मध्य प्रदेश के दतिया जिले से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है. यहां एक अतिकुपोषित बच्ची की मौत हो गई. यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है. कुछ महीने पहले ही दतिया के इंदरगढ़ इलाके में एक मानसिक रूप से अस्थिर महिला का शव कूड़े के वाहन में मिला था. शुरुआती जांच में सामने आया कि उसकी मौत भूख, प्यास और ठंड की वजह से हुई थी. यह सिर्फ दतिया की कहानी नहीं है, यह पूरे मध्य प्रदेश और देश के कई हिस्सों की दास्तान है. आखिर किस जिले में सबसे ज्यादा कुपोषण है, कौन सा राज्य इस मामले में अव्वल है और इस संकट की जड़ें क्या हैं...
कुपोषण क्या और कितने तरह का होता है?
कुपोषण का मतलब सिर्फ भूखा रहना नहीं है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर को सही मात्रा में सही पोषक तत्व नहीं मिल पाते.
इन तीनों मापदंडों पर नजर डालें तो देश की असली तस्वीर सामने आती है.
दतिया: एक जिले की कहानी, पूरे प्रदेश का आईना
दतिया में क्या हो रहा है, यह समझने के लिए हमें वहां की जमीनी हकीकत देखनी होगी. मध्य प्रदेश की 97,000 आंगनवाड़ियों में बच्चों को साल में 300 दिन पोषण आहार मिलना चाहिए, लेकिन असल में सिर्फ 170 दिन ही आहार मिल पाया. यानी तय लक्ष्य से लगभग आधा आहार ही बांटा जा सका.
रीवा, सागर, देवास, शिवपुरी और होशंगाबाद समेत प्रदेश के सभी 7 पोषण आहार प्लांट भारी घाटे के चलते बंद हो चुके हैं. नई व्यवस्था के लिए अब तक टेंडर तक जारी नहीं हुए. इसका सीधा असर बालाघाट से लेकर दतिया तक मासूम बच्चों पर हो रहा है.
यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं है. दतिया में एक अतिकुपोषित बच्ची की मौत ने इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है.
भारत में कुपोषण में कौन सा राज्य है नंबर वन?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) देश में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति का सबसे भरोसेमंद सोर्स है. NFHS-6 (2023-24) के ताजा आंकड़े मई 2026 में जारी हुए हैं. इनमें 715 जिलों के लगभग 6.79 लाख परिवारों को कवर किया गया.
NFHS-6 के मुताबिक, मध्य प्रदेश देश में बाल कुपोषण के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला राज्य बनकर उभरा है.
- मध्य प्रदेश में 23.8% बच्चे दुबलेपन का शिकार हैं, जो राष्ट्रीय औसत 19% से काफी ज्यादा है. NFHS-5 में यह आंकड़ा 18.9% था. यानी करीब 5 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी.
- प्रदेश में 39.7% बच्चे कम वजन के हैं. राष्ट्रीय औसत 31.8% है. NFHS-5 में यह 33% था. यानी 6.7 प्रतिशत अंकों की भारी बढ़ोतरी.
- एक राहत की बात यह है कि स्टंटिंग में सुधार हुआ है. यह NFHS-5 के 35.7% से घटकर NFHS-6 में 31.4% हो गया.
मध्य प्रदेश ऐतिहासिक रूप से इन मापदंडों पर खराब प्रदर्शन करता रहा है, जिसके कई जिले देश के सबसे खराब जिलों में शामिल हैं.
41.1% के साथ अंडरवेट कैटेगरी में झारखंड सबसे आगे है. वेस्टिंग में झारखंड 22.3% पर है, जो केरल (10.9%) से दोगुने से ज्यादा है. NFHS-5 के मुताबिक, झारखंड में 5 साल से कम उम्र के 39.6% बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं. 34,000 से ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं.
कौन सा जिला है सबसे ज्यादा कुपोषित?
NFHS-5 (2019-21) के आधार पर कुछ जिले बेहद चिंताजनक स्थिति में हैं:
- चित्रकूट (उत्तर प्रदेश): 47.5% बच्चे स्टंटिंग के शिकार हैं, 24.8% वेस्टिंग (दुबलेपन) से पीड़ित हैं और 12% बच्चे गंभीर रूप से दुबले (सीवियर वेस्टिंग) हैं. ये आंकड़े राज्य और राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा हैं.
- गुजरात के आदिवासी जिले: देश के 10 सबसे अधिक गंभीर रूप से कुपोषित जिलों में से 4 गुजरात में हैं. इनमें डांग (22.2% SAM), पंचमहाल (19.7% SAM), तापी और नर्मदा भी इस सूची में शामिल हैं.
- झारखंड के आदिवासी जिले: पश्चिमी सिंहभूम, दुमका, गोड्डा, साहिबगंज, सिमडेगा, चतरा और लातेहार जैसे जिलों में स्थिति सबसे गंभीर है.
- राजस्थान के जिले: परंपरागत रूप से आदिवासी बहुल जिले जैसे उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और बारां में बाल कुपोषण का स्तर उच्च है. नीति आयोग ने जयपुर, बीकानेर, अजमेर, नागौर और अलवर को भी उच्च-बोझ वाले जिलों में स्थान दिया है.
- अन्य उच्च-प्राथमिकता वाले जिले: एक क्रॉस-सेक्शनल विश्लेषण के मुताबिक, पश्चिमी सिंहभूम (झारखंड) और अरवल (बिहार) उच्च-प्राथमिकता वाले जिलों के रूप में उभरे हैं.
संकट की जड़ें: सिर्फ भूख नहीं, सिस्टम की नाकामी
इस भयावह स्थिति के पीछे 5 गहरी वजहें हैं:
1. बजट है पर दम नहीं
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को 2025-26 के बजट में लगभग 26,889.69 करोड़ रुपये आवंटित किए गए. सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के लिए 21,960 करोड़ रुपये का प्रावधान था. 2026-27 के बजट में यह बढ़ाकर लगभग 23,100 करोड़ कर दिया गया. लेकिन संख्याएं धोखा देती हैं.
पोषण से जुड़े जरूरी कार्यक्रमों को सही तरीके से चलाने के लिए सालाना 38,571 करोड़ रुपये की जरूरत थी. 2022-23 के अपडेटेड अनुमान के मुताबिक, यह राशि बढ़कर 48,440 करोड़ रुपये हो गई. यानी जो बजट मिल रहा है, वह जरूरत का आधा भी नहीं है.
2. बुनियादी सुविधाओं की कमी
भारत में 14 लाख से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा बाल विकास कार्यक्रम है. इनमें 8 करोड़ से ज्यादा बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को पूरक पोषण, स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण की सुविधा मिलनी चाहिए.
गुजरात में 2025 की CAG ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, 16,045 आंगनवाड़ी केंद्रों की कमी है. 53,029 केंद्रों में से हजारों जर्जर इमारतों, अस्थायी ढांचों या खुले स्थानों पर चल रहे हैं. शौचालय नहीं हैं, जगह कम है.
3. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कमी
एक कार्यकर्ता को बच्चों का वजन मापना, पोषण आहार बांटना, प्री-स्कूल गतिविधियां चलाना, घर-घर जाकर स्तनपान और पोषण की सलाह देना, रिकॉर्ड रखना और स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय करना होता हैं. इतनी जिम्मेदारी के बदले उन्हें केंद्र सरकार से 4,500 रुपये प्रति माह मिलते हैं. सहायिका को 2,250 रुपये.
राज्यों की तरफ से कुछ अतिरिक्त मिल जाता है तो कुल 6,000 से 15,000 रुपये के बीच पहुंच जाता है. कई राज्यों में सहायिकाओं के पद खाली हैं, जिससे अकेली कार्यकर्ता पूरे केंद्र की जिम्मेदारी संभालती है.
4. स्तनपान का घटता चलन
NFHS-5 में 63.7% बच्चों को छह महीने तक विशेष रूप से स्तनपान मिलता था. NFHS-6 में यह घटकर 55.8% रह गया. उत्तर प्रदेश में तो यह 59.7% से गिरकर 34.6% हो गया. झारखंड और राजस्थान में भी भारी गिरावट. इसके उलट केरल में स्तनपान की दर 55.5% से बढ़कर 72.7% हो गई. यानी समस्या संस्थागत प्रसव की नहीं है. समस्या प्रसव के बाद की देखभाल और सही जानकारी की है.
5. बच्चों को आहार की कमी
6-23 महीने के बच्चों के लिए पर्याप्त आहार का मतलब है- सही मात्रा, सही विविधता और सही आवृत्ति. NFHS-5 में सिर्फ 11% बच्चों को यह मिल पाता था. NFHS-6 में यह बढ़कर 15.3% हुआ, यानी चार साल में 36% की बढ़ोतरी. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि छह में से पांच बच्चे अब भी वह आहार नहीं पा रहे जो उनके विकास के लिए जरूरी है. राजस्थान में यह दर सिर्फ 8.7% है और बिहार में 11.9%.
भारत में कुपोषण की क्या है तस्वीर?
NFHS-6 के ताजा आंकड़े साफ बताते हैं कि मध्य प्रदेश देश में बाल कुपोषण के मामले में सबसे खराब राज्य है, खासकर वेस्टिंग (23.8%) के मामले में. अंडरवेट में झारखंड (41.1%) नंबर एक पर है. जिलों की बात करें तो चित्रकूट (उत्तर प्रदेश) सबसे चिंताजनक स्थिति में है. गुजरात के डांग, पंचमहाल, तापी और नर्मदा जिले गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के मामले में सबसे आगे हैं. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिलों में 60% से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं.
दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित लोग भारत में रहते हैं. 70 करोड़ से ज्यादा भारतीय खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं. 20.6 करोड़ बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य या पोषण तक पहुंच से महरूम हैं. अमीर और गरीब के बीच का यह फर्क ही कुपोषण की दूसरी तस्वीर है.
