एक तरफ, हम 'विकसित भारत' का सपना देख रहे हैं, जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जहां अंतरिक्ष मिशन सफल हो रहे हैं और जहां डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी दुनिया को हैरान कर रहा है. दूसरी तरफ, जब हम NFHS-6 (2023-24) के ताजा आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो एक और तस्वीर सामने आती है, जहां हर पांच में से एक बच्चा अभी भी कुपोषण का शिकार है. हर तीन में से एक बच्चे का वजन कम है और 10 में से 8 से ज्यादा बच्चे (6-23 महीने) को सही आहार नहीं मिल पाता. यह विरोधाभास कोई इत्तिफाक नहीं है. यह हमारी व्यवस्था की नाकामी की कहानी है...
क्या कहता है NFHS-6 का ताजा डेटा?
29 मई 2026 को जारी NFHS-6 (2023-24) के आंकड़े दो तरह की कहानियां सुनाते हैं. एक उम्मीद जगाने वाली और एक चिंता बढ़ाने वाली.
सुधार की कहानी (अच्छी खबर):
- संस्थागत प्रसव यानी अस्पताल में बच्चे का जन्म रेट बढ़कर 90.6% हो गया, जो पहले 88.6% था.
- प्रसव-पूर्व देखभाल पहले 92.6% थी, जो अब 95.9% तक पहुंच गई.
- 12-23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण बढ़कर 87.5% हो गया.
- रोटावायरस टीकाकरण 36.4% से बढ़कर 85.4% हो गया.
चिंता की कहानी (बुरी खबर):
- उम्र के हिसाब से कद छोटा होना यानी स्टंटिंग 35.5% से घटकर 29.3% पर आ गई. लेकिन हर तीन में से एक बच्चा अब भी इससे प्रभावित है.
- गंभीर रूप से पतलापन (वेस्टिंग) मामूली घटकर 19% रहा. यानी हर पांच में से एक बच्चा अभी भी तीव्र कुपोषण का शिकार है.
- अंडरवेट (कम वजन) 32.1% से मामूली घटकर 31.8% आया. हर तीन में से एक बच्चा कम वजन का है.
- गंभीर वेस्टिंग (सबसे खतरनाक) 7.7% से घटकर 5.2% तक आ गई यानी 20 में से 1 बच्चा गंभीर रूप से कुपोषित है.
झारखंड में अंडरवेट बच्चों की संख्या 39.4% से बढ़कर 41.1% हो गई. उत्तर प्रदेश में वेस्टिंग बढ़कर 19.2% और अंडरवेट बढ़कर 34.5% हो गया. राजस्थान में वेस्टिंग 19.8% और अंडरवेट 33.3% हो गया. यानी जहां केरल में स्टंटिंग 20% है, वहीं बिहार में यह 35% से ज्यादा है. झारखंड में वेस्टिंग (22.3%), केरल (10.9%) से दोगुनी से ज्यादा है. यह एक ही देश में और एक ही सरकार में दो अलग-अलग बचपन की कहानी है.
भारत में 85% बच्चों को नहीं मिलता पौष्टिक भोजन
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा शायद यह है कि 6-23 महीने के सिर्फ 15.3% बच्चों को सही आहार मिल पाता है. 85% से ज्यादा बच्चे अपने विकास के सबसे नाजुक दौर में सही पोषण नहीं पा रहे. राजस्थान में यह आंकड़ा सिर्फ 8.7% है, तो बिहार में सिर्फ 11.9%.
एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हुए कहते हैं कि बच्चों को कैलोरी तो मिल रही है, लेकिन प्रोटीन, सूक्ष्म पोषक तत्व और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन नहीं मिल पा रहा. WHO के मुताबिक, 6-24 महीने की उम्र बच्चे के दिमाग और शरीर के विकास के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होती है.
एक गंभीर चेतावनी बन गई स्तनपान में गिरावट
शायद सबसे चिंताजनक खोज 6 महीने से कम उम्र के बच्चों में पूर्ण स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) घटकर 55.8% हो गया, जो पहले 63.7% था. उत्तर प्रदेश में यह 59.7% से गिरकर 34.6% पर आ गया, जबकि केरल में यह 55.5% से बढ़कर 72.7% हो गया.
ब्रेस्टफीडिंग प्रमोशन नेटवर्क ऑफ इंडिया (BPNI) के संस्थापक डॉ. अरुण गुप्ता कहते हैं, 'स्तनपान सिर्फ एक व्यक्तिगत पसंद नहीं है. यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, बाल अधिकार और राष्ट्रीय विकास का मुद्दा है.'
यानी एक तरफ कुपोषण और कम वजन, तो दूसरी तरफ बढ़ता मोटापा एक साथ बढ़ रहे हैं.
आखिर भारत में यह दो तस्वीरें क्यों बनती दिख रही हैं?
भारत में इस दोहरी तस्वीर की 5 बड़ी वजहें हैं:
1. इलाज बेहतर हुआ, खाना नहीं
NFHS-6 के मुताबिक, भारत ने स्वास्थ्य सुविधाओं में बड़ी प्रगति की है, लेकिन जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सुधरीं, वहीं खान-पान की आदतें नहीं बदलीं. NFHS-6 की सबसे चिंताजनक बात यह है कि 6-23 महीने के सिर्फ 15.3% बच्चों को सही आहार (एडीक्वेट डाइट) मिल पाता है. यानी, 85% से ज्यादा बच्चे अपने विकास के सबसे नाजुक दौर में सही पोषण नहीं पा रहे.
मतलब साफ है कि अस्पतालों में बच्चे तो पैदा हो रहे हैं और उनके टीके लग रहे हैं, लेकिन घर जाकर उन्हें सही और पौष्टिक खाना नहीं मिल पा रहा.
2. 'मां का समय' बना सबसे बड़ी अनदेखी चुनौती
NFHS-6 ने एक नई चुनौती उजागर की 'मातृ समय की गरीबी'. भारत में महिलाएं घर के अंदर और बाहर दोहरा काम करती हैं. NFHS-6 के मुताबिक, करीब 30% महिलाएं पिछले 12 महीनों में पेड वर्क में लगी थीं, लेकिन यह आंकड़ा उनके अवैतनिक काम (खेती, पशुपालन, घरेलू काम) को नहीं दिखाता.
कई ग्रामीण इलाकों में क्रेच (शिशु सदन) नहीं हैं. मांएं खेतों में काम पर जाती हैं और बच्चों को बड़े भाई-बहन या परिवार के दूसरे सदस्यों के पास छोड़ जाती हैं. इससे स्तनपान और पूरक आहार दोनों प्रभावित होते हैं.
स्तनपान में गिरावट इसका सबसे बड़ा सबूत है. 6 महीने से कम उम्र के बच्चों में पूर्ण स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) 63.7% से घटकर 55.8% हो गया. उत्तर प्रदेश में यह 59.7% से गिरकर 34.6% पर आ गया. कुल मिलाकर महिलाओं के पास बच्चे को सही तरीके से दूध पिलाने और खिलाने का समय ही नहीं है.
3. सबको एक जैसा नहीं मिलता स्वास्थ
भारत में कुपोषण एक समान नहीं है. यह जाति, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति के हिसाब से बहुत अलग-अलग है. उत्तर-दक्षिण की बात करें तो विन्ध्याचल पर्वत के उत्तर और दक्षिण में बच्चों के कुपोषण में बड़ा अंतर है:
- केरल में स्टंटिंग 20.1% है.
- बिहार में 35.6% और झारखंड में 35%
- झारखंड में वेस्टिंग 22.3% है, जो केरल (10.9%) से दोगुने से ज्यादा है.
3. जातिगत असमानता से बड़ा फर्क
रिसर्च बताती हैं कि ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे जाति समूहों के बच्चों में स्टंटिंग की दर ज्यादा है. विन्ध्याचल के उत्तर में दलित बच्चों में स्टंटिंग की दर 7-8 प्रतिशत अंक ज्यादा है, जबकि ऊपरी जाति के बच्चों में उत्तर-दक्षिण का कोई बड़ा अंतर नहीं.
जातिगत भेदभाव बच्चों की सेहत को सीधे प्रभावित कर रहा है. ओडिशा में तो आंगनवाड़ी सेंटर में दलित महिला के हाथों से बनाया गया खाना खाने से मना कर दिया गया.
दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित लोग भारत में रहते हैं. 70 करोड़ से ज्यादा भारतीय खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. 20.6 करोड़ बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य या पोषण तक पहुंच से महरूम हैं. अमीर और गरीब के बीच का यह फर्क ही कुपोषण की दूसरी तस्वीर है.
4. पैसा तो है, पर इस्तेमाल कहां?
मध्य प्रदेश के उदाहरण से समझें कि यहां NFHS-6 में वेस्टिंग 18.9% से बढ़कर 23.8% हो गया. यह देश में सबसे ज्यादा है. अंडरवेट में मध्य प्रदेश 39.7% के साथ दूसरे स्थान पर है. सरकार ने 'यशोदा दुग्ध प्रदाय योजना' शुरू की, जिसमें स्कूलों और आंगनवाड़ियों में बच्चों को टेट्रा मिल्क पैक देने का वादा किया गया. लेकिन एक साल से ज्यादा बाद भी यह योजना शुरू नहीं हो पाई.
पंचायती राज मंत्री प्रहलाद पटेल ने कहा, '80 बच्चों को हर दिन दूध देना है, इसलिए इसमें समय लग रहा है.'
वहीं, पोषण आहार योजना का बजट 2024-25 में 1,300 करोड़ रुपए से घटकर 2026-27 में 1,150 करोड़ रुपए हो गया. कांग्रेस विधायक उमंग सिंघार ने कहा, 'सरकार प्रचार और इवेंट्स पर बड़ी रकम खर्च कर रही है, लेकिन कुपोषित बच्चों के लिए उनके पास न तो समय है और न ही पैसा.'
5. 'कैलोरी तो मिली, पोषण नहीं'
भारत में कैलोरी की कमी नहीं है. लोग खाना खा रहे हैं, लेकिन सही पोषण नहीं मिल पा रहा. NFHS-6 के मुताबिक, 50% से ज्यादा प्रजनन आयु की महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं. जब मां को ही सही पोषण नहीं मिलता, तो बच्चे को कैसे मिलेगा?
भारत में कुपोषण का 'डबल बोझ' है. एक तरफ कुपोषण और कम वजन, दूसरी तरफ बढ़ता मोटापा. UN की स्टेट्स ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशियन इन द वर्ल्ड 2026 रिपोर्ट के मुताबिक,
- 52 करोड़ लोग (35.5%) स्वस्थ आहार नहीं खरीद सकते.
- स्वस्थ आहार की कीमत 2017 से 48% बढ़ गई.
यह दोहरी तस्वीर इसलिए है, क्योंकि हमने 'विकास' को सड़कों, बिल्डिंगों और GDP से मापा है, लेकिन बच्चों की सेहत को भूल गए हैं. जब तक हर पांचवां बच्चा कुपोषित है, हर तीसरा बच्चे का वजन कम है और 85% बच्चों को सही आहार नहीं मिल पाता, तब तक 'विकसित भारत' का सपना अधूरा रहेगा.
