नई दिल्ली: सोशल मीडिया में दावा है कि तमिलनाडु से आए किसानों ने मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए सारा ड्रामा रचा था. वो फाइव स्टार होटल का खाना खाते थे और बिसलेरी का पानी पीते थे. सब कुछ कॉरपोरेट स्टाइल में रचा बुना गया था. सच आखिर है क्या? क्या देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर तमिलनाडु से आए इन किसानों ने इसलिए मुंह में चूहा दबाया था ताकि दुनिया भर में मोदी सरकार की थू-थू हो सके? जनता के विरोध की जमीन माने जाने वाले जंतर-मंतर पर किसानों ने बोतल में भरकर क्या इसलिए पेशाब पी थी ताकि दुनिया के बाकी देश हमारे किसानों की दुर्दशा पर भारत को कटघरे में खड़ा कर सकें? 140 साल के सबसे बड़े सूखे से लड़ते तमिलनाडु के किसानों ने अपने मुंह में मरा हुआ सांप दबाया. ये सांप इन्हें किसने लाकर दिए थे? अपनी आवाज को देश की सरकार तक पहुंचाने के लिए ये किसान अपने गले में दूसरे किसानों का नरमुंड लटकाकर घूमने लगे? ये नरमुंड किसानों तक किसने पहुंचाए थे? देश की राजधानी दिल्ली से 2600 किलोमीटर दूर तमिलनाडु से आए किसान प्रदर्शन के 34वें दिन साड़ियां पहनकर बैठे और चूड़ियां तोड़ने लगे. 40 दिन तक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले इन किसानों ने कभी अपने कपड़े फाड़ कर पागलों की तरह बर्ताव किया तो कभी आधा सिर और मूंछे मुंडवा लीं. प्रदर्शन के लिए इन किसानों को ऐसे नए-नए कॉरपोरेट आइडिया कौन देता था? इन्हें ये कौन बताता था कि कभी मुंह पर काली पट्टी बांधकर बैठना है तो कभी दुनिया को ये दिखाना कि अगर मांगे नहीं मानी गईं तो वो फांसी के फंदे पर झूल जाएंगे. इनके प्रदर्शन को डिजायनर बनाने के पीछे किसका दिमाग था? वो क्या था जिसने इस पूरे प्रदर्शन को ऐसा कर दिया था, जिसने हर आंख को इनके प्रदर्शन की तरफ मोड़ दिया था? ये सारे सवाल सोशल मीडिया उठा रहा है. दावा है कि तमिलनाडु से आए 100 किसानों का जंतर-मंतर पर प्रदर्शन मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश था. किसानों की खाना खाती तस्वीरों के साथ फेसबुक पर लिखा गया- ‘’अभी एक मित्र ने जानकारी दी कि ये किसान फर्जी हैं. वामपंथी गिरोह इनको लेकर आया है उसने जंतर-मंतर पर खुद देखा है. इनको मिनरल वॉटर दिया जाता है. फर्स्ट क्लास सागर रत्ना रेस्तरां से खाना आता है. कॉफी और चाय अनलिमिटेड होती है. ये तमिलनाडु सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलते. मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए दिल्ली में बैठे हैं.’’ हैरान करने वाली बात ये है कि जिस दिन तमिलनाडु के किसानों का जंतर- मंतर पर पर प्रदर्शन खत्म हुआ उसी दिन से सोशल मीडिया ऐसे दावों की बाढ़ आ गई. सिर्फ मैसेज नहीं घूम रहा था मैसेज के साथ घूम रही थीं कुछ तस्वीरें जिसमें किसान एक जैसी प्लेट में खाना खा रहे हैं और बोतलबंद पानी पीते हुए दिखाए जा रहे हैं. इन तस्वीरों पर लोग जिस तरह की प्रतिक्रिया दे रहे थे उसे देखकर लग रहा था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर किए गए दावे को सच मान लिया है. लेकिन बिना किसी दावे की पड़ताल हुए उसे सच कैसे माना जा सकता है? बिना तहकीकात इस नतीजे पर कैसे पहुंचा जा सकता है कि किसान झूठे हैं और दावे सच्चे. 14 मार्च को तमिलनाडु के 100 किसानों ने सरकार से ये मांग करते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया था कि उनका कर्ज माफ किया जाए और सूखे की समस्या से निपटने के लिए सरकार उनकी मदद करे. लेकिन सवाल ये है कि क्या 140 साल के सबसे बड़े सूखे से तबाह किसानों की बदहाली बताने वाले ये किसान झूठे थे? क्या इनके पीछे सरकार को बदनाम करने की कोई साजिश रची गई थी? ये आरोप गंभीर थे क्योंकि इस बार आरोप देश के अन्नदाता यानि हमारे किसानों पर लगा था. जो तमाम मुश्किलों से गुजरते खून पसीना एक करके बंजर जमीन पर भी फसल उगाते हैं. इस दावे का सच सामने आना जरूरी था लेकिन किसान जंतर-मंतर पर प्रदर्शन खत्म करके अपने घर तमिलनाडु वापस लौट चुके थे. वायरल सच को दावे की तह तक पहुंचना था इसलिए हमने देश के दो कोनों में इसकी पड़ताल शुरू की. वायरल सच इन्वेस्टीगेशन की एक टीम ने दिल्ली में पड़ताल शुरू की और दूसरी टीम ने दिल्ली से 2600 किमी दूर तमिलनाडु में. तमिलनाडु में इसलिए ताकि हम किसानों तक पहुंच सके जिन्हें आपने जंतर मंतर पर देखा था. वीडियो में देखिए आखिर सच क्या है?