Explained: 370 की बिरयानी के बदले जिस्म, 'तुम्हारे पीरियड्स चल रहे' जैसे सवाल.. फिर कहना- मजाक था! क्या है कैजुअल सेक्सिज्म?
Casual Sexism: जब एक पूरा हॉल 370 रुपये की बिरयानी के बदले लड़की के शरीर पर दावा करने वाले चुटकुले पर हंसता है, तो हर दिन हजारों लड़कियों के साथ होने वाली छोटी-बड़ी हिंसा को आम बन जाती है.

एक स्टैंड-अप कॉमेडी शो में ऑडियंस में बैठा 22 साल का हिमांशु जांगड़ा माइक थामे अपनी एक डेट का किस्सा सुना रहा था. उसने 370 रुपये की चिकन बिरयानी खिलाई. फिर उसने कहा, 'मैंने 370 रुपये लगाए हैं, तो उसे वसूल तो करूंगा ही.' उसने बताया कि जब लड़की ने घर जाने को कहा, तो उसने अपने खर्च के बदले शारीरिक फायदा उठाने की कोशिश की और गर्दन पकड़कर जबरदस्ती किस करने लगा. सुनकर कॉमेडियन प्रणित मोरे समेत पूरा हॉल ठहाके लगा रहा था. यह हमारे समाज में रोजमर्रा में बसी उस 'कैजुअल सेक्सिज्म' की एक झलक है, जो चुटकुलों, तानों और 'नॉर्मल' बातों के पीछे छिपकर लड़कियों की गरिमा को रोज सस्ता कर रही है. आइए एक्सप्लेनर में समझते हैं कि 'कैजुअल सेक्सिज्म' क्या है, यह कैसे काम करता है और क्यों साइलेंट किलर है...
सबसे पहले जानते हैं कि कैजुअल सेक्सिज्म क्या है?
'कैजुअल सेक्सिज्म' शब्द सुनते ही लोग सोचते हैं कि यह कोई हल्की-फुल्की बात है. लेकिन असल में यह उन रोजमर्रा की टिप्पणियों, मजाकों, बर्ताव और समझ को कहते हैं, जो जानबूझकर भले न की गई हों, लेकिन महिलाओं को कमतर, कमजोर या सेक्सुअल ऑब्जेक्ट के रूप में पेश करती हैं. इसे 'कैजुअल' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह इतनी आम हो चुकी है कि लोग इसे नोटिस ही नहीं करते. न ही बोलने वाले को पता होता है कि वह गलत है और न ही सुनने वाले को कि वह गलत सुन रहा है.
ऑस्ट्रेलिया की मिनरल्स काउंसिल ने इसे बहुत साफ शब्दों में लिखा है, 'यह अक्सर अनजाने में, 'मजाक' या 'तारीफ' के लिए कहते हैं, लेकिन इसका असर महिलाओं के आत्मविश्वास, करियर और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ता है.'
दूसरे शब्दों में कैजुअल सेक्सिज्म वह 'हल्की' लगने वाली बातें हैं जो धीरे-धीरे यह संदेश देती हैं कि महिलाएं मर्दों के बराबर नहीं हैं. उनकी कीमत उनके शरीर या घरेलू कामों से तय होती है और उनके साथ छेड़छाड़, उनकी इच्छाओं को नजरअंदाज करना या उन पर हंसना कोई बड़ी बात नहीं है. हम सब ऐसी सैकड़ों बातें रोज सुनते और करते हैं, बिना यह सोचे कि वे कितनी गहरी लैंगिक भेदभाव वाली हैं. कुछ सबसे आम उदाहरण देखते हैं:
- कोई कहे, 'तुम तो लड़की होकर इतना अच्छा काम करती हो.' यानी एक तारीफ तो है, लेकिन यह मानकर चल रही है कि लड़की से अच्छा काम करने की उम्मीद नहीं थी.
- जब कोई लड़की गुस्सा होती है या किसी बात पर जोर देती है, तो पूछा जाता है, 'क्या तुम्हें पीरियड्स हो रहे हैं?' यह दिखाता है कि समाज महिलाओं की राय को तब तक नहीं लेता, जब तक वह 'ठंडे दिमाग' से न सोचें.
- किसी मीटिंग में लड़की से हमेशा चाय बनाने या नोट्स लिखने की उम्मीद करना, जबकि लड़के प्रेजेंटेशन दे रहे हों.
- किसी कपल के साथ बैठे हों तो बिल देने वाले शख्स को सिर्फ मर्द को धन्यवाद देना, मानो उसकी पत्नी की कमाई कोई मायने ही नहीं रखती.
- रिश्तेदारों का व्हाट्सएप ग्रुप पर सेक्सिस्ट जोक्स शेयर करना कि बीवी ज्यादा बोलती है या पत्नी ही असली परेशानी है.
- किसी लड़की को 'गर्लफ्रेंड' कहने के बजाय 'किसी की लड़की' कहकर संबोधित करना यह साबित करता है कि वह अपने आप में कोई इंसान नहीं, बल्कि किसी की प्रॉपर्टी है.
'कैजुअल' होने का खतरा ही असल जड़ कैसे?
कैजुअल सेक्सिज्म की सबसे बड़ी चाल यह है कि यह जानलेवा नहीं लगती. यह खुलकर नफरत नहीं फैलाती और न ही किसी पर चिल्लाती है. यह हंसी-मजाक, तारीफों और 'बस मजाक था' के पीछे छिप जाती है. लेकिन यही इसका सबसे बड़ा खतरा है, क्योंकि जब कोई चीज 'आम' हो जाती है, तो उससे सहमत न होना मुश्किल हो जाता है:
- पहले एक 'मजाक' उड़ता है, जैसे 'औरतें गाड़ी नहीं चला सकतीं.'
- यह मजाक कॉमेडी शो, फिल्मों और घर की बातचीत में बार-बार दोहराया जाता है.
- धीरे-धीरे यह 'सच' लगने लगता है. लड़कियां खुद यह मानने लगती हैं कि ड्राइविंग उनके बस की बात नहीं.
- फिर जब कोई लड़की ड्राइविंग में गलती करती है, तो लोग कहते हैं, 'देखा, हम सही कहते थे.'
- और इसी बहाने लड़कियों को भीड़ में आजादी नहीं मिलती.
यही उदाहरण 370 रुपये की बिरयानी वाले मामले में भी देखने को मिला. अगर यही हिमांशु सड़क पर किसी लड़की को परेशान करता, तो शायद लोग उसे पकड़ लेते. लेकिन जब यही सोच एक मंच पर मजाक के रूप में आई, तो वही लोग हंसे. यही कैजुअल सेक्सिज्म की ताकत है. यह हिंसा को नॉर्मल बना देती है और उसे हंसी में घोल देती है.
कॉमेडी और कैजुअल सेक्सिज्म में गलत क्या है?
कैनेडियन संस्था 'रिप्रेजेंटिंग योरसेल्फ' स्टडी के मुताबिक, बहुत से लोग कहते हैं, 'यह तो कॉमेडी है. सब कुछ मजाक होता है.' लेकिन क्या सच में? कॉमेडी का मकसद हंसाना है, न कि किसी को नीचा दिखाना. जब महिलाओं को लगातार मजाक का पात्र बनाया जाता है, तो वह मजाक नहीं, बल्कि प्रोपेगैंडा बन जाता है.
कैजुअल सेक्सिज्म भारतीय कॉमेडी सर्किट में कोई नई चीज नहीं है. सालों से हम ऐसे स्टैंड-अप कॉमेडियन देखते आ रहे हैं जो 'पत्नियां कैसी होती हैं', 'गर्लफ्रेंड कितनी परेशान करती है', 'शादी के बाद आदमी की जिंदगी बर्बाद' जैसे मुद्दों पर चुटकुले सुनाते हैं. ये चुटकुले खुलेआम महिलाओं से नफरत तो नहीं करते, लेकिन वे यह संदेश देते हैं कि महिलाएं एक बोझ हैं, एक समस्या हैं या उनके साथ छेड़छाड़ करना आम बात है.
कैजुअल सेक्सिज्म का शिकार होने पर क्या करें?
अगर कोई लड़की या लड़का कैजुअल सेक्सिज्म का सामना कर रहा है या वह खुद अनजाने में कर रहा है, तो:
- नजरअंदाज मत करो: अक्सर लोग कहते हैं, 'इग्नोर करो, बात बढ़ेगी नहीं.' लेकिन इग्नोर करने से समस्या हल नहीं होती. एक बेहतर तरीका है कि शांति से पूछो, 'आपने यह क्यों कहा? क्या आपको लगता है कि लड़कियों के लिए यह ठीक है?'
- 'यह मजाक था' को चैलेंज करो: जब कोई कहे, 'मजाक था, इतना मत लो,' तो जवाब दो- 'मजाक में भी हम किसी के दर्द का मजाक नहीं उड़ा सकते. क्या आप किसी गरीब को उसकी गरीबी पर मजाक सुनाएंगे? नहीं.'
- आसपास की जुबान बदलो: घर में बच्चों से लेकर ऑफिस के कलीग्स तक, छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दो. जैसे 'लड़की होकर इतना अच्छा करती है' की जगह 'बहुत अच्छा किया' कहो.
- खुद की गलती पर माफी मांगो: कोई भी परफेक्ट नहीं है. अगर कभी अनजाने में तुमसे कोई सेक्सिस्ट टिप्पणी हो जाए, तो तुरंत माफी मांगो.
क्या कैजुअल सेक्सिज्म का निशाना सिर्फ औरतें हैं?
कैजुअल सेक्सिज्म मुख्य रूप से महिलाओं को निशाना बनाता है, लेकिन इसका असर मर्दों पर भी पड़ता है. जैसे- 'लड़के रोते नहीं', 'मर्द बनकर दिखाओ' और 'घर के काम लड़कियों के हैं'. ये भी कैजुअल सेक्सिज्म के ही रूप हैं, जो मर्दों को भी एक सांचे में ढालने की कोशिश करते हैं. हालांकि, महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती हैं.
कैजुअल सेक्सिज्म कोई 'बड़ा' अपराध नहीं लगता. यह बस एक टिप्पणी है, एक मजाक है और एक 'यूं ही' कही गई बात है. अब हर उस इंसान को खुद से पूछना होगा, 'क्या मैं भी वही कर रहा हूं जो उस हंसती हुई भीड़ ने किया था?'
























