Xप्लेन: राहुल गांधी की 'नैतिकता' की कांग्रेस को क्यों और कैसे चुकानी पड़ती कीमत?
RAGA Ethics Issues: भारत की राजनीति ने विपक्ष में आदर्शवादियों को पसंद किया और सत्ता में जलाया है. राहुल गांधी की 'नैतिकता' एक 'ईमानदार' नेता का दर्जा देती है, लेकिन सियासत अकेले चलने का खेल नहीं है.

रांची में 10 अगस्त को पुलिस ने नौकरी की परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज किया, पानी की बौछारें कीं और आंसू गैस के गोले दागे. इस पर कांग्रेस के नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'झारखंड में छात्रों के खिलाफ बल का इस्तेमाल गलत है.' बड़ी बात यह है कि झारखंड की सरकार INDIA गठबंधन की ही सहयोगी पार्टी JMM के नेता हेमंत सोरेन के हाथों में है. हालांकि, राहुल की नैतिकता के निशाने पर मनमोहन सिंह से लेकर शिवराज पाटिल तक आ चुके हैं. सवाल है कि राहुल गांधी की नैतिकता कांग्रेस को किस कीमत पर चुकानी पड़ती है...
2013 का अध्यादेश: राहुल ने कैमरों के सामने फाड़ा मनमोहन सिंह का अध्यादेश
सितंबर 2013... तब राहुल गांधी कांग्रेस के उपाध्यक्ष थे. इत्तिफाक से उसी साल लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में सजा हुई थी. केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार एक अध्यादेश लाई, जो दोषी करार दिए गए सांसदों को तीन महीने की राहत देता था, ताकि वे अपनी सीट बरकरार रख सकें. यह अध्यादेश सीधे तौर पर लालू यादव को फायदा पहुंचाने वाला था, लेकिन राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई, अध्यादेश की एक कॉपी हाथ में ली और कैमरों के सामने फाड़ दी. राहुल ने इसे 'बिल्कुल बकवास' बताया.
इसी के साथ राहुल ने अपनी ही सरकार के फैसले को सरेआम नकार दिया. अपने पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री को शर्मसार कर दिया. यह एक ऐसा कदम था जिससे लालू यादव और RJD नाराज हो सकते थे और हुए भी. मनमोहन सिंह ने इसके बाद इस्तीफा तक देना चाहा था.
12 साल बाद, अगस्त 2025 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसी घटना को उठाते हुए राहुल पर 'दोहरे मापदंड' का आरोप लगाया. शाह ने कहा था, 'राहुल गांधी ने मनमोहन सिंह का अध्यादेश क्यों फाड़ा, जो लालू यादव को बचाने के लिए लाया गया था?'
शिवराज पाटिल: 26/11 मुंबई हमलों के दौरान 'कपड़े बदलने' वाले गृहमंत्री
शिवराज पाटिल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री थे. पाटिल को इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का भरोसेमंद माना जाता था, लेकिन 2008 के मुंबई आतंकी हमलों के बाद सुरक्षा व्यवस्था में चूक को लेकर उन पर सवाल उठे. हमले के दौरान वे तीन अलग-अलग कपड़ों में देखे गए, जिसकी जमकर आलोचना हुई. आखिरकार उन्हें गृह मंत्रालय से हटना पड़ा.
राहुल गांधी ने पार्टी में नए चेहरों को तरजीह दी और कई वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया. शिवराज पाटिल उन्हीं में से एक थे. हालांकि, दिसंबर 2025 में शिवराज पाटिल के निधन पर राहुल गांधी ने उन्हें 'ईमानदारी, निस्वार्थ सेवा और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता' के लिए याद किया. हालांकि, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. 2008 में राहुल ने अपनी ही सरकार के गृहमंत्री के खिलाफ नया उदाहरण पेश किया, यानी उन्होंने पार्टी-लाइन से ऊपर 'नैतिकता' को चुना.
लालू यादव: जिसे बचाने का अध्यादेश फाड़ा, उसी के साथ आज गठबंधन
राहुल गांधी ने 2013 में लालू यादव को बचाने वाला अध्यादेश फाड़ दिया था. आज लालू यादव की पार्टी RJD INDIA गठबंधन में कांग्रेस की सहयोगी है. जनवरी 2025 में राहुल गांधी और लालू यादव की पटना में मुलाकात हुई. INDIA गठबंधन के नेतृत्व को लेकर लालू यादव ने ममता बनर्जी का नाम सुझाया, जिसे राहुल के खिलाफ एक संकेत के रूप में देखा गया.
RJD ने राहुल गांधी के 'वोटर अधिकार यात्रा' में स्पॉटलाइट को लेकर भी नाराजगी जताई कि तेजस्वी यादव की कीमत पर राहुल पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है, यानी राहुल ने 2013 में लालू को 'नैतिकता' के नाम पर ठोकर मारी और फिर वही लालू का गुस्सा INDIA गठबंधन में बाधा बना.
2G घोटाला: ए. राजा और कनिमोझी के खिलाफ राहुल का रुख
2G स्पेक्ट्रम घोटाला UPA सरकार के सबसे बड़े विवादों में से एक था. पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा और DMK नेता एम. करुणानिधि की बेटी कनिमोझी इस मामले में आरोपी थे. राहुल गांधी ने इस मामले में DMK नेताओं के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. हालांकि DMK उस समय UPA की सहयोगी थी. दिसंबर 2017 में जब स्पेशल कोर्ट ने ए. राजा और कनिमोझी समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया, तब राहुल गांधी और मनमोहन सिंह ने कनिमोझी से बातचीत की.
राहुल का इस मामले में 'नैतिक रुख' DMK को नागवार गुजरा. जून 2026 में DMK के मुखपत्र 'मुरासोली' ने राहुल पर 'राजनीतिक अपरिपक्वता' और 'बेईमानी' के आरोप लगाए. DMK ने यहां तक कहा कि राहुल गांधी INDIA गठबंधन की एकता को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार हैं.
यह वही DMK है जो आज INDIA गठबंधन का अहम हिस्सा है, लेकिन राहुल के 'नैतिक' रुख ने इस रिश्ते में कड़वाहट पैदा कर दी.
राहुल की नैतिकता का खामियाजा कांग्रेस को क्यों और कैसे भुगतना पड़ता है?
बीजेपी अक्सर कहती है कि राहुल गांधी की नैतिकता ने कांग्रेस के अपने सहयोगियों को नुकसान पहुंचाया है. बीजेपी ने कई मौकों पर कहा, 'राहुल की नैतिकता ने कांग्रेस के जिन सहयोगियों को तबाह किया, बीजेपी उनके साथ खड़ी है.'
1. 'साहस का पुजारी' बनने की कीमत
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, 'राहुल गांधी की नैतिकता एक तरफा है. वे जहां अपनी बहादुरी दिखाते हैं, वहीं अपने सहयोगियों को परेशान कर देते हैं. राहुल गांधी ने खुद को निडर और साहसी नेता के तौर पर पेश करने का मिशन बना लिया है. वे खुद को बहादुर और अपने विरोधियों को समझौतावादी, डरा हुआ या आत्मसमर्पण करने वाला करार देते हैं.'
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राहुल गांधी अक्सर 'नैतिकता' को राजनीतिक सुविधा से ऊपर रखते हैं, लेकिन सियासत में नैतिकता अकेले काम नहीं करती. इसके लिए सहयोगियों को साथ लेकर चलना पड़ता है.
2. गठबंधन सहयोगियों का विश्वास खोना
राहुल गांधी के 'नैतिक' फैसलों का सबसे बड़ा खामियाजा INDIA गठबंधन को भुगतना पड़ता है. DMK के मुखपत्र 'मुरासोली' ने राहुल गांधी पर 'राजनीतिक अपरिपक्वता' और 'बेईमानी' का आरोप लगाया. उसने सवाल किया, 'क्या कांग्रेस को शर्म नहीं आती कि वह पहले अपने सहयोगियों को कमजोर करे और फिर जरूरत पड़ने पर उनका समर्थन मांगे?' DMK ने यहां तक कहा कि कांग्रेस की 'विश्वासघात की हरकतें राहुल गांधी के आशीर्वाद से' की गईं.
केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा था, 'राहुल गांधी का रवैया INDIA गठबंधन को मजबूत नहीं करता. यह अक्सर बीजेपी की मदद करता है.' अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस के रवैये पर नाराजगी जता चुके हैं, यानी गठबंधन के अंदर ही एक बड़ा वर्ग राहुल गांधी के रवैये से खफा है.
3. 'दोहरे मापदंड' का आरोप सबसे तगड़ा हथियार
जब राहुल गांधी अपनी 'नैतिकता' का प्रदर्शन करते हैं, तो बीजेपी तुरंत 'दोहरे मापदंड' का नारा बुलंद कर देती है. 10 अगस्त 2026 को जब रांची में छात्रों पर लाठीचार्ज हुआ तो राहुल ने इसकी निंदा की. बीजेपी ने सवाल किया, 'जब झारखंड में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में है, तो राहुल गांधी वहां क्यों नहीं गए और छात्रों के साथ क्यों नहीं खड़े हुए?'
2026 में जब कांग्रेस ने DMK-led गठबंधन छोड़ा और विजय की सरकार में शामिल हो गई, तो DMK ने कहा, 'राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की बात करते हैं, लेकिन राज्यों में बिल्कुल अलग राजनीति करते हैं.' यही 'दोहरा मापदंड' बीजेपी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन जाता है.
4. 'पॉइजन चूसने' वाले तर्क ने जहर पैदा किया
राहुल गांधी ने INDIA ब्लॉक की बैठक में कहा कि कांग्रेस आलोचना को उसी तरह स्वीकार करेगी जैसे भगवान शिव ने विष पीया था. DMK ने पलटवार किया, 'हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान शिव ने दुनिया को बचाने के लिए विष पीया था, न कि उसे पैदा करने के लिए. INDIA ब्लॉक के अंदर जहर पैदा करने की जिम्मेदारी किसकी है?'
राहुल का 'विष पीने' वाला तर्क उल्टा पड़ गया. सहयोगियों ने कहा कि जहर पैदा तो राहुल ने ही किया है.
5. कांग्रेस पार्टी के अंदर भी बेचैनी
राहुल की 'नैतिकता' का असर कांग्रेस के अंदर भी दिखता है. 2013 में जब उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार का अध्यादेश फाड़ा, तो पूरी सरकार शर्मसार हो गई. मनमोहन सिंह ने इसके बाद इस्तीफा देना चाहा था. अमित शाह ने लालू यादव के मामले में राहुल पर 'असंगतता' का आरोप लगाते हुए कहा, 'जिस लालू को बचाने वाला अध्यादेश राहुल ने फाड़ा, आज उन्हीं लालू को वे सत्ता के लिए गले लगा रहे हैं.'
राजनीतिक सुविधा पर नैतिक तर्क का फायदा क्या?
इंडियन एक्सप्रेस के एक कॉलम में राहुल की इस 'सेल्फ-राइटियसनेस' (आत्म-धार्मिकता) को 'फेटिश वर्शिपर ऑफ करेज' (साहस का पुजारी) कहा गया. साहस को महसूस करना और उस पर अमल करना उनका इकलौता राजनीतिक मिशन रहा है. इस पूरी प्रक्रिया ने उन्हें साहस का पुजारी बना दिया.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी 'राजनीतिक सुविधा पर नैतिक तर्क' को चुनते हैं, जिससे वे अपनी ही सरकार के कदम को तोड़ सकते हैं, अपने वरिष्ठों को शर्मिंदा कर सकते हैं और प्रमुख सहयोगियों को अलग-थलग कर सकते हैं, लेकिन इससे राहुल का ब्रांड एक 'साहसी' और 'नैतिक' नेता के रूप में बनता है.
क्या 'नैतिकता' सियासत में काम आती है?
राजनीति का पुराना सूत्र है- 'साम-दाम-दंड-भेद' यानी समझाना, लालच देना, दंड देना और फर्क पैदा करना. ये चारों हथियार सियासत में काम आते हैं, लेकिन राहुल गांधी ने एक पांचवां हथियार चुना है- 'नैतिकता'. यह हथियार विपक्ष में बैठे नेता के लिए फायदेमंद हो सकता है.
विपक्ष में नैतिकता का दिखावा आसान है, लेकिन जब आपकी ही पार्टी सत्ता में हो (जैसे 2013 में UPA) या आपका सहयोगी सत्ता में हो, तो नैतिकता का दिखावा पार्टी और गठबंधन को कमजोर कर सकता है. राहुल गांधी की 'नैतिकता' सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी.
रशीद किदवई कहते हैं, 'राहुल की नैतिकता एक सोलो प्ले है, जिसका खामियाजा पूरी कांग्रेस और INDIA गठबंधन को भुगतना पड़ता रहा है. जब तक वे अपने सहयोगियों की भावनाओं को भी उतनी ही अहमियत नहीं देंगे, जितनी अपनी नैतिकता को देते हैं, तब तक कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता रहेगा. बीजेपी इसका फायदा उठाती रहेगी.'























