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Explained: कैसे AI की रेस में पिछड़ता गया भारत? चीन, साउथ कोरिया और ताइवान जैसे देशों के पास कौन सी संजीवनी बूटी

World AI Race: AI पेटेंट फाइल करने से लेकर बड़े लेंग्वेज मॉडल बनाने, सेमीकंडक्टर प्रोडक्शन और आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस की रिसर्च तक, भारत इन तीनों एशियाई देशों से काफी पीछे छूट गया है.

जब दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बहस छिड़ी तो भारत को लेकर एक उम्मीद हमेशा बनी रही कि हमारा IT टैलेंट और सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का पुराना दबदबा हमें इस रेस में भी आगे रखेगा. लेकिन 2026 के मध्य तक आते-आते तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है. चीन ने स्टेट कंट्रोल्ड कैपिटल और डेटा के दम पर पूरा इकोसिस्टम खड़ा कर लिया. दक्षिण कोरिया ने चिप मैन्युफैक्चरिंग को AI से जोड़कर खुद को मजबूत किया और ताइवान TSMC जैसी दिग्गज कंपनी की बदौलत हार्डवेयर की रीढ़ बना. वहीं भारत अब भी मुख्य रूप से AI का कंज्यूमर बना हुआ है, प्रोड्यूसर नहीं. आखिर हम कहां चूके, इन देशों ने कैसे बाजी मारी और क्या भारत के लिए अब भी कुछ किया जा सकता है?

AI रेस में पिछड़ने का मतलब सिर्फ चैटबॉट न बना पाना नहीं

पहले यह समझ लेना जरूरी है कि जब हम कहते हैं कि कोई देश AI में पिछड़ गया तो इसका मतलब यह नहीं कि वहां चैटजीपीटी जैसा कोई ऐप नहीं बना. यह एक पूरे इकोसिस्टम की बात है जिसमें कई चीजें शामिल हैं, यानी बुनियादी रिसर्च, पेटेंट की संख्या, सुपरकंप्यूटिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, घरेलू स्तर पर AI चिप का उत्पादन, बड़ी मात्रा में हाई क्वालिटी डेटा की उपलब्धता, सरकारी इन्वेस्टमेंट और सबसे बढ़कर एक ऐसा माहौल जहां स्टार्टअप से लेकर बड़ी कंपनियां रिसर्च में पैसा लगाएं.

इन सभी पैमानों पर भारत फिलहाल काफी पीछे है और यह अंतर पिछले पांच-सात सालों में तेजी से बढ़ा है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की ‘AI इंडेक्स रिपोर्ट’ और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के आंकड़े बताते हैं कि AI पेटेंट, रिसर्च पेपर और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के मामले में चीन और अमेरिका के बीच सीधी टक्कर है, जबकि भारत इस लिस्ट में बहुत नीचे दिखता है.

चीन ने कैसे मारी बाजी: जब सरकार पूरी ताकत से मैदान में उतरी

चीन ने 2017 में ही ‘नेक्स्ट जनरेशन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेवलपमेंट प्लान’ जारी कर दिया था, जिसमें 2030 तक AI में विश्व नेता बनने का टारगेट रखा गया. इसके बाद जो हुआ वह हैरान करने वाला था. चीनी सरकार ने सीधे राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों और फंडों के जरिए अरबों डॉलर की पूंजी AI रिसर्च, स्टार्टअप और इंफ्रास्ट्रक्चर में झोंक दी. बीजिंग ने स्थानीय सरकारों को भी निर्देश दिए कि वे AI कंपनियों को जमीन, टैक्स छूट और डेटा उपलब्ध कराएं.

नतीजा यह रहा कि Baidu, Alibaba, Tencent और ByteDance जैसी दिग्गज कंपनियां अपने-अपने AI मॉडल लेकर आ गईं. चीन के पास सबसे बड़ी ताकत रही डेटा की. 1.4 अरब से ज्यादा आबादी से रोजाना जुटने वाला डेटा, जिस पर कम प्राइवेसी कानूनों के चलते AI मॉडल्स को ट्रेनिंग देना आसान था. पेटेंट फाइलिंग में चीन ने अमेरिका को भी कई सालों से पीछे छोड़ रखा है. चीनी यूनिवर्सिटियां AI रिसर्च पेपर प्रकाशित करने में टॉप पर हैं.

साउथ कोरिया: मेमोरी चिप से निकलकर AI हब बनने की पूरी स्क्रिप्ट

साउथ कोरिया की सफलता की कहानी सैमसंग और SK Hynix जैसी कंपनियों के इर्द-गिर्द घूमती है. कोरिया ने समझ लिया था कि AI की दुनिया में वही ताकतवर होगा जिसके पास सबसे तेज और सबसे एडवांस मेमोरी चिप बनाने की क्षमता होगी.

सरकार ने ‘K-Semiconductor Strategy’ के तहत भारी टैक्स ब्रेक और सब्सिडी दी, जिससे निजी क्षेत्र ने सैकड़ों अरब डॉलर का निवेश किया. इधर, राष्ट्रपति स्तर पर ‘AI कोरिया कमेटी’ बनी, जिसने AI शिक्षा, स्टार्टअप फंडिंग और एथिकल AI के लिए साफ रोडमैप दिया. कोरियाई कंपनियां अब सिर्फ चिप नहीं बेच रहीं, बल्कि अपने खुद के फाउंडेशन मॉडल और AI सर्विसेज भी दे रही हैं. यह सिलसिला 2020 के बाद बहुत तेज हुआ. 2026 तक दक्षिण कोरिया सरकारी समर्थन और हार्डवेयर-सॉफ्टवेयर के जबरदस्त तालमेल के चलते टॉप 5 AI देशों में मजबूती से जगह बना चुका है.

ताइवान: जिसके बिना दुनिया की AI रेस रुक जाए

ताइवान की कहानी ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (TSMC) के बिना अधूरी है. दुनिया के लगभग 90% एडवांस AI चिप इसी एक कंपनी की फैक्ट्रियों में बनते हैं. Nvidia, AMD, यहां तक कि Apple भी अपने चिप डिजाइन TSMC को ही थमाते हैं. ताइवान ने सिर्फ चिप मैन्युफैक्चरिंग पर निर्भर नहीं रहकर, सरकारी ‘AI Taiwan Action Plan’ के तहत हेल्थकेयर, मैन्युफैक्चरिंग और स्मार्ट सिटीज में AI अपनाने पर जोर दिया. 

भारत कहां चूका: निवेश, रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर की तिहरी कमजोरी

अब सवाल यह है कि भारत, जिसके IIT और सॉफ्टवेयर इंजीनियरों का पूरी दुनिया में डंका बजता है, वह AI रेस में इतना पीछे क्यों रह गया...

  • पहली वजह: सरकारी और निजी निवेश की भारी कमी. प्राइवेट सेक्टर में भी भारतीय IT कंपनियां लंबे समय तक सर्विसेज के मॉडल पर टिकी रहीं, बजाय इसके कि वे अपने खुद के फाउंडेशन मॉडल या AI प्रोडक्ट बनाने में जोखिम लेतीं.
  • दूसरी वजह: हाई लेवल कंप्यूटेशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी. बड़े लैंग्वेज मॉडल को ट्रेन करने के लिए हजारों ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट वाले डेटा सेंटर चाहिए, जो भारत में बहुत सीमित हैं.
  • तीसरी वजह: देश के सबसे तेज दिमाग हर साल अमेरिका, कनाडा और यूरोप का रुख कर गए, क्योंकि यहां न तो पर्याप्त फंडिंग थी और न ही बड़े पैमाने पर रिसर्च का माहौल.
  • चौथी वजह: राष्ट्रीय AI नीति की कमी. जहां चीन और कोरिया ने 2017-2019 तक अपनी कई योजनाएं जारी कर दी थीं, वहीं भारत को ‘IndiaAI मिशन’ को धरातल पर उतारने में 2024-25 तक का समय लगा. तब तक तकनीकी खाई काफी चौड़ी हो चुकी थी.

भारत के पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स आधार है और डिजिटल लेन-देन का रिकॉर्ड है, लेकिन यह डेटा AI ट्रेनिंग के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं हो पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह है लंबे समय तक डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा कानून का अभाव. एक तरफ चीन ने अपने नागरिकों के डेटा को खुले तौर पर उपलब्ध कराया, वहीं भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 में आने तक स्थिति अधर में लटकी रही.

इस कानूनी पेंच ने घरेलू और विदेशी दोनों कंपनियों को बड़े AI प्रोजेक्ट शुरू करने से रोके रखा. इसके अलावा, सरकारी डेटा सेट्स आपस में जुड़े हुए नहीं हैं, जो बड़ी चुनौती बना हुआ है.

क्या भारत अब भी वापसी कर सकता है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये कोशिशें अभी शुरुआती दौर में हैं. पूरी तरह निराश होने से पहले कुछ ऐसे कदम भी हैं जो बताते हैं कि देर से ही सही, भारत ने दिशा पकड़नी शुरू कर दी है. 2024 में कैबिनेट ने 10,372 करोड़ रुपये के ‘IndiaAI मिशन’ को मंजूरी दी, जिसके तहत कम से कम 10,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट वाला कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने, AI स्टार्टअप को फंडिंग और भारतीय भाषाओं में डेटासेट तैयार करने का लक्ष्य है. कुछ भारतीय स्टार्टअप और रिलायंस जैसे बड़े घराने अपने फाउंडेशन मॉडल लाने की कोशिश कर रहे हैं. केंद्र सरकार ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए अलग से योजनाएं शुरू की हैं.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें 8 साल से ज्यादा का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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