महिला आरक्षण से जुड़ा बिल लोकसभा में नहीं हुआ पास, अभी 2 और विधेयक पाइपलाइन में, अब क्या करेगी मोदी सरकार?
महिला आरक्षण कानून में संशोधन का विधेयक लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा. 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से पहली बार कोई विधेयक पास नहीं हो सका है.

केंद्र की मोदी सरकार की तरफ से प्रस्तावित महिला आरक्षण कानून में संशोधन का विधेयक संविधान (131वां संशोधन) 2026 शुक्रवार (17 अप्रैल) को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा. 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से पहली बार कोई विधेयक पास नहीं हो सका है. 2011 के बाद पहली बार किसी संवैधानिक संशोधन विधेयक को लोकसभा में असफलता मिली है.
विधेयक के पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े. मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से विधेयक को पारित होने के लिए 352 मतों (दो-तिहाई) की आवश्यकता थी. 54 मतों से ये पीछे रह गया. इस हार के बाद ही मोदी सरकार ने इसके साथ पेश किए गए 2 अन्य विधेयकों को भी वापस ले लिया.
और कौन से हैं 2 विधेयक?
परिसीमन विधेयक 2026- 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण अनिवार्य किया गया था. इसके अलावा दूसरा है केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026- दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में शामिल किया गया था. संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि तीनों विधेयक आपस में गहराई से जुड़े हुए थे और अब सरकार अब इन 2 विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाएगी.
कब तक लागू होगा महिला आरक्षण?
131वें संशोधन का मकसद लोकसभा सीटों की संवैधानिक सीमा को 550 से बढ़ाकर 850 करना और 2023 के महिला आरक्षण कानून (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के कार्यान्वयन को अगली जनगणना से अलग करना था. 2023 कानून के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण कानून के लागू होने के बाद पहली जनगणना के बाद ही प्रभावी होना था, जिसका मतलब है कि यह 2034 से पहले लागू नहीं हो सकता, क्योंकि वर्तमान जनगणना चल रही है और इसे पूरा होने में कुछ साल लग सकते हैं, जिसके बाद परिसीमन होना है.
नए विधेयकों का मकसद 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया के जरिए 2029 तक कोटा लागू करना था. पुराने आंकड़ों पर आधारित इस परिसीमन ने क्षेत्रीय असमानता और जातिगत समीकरणों के मुद्दों को फिर से सामने ला दिया.
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मोदी-शाह की अपील काम न आई
विशेष सत्र के दौरान 2 दिन तक प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों ने सदन में व्यक्तिगत अपील करते हुए आश्वासन दिया कि दक्षिणी राज्यों के आनुपातिक सीट बंटवारे में कोई कमी नहीं की जाएगी. शुक्रवार को शाह ने सदन में अंतिम समय में एक प्रस्ताव रखा और विपक्षी सदस्यों से पूछा कि क्या वे विधेयक का समर्थन करेंगे लेकिन इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि विपक्ष को सरकार पर भरोसा नहीं है.
अमित शाह ने क्या कहा?
प्रस्ताव फेल होने के बाद अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और सपा ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए आवश्यक संविधान संशोधन विधेयक को पारित नहीं होने दिया. मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि नारी शक्ति का यह अपमान यहीं नहीं रुकेगा, यह दूर तक फैलेगा.
1931 के बाद पहली बार, जाति जनगणना राष्ट्रीय जनगणना का हिस्सा है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की भी गणना की जा रही है, जिनकी गणना पहले से ही की जा रही है और संसद में उन्हें कोटा दिया गया है.
अब क्या हैं विकल्प?
2023 का मूल नारी शक्ति वंदन अधिनियम अभी भी लागू है क्योंकि इसे गुरुवार रात को राजपत्र में अधिसूचित कर दिया गया है. हालांकि नए परिसीमन के बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता. ऐसे में अगर मोदी सरकार इसे पहले लागू करना चाहती है तो संसद में नए विकल्पों के साथ लौटना होगा. जैसे कि वर्तमान 543 सीटों में से कम से कम 1 तिहाई सीटें आरक्षित करनी होंगी.
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Source: IOCL

























