पश्चिम बंगाल की शुभेंदु सरकार ने दंगाइयों और असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 को पारित करा लिया. इसके तहत सामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए बिना मुकदमे के 12 महीने तक एहतियाती हिरासत में रखने का प्रावधान होगा. सोमवार को विधानसभा में 41 से मुकाबले 176 मतों से इसे पारित किया गया. बिल पर वोटिंग के दौरान 20 विधायक अनुपस्थित थे.

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बिल का उद्देश्य दंगों को रोकना: शुभेंदु अधिकारी

इस विधेयक को एक सेलेक्ट कमिटी को भेजा गया है, जो 29 दिसंबर 2026 तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सदन में कहा कि 'पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, 2026' का उद्देश्य दंगों और अन्य तरह की हिंसा की रोकथाम करना है. यह विधेयक लाने का औचित्य बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा कानूनों में हिंसा में सीधे या किसी अन्य तरह से शामिल लोगों से संपत्ति के नुकसान की भरपाई करने का कोई प्रावधान नहीं है. मुख्यमंत्री ने सदन को भरोसा दिलाया कि प्रस्तावित कानून गुंडों के प्रति लक्षित है और इसका किसी भी तरह से, यहां तक ​​कि राजनीतिक मकसद के लिए भी, दुरुपयोग नहीं किया जाएगा.

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विपक्ष ने बिल को संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताया

इस बिल को लेकर TMC विधायक कुणाल घोष ने कहा, 'हर कोई गुंडागर्दी को खत्म करना चाहता है, लेकिन हमारे पास पहले से ही IPC और CrPC थे और अब नए कोड भी हैं. पुलिस और जांच एजेंसियों के पास पहले से ही सभी जरूरी नियम और कानूनी धाराएं मौजूद हैं. मुख्यमंत्री द्वारा पेश किया गया बिल संवैधानिक अधिकारों, खासकर आरोपी और नागरिक को मिले अधिकारों के पूरी तरह खिलाफ है. इसमें कई कमियां हैं, लेकिन चूंकि उनके पास बहुमत है इसलिए उन्होंने बस अपनी संख्या के दम पर बिल पास करा लिया.'

बीजेपी विधायक रितेश तिवारी ने इस बिल के पास होने पर कहा, 'ये बहुत अच्छा है. गुंडे जो चारो तरफ घूमते थे, ऐसे लोगों की हिम्मत घटेगी. आम लोग जो कानून पर विश्वास रखते हैं, ऐसे लोगों का हौसला बढ़ेगा और बंगाल में कानून का राज कायम करने में यह बिल महत्वपूर्ण साबित होगा.'

बिल में क्या-क्या प्रावधान?

इस नए बिल के तहत पुलिस और प्रशासन को सख्त अधिकार दिए गए हैं. साथ ही आरोपियों के अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का भी जिक्र किया गया है. इस कानून के दायरे में आने वाले सभी अपराधों को 'संज्ञेय' (Cognizable) और 'गैर-जमानती' (Non-bailable) श्रेणी में रखा गया है. इसका सीधा मतलब ये है कि पुलिस को किसी भी आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए अदालत से वारंट लेने की जरूरत नहीं होगी. ऐसे मामलों में आरोपियों के लिए जमानत मिलना बेहद मुश्किल होगा.

प्रशासन को ये विशेष शक्ति दी गई है कि वे किसी कभी संदिग्ध व्यक्ति की तलाशी ले सकते हैं. अपराध से जुड़े किसी भी दस्तावेज या संपत्ति (चाहे वह चल हो या अचल) को कब्जे में लेने, सील करने या जब्त करने का पूरा अधिकार प्रशासन के पास होगा. यदि कोई आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बचने के लिए छिप जाता है या भाग जाता है तो कानूनन उसके खिलाफ कोर्ट से आधिकारिक उद्घोषणा (Proclamation) जारी करवाई जाएगी. फिर उसकी संपत्तियों को कुर्क या जब्त करने की सख्त कार्रवाई की जाएगी.

आरोपी के अधिकार 

कानून में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था भी है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति को एक तय समय-सीमा के भीतर उसकी गिरफ्तारी की वजह बताई जाएगी और उसे अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा मौका मिलेगा। हालांकि, इसका एक अपवाद भी है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई जानकारी उजागर करने से देश या समाज के व्यापक हित को नुकसान पहुंच सकता है तो वह उस गोपनीय जानकारी को साझा करने से इनकार कर सकती है.

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