पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है. भगवा लहर ऐसी चली कि राज्य की मौजूदा सीएम और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी चुनाव हार गईं. भवानीपुर में बनर्जी को बीजेपी प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी ने पटखनी दी. वहीं, नंदीग्राम से भी अधिकारी मैदान में थे, जहां उन्होंने टीएमसी उम्मीदवार पवित्र कर को हराया है.
नंदीग्राम में कितने वोटों से जीते शुभेंदु?
सुवेंदु अधिकारी ने पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था. यह उनका गृह क्षेत्र भी है. यहां अधिकारी को कुल 1 लाख 27 हजार 301 वोट मिले. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार पवित्र कर को 9 हजार 665 वोट से चुनाव हरा दिया. नंदीग्राम में तीसरे नंबर पर सीपीआई उम्मीदवार शांति गोपाल गिरी रहे. उनको कुल 2 हजार 997 वोट मिले. कांग्रेस उम्मीदवार शेख जरियातुल को यहां केवल 794 वोट मिले. वह पांचवें नंबर पर रहे. 2021 में इसी सीट से अधिकारी ने ममता बनर्जी को हराया था. इसके बाद ममता भवानीपुर से उपचुनाव जीतकर सीएम बनी थीं.
भवानीपुर में कितने वोटों से जीते शुभेंदु अधिकारी?
पश्चिम बंगाल की भवानीपुर सीट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव हार चुकी हैं. भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने उनको 15,105 वोटों की अंतर से चुनाव हराया है. यह दूसरी बार है, जब उन्हें सुवेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा. भवानीपुर में अधिकारी को 73 हजार 917 वोट मिले, वहीं ममता बनर्जी को 58 हजार 812 वोट मिले. सीपीआई प्रत्याशी श्रीजीव बिस्वास को 3556 वोट मिले. वह तीसरे नंबर पर रहे.
टीएमसी गढ़ मानी जाती थी सीट
यह सीट लंबे समय से टीएमसी का गढ़ मानी जाती रही है. इस विधानसभा क्षेत्र के लिए दूसरे चरण में 29 अप्रैल को मतदान हुआ था. ममता बनर्जी के लिए सुवेंदु अधिकारी के हाथों मिली हार इस कारण भी बड़ी थी कि एक समय अधिकारी ममता बनर्जी के खास सहयोगियों में शामिल थे, लेकिन, समय गुजरा और ममता बनर्जी से सुवेंदु अधिकारी ने रास्ते अलग कर लिए और भाजपा में शामिल हो गए. लगातार दो चुनावों में टीएमसी सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सुवेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा.
भवानीपुर का इतिहास राजनीतिक रूप से उतार-चढ़ाव से भरा रहा है. 1951 में अस्तित्व में आने के बाद इस सीट ने कई चुनाव देखे. शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का दबदबा रहा, जबकि एक बार वामपंथी दलों ने भी यहां जीत दर्ज की. बाद में यह सीट कालीघाट के नाम से जानी गई और फिर 2009-2011 के बाद दोबारा अस्तित्व में आई. 2011 के बाद से यह सीट तृणमूल कांग्रेस का गढ़ बनी रही, लेकिन 2026 के चुनाव परिणाम में एक बार फिर टीएमसी का गढ़ ढह गया.
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