि हमने कई राजनीतिक दलों से बातचीत के दौरान यह प्रस्ताव पहले ही दे दिया था, चाहे वे एनडीए के सहयोगी दल हों या इंडिया गठबंधन के हों. केवल चार दल - कांग्रेस, टीएमसी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी दल बैठक में शामिल नहीं हुए. इन सभी दलों को यह जानकारी दी गई है कि 50% की वृद्धि इसलिए की जा रही है क्योंकि हमें 33% सीटें महिलाओं को देनी हैं. 

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उन्होंने आगे कहा कि भारत एकमात्र लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक सांसद लगभग 25 से 27 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है. यह एक छोटे देश के आकार के बराबर है. ब्रिटेन में एक औसत सांसद 70,000 लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, फिर भी सदन में 600 सांसद हैं. भारत में केवल 543 सांसद हैं. 1971 में जब अंतिम परिसीमन हुआ था, तब भारत की जनसंख्या 60 करोड़ से कम थी. आज यह 140 करोड़ से अधिक है. इतने सारे लोगों का प्रतिनिधित्व करना सांसदों के लिए एक भारी बोझ है.

जनगणना को क्यों टाला जा रहा है? इस सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अगर हम इंतज़ार करेंगे तो 2029 तक इसे लागू नहीं कर पाएंगे. जाति आधारित जनगणना के कारण इसमें लगभग तीन साल लग जाएंगे. आप जानते हैं कि 51,000 से अधिक विभिन्न जातियां हैं और यह निर्धारित करने में लंबा समय लगेगा कि कौन किस जाति का है. दूसरा 543 सीटों के परिसीमन के लिए आयोग मसौदा तैयार करेगा. उसके बाद वे प्रत्येक स्थान पर जन सुनवाई के लिए जाएंगे. ये काम एक साल में पूरा नहीं हो सकता है.

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