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Explained: मध्यस्थता के खिलाफ एकमत क्यों हिंदू-मुस्लिम? संभल, वाराणसी और मथुरा विवाद समझौता ठुकराने के क्या नतीजे?

UP Temple Mosques Disputes: काशी, मथुरा और संभल में मध्यस्थता का रास्ता बंद होने के बाद अब ये तीनों शहर देश की सबसे बड़ी कानूनी जंग के अखाड़े बन गए हैं. एक तरफ आस्था है, तो दूसरी तरफ कानून.

काशी, मथुरा और संभल तीन बड़े धार्मिक विवाद. तीन ऐतिहासिक शहर और दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की सुप्रीम कोर्ट की एक कोशिश. लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ने एक सुर में कहा, 'नहीं, हमें कोर्ट का फैसला चाहिए, समझौता नहीं.' यह एक ऐसा अनोखा मोड़ है जहां आमतौर पर आमने-सामने खड़े रहने वाले दोनों धड़े, मध्यस्थता ठुकराने पर एकमत हो गए. आखिर ऐसा क्यों हुआ, सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता क्यों कराना चाहती है और आगे रास्ते क्या बचे हैं...

सबसे पहले जानिए, ये तीनों मामले हैं क्या?

1. काशी (ज्ञानवापी मस्जिद विवाद)  

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मंदिर से सटा यह विवाद सदियों पुराना है. हिंदू पक्ष का दावा है कि औरंगजेब ने 1669 में यहां एक भव्य शिव मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई थी. उनकी मांग है कि मस्जिद की जमीन उन्हें सौंपी जाए और वहां नियमित पूजा का अधिकार दिया जाए. मुस्लिम पक्ष ने पूजा स्थल अधिनियम 1991 का हवाला दिया और कहा कि मस्जिद वक्फ बोर्ड की संपत्ति है. सदियों से वहां नमाज होती आ रही है. फिलहाल यह मामला वाराणसी की सिविल कोर्ट में चल रहा है और साथ ही सुप्रीम कोर्ट में भी कई याचिकाएं लंबित हैं.

 

मुस्लिम पक्ष की मांग है कि मस्जिद में मुस्लिमों के नमाज के अधिकार सुरक्षित रहें
मुस्लिम पक्ष की मांग है कि मस्जिद में मुस्लिमों के नमाज के अधिकार सुरक्षित रहें

2. मथुरा (शाही ईदगाह विवाद)

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद आमने-सामने हैं. हिंदू पक्ष का कहना है कि भगवान कृष्ण का जन्मस्थान होने के नाते यह जमीन मंदिर की है और औरंगजेब के आदेश पर 1670 में मंदिर का एक हिस्सा गिराकर वहां ईदगाह बना दी गई. याचिकाकर्ताओं ने पूरी 13.37 एकड़ जमीन पर अपना दावा पेश किया है. मुस्लिम पक्ष 1968 के एक समझौते का हवाला देता है, जिसके तहत दोनों पक्षों ने जमीन को लेकर अपने-अपने हक मान लिए थे. यहां भी मामला कोर्ट में विचाराधीन है और सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

 

हिंदू पक्ष की मांग है कि शाही ईदगाह मस्जिद हटाई जाए
हिंदू पक्ष की मांग है कि शाही ईदगाह मस्जिद हटाई जाए

3. संभल (शाही जामा मस्जिद विवाद)

यह तीसरा और नया उभरता विवाद है. उत्तर प्रदेश के संभल में स्थित शाही जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मूल रूप से एक प्राचीन हरिहर मंदिर था, जिसे बाबर के समय में तोड़कर मस्जिद में बदल दिया गया. हाल ही में यहां एक सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिससे यह मामला देश भर में सुर्खियों में आ गया. अभी यह विवाद स्थानीय अदालत में है, जहां हिंदू पक्ष ने मस्जिद परिसर में पूजा की अनुमति मांगी है.

 

मुस्लिम पक्ष की मांग है कि मस्जिद को ऐतिहासिक और वैध मस्जिद माना जाए
मुस्लिम पक्ष की मांग है कि मस्जिद को ऐतिहासिक और वैध मस्जिद माना जाए

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश क्यों की?

सुप्रीम कोर्ट इन तीनों विवादों को लेकर एक साथ सुनवाई कर रही थी. बार एंड बेंच के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की सोच यह थी कि इन मामलों में ऐतिहासिक और धार्मिक भावनाएं इतनी गहरी हैं कि अदालती फैसले चाहे जो भी आएं, एक पक्ष की नाराजगी तय है. ऐसे में कोर्ट ने अयोध्या मामले की तर्ज पर 'कोर्ट-मॉनिटर्ड मीडिएशन' यानी अदालत की निगरानी में सुलह का रास्ता सुझाया.

इसके पीछे मकसद सिर्फ कानूनी पेंच खत्म करना नहीं था, बल्कि एक ऐसा समाधान निकालना था जिससे आपसी सौहार्द बना रहे और आगे कोई टकराव न हो. लेकिन जब कोर्ट ने दोनों पक्षों से इस पर राय मांगी, तो जवाब ने सबको चौंका दिया.

मध्यस्थता के नियम क्या होते हैं?

अदालत की निगरानी में मध्यस्थता कोई आम सुलह-सफाई नहीं होती. इसके पीछे एक पूरा कानूनी ढांचा काम करता है:

  • यह मध्यस्थता पूरी तरह से गोपनीय प्रक्रिया होती है.
  • दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात एक न्यूट्रल मध्यस्थ यानी मीडिएटर के सामने रखते हैं.
  • मध्यस्थ कोई फैसला नहीं सुनाता, बल्कि दोनों को एक ऐसे समाधान तक लाने की कोशिश करता है जो दोनों को मंजूर हो.
  • अगर बात नहीं बनती, तो यह प्रक्रिया बंद कर दी जाती है और मामला वापस कोर्ट में चला जाता है.
  • मध्यस्थता के दौरान कही गई कोई भी बात या दी गई कोई भी पेशकश, अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं की जा सकती.
  • इसके लिए दोनों पक्षों की राजी होना पहली और अनिवार्य शर्त है.

तो फिर दोनों पक्षों ने मध्यस्थता क्यों ठुकराई?

यहीं पर यह पूरा मामला दिलचस्प हो जाता है. दोनों पक्षों के वकीलों ने एक ही रुख अपनाया, 'हमें मध्यस्थता नहीं चाहिए.' लेकिन दोनों की अपनी-अपनी दलीलें हैं.

हिंदू पक्ष की दलील:  

  • तीनों जगहों पर ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूत इस बात के मौजूद हैं कि वहां पहले भव्य मंदिर थे. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट्स में भी इसके संकेत मिले हैं.
  • जब सच्चाई हमारे पक्ष में है और सबूत मौजूद हैं, तो फिर समझौता क्यों किया जाए?
  • उन्हें पूरा भरोसा है कि अदालत उनके हक में फैसला सुनाएगी और उन्हें पूरी जमीन मिलेगी.
  • मध्यस्थता में बीच का रास्ता निकालने का मतलब होगा अपने हक से समझौता करना, जो उन्हें मंजूर नहीं.

मुस्लिम पक्ष की दलील:

  • पूजा स्थल अधिनियम, 1991 कहता है कि 15 अगस्त 1947 को किसी भी धार्मिक स्थल का जो स्वरूप था, उसे बदला नहीं जा सकता. सिर्फ अयोध्या विवाद को इससे अलग रखा गया था.
  • मुस्लिम पक्ष का कहना है कि जब संसद का बनाया कानून ही यह कहता है कि 1947 में जो मस्जिद थी, वह मस्जिद ही रहेगी, तो फिर मुकदमे की सुनवाई की गुंजाइश ही कहां बचती है?
  • मुस्लिम पक्ष का मानना है कि इन मुकदमों के होने पर ही सवाल है और ऐसे में समझौते का सवाल ही नहीं उठता.
  • इस्लामी कानून के तहत एक बार किसी जमीन को मस्जिद के लिए वक्फ कर दिया जाए, तो उसे वापस नहीं लिया जा सकता.
  • इस वजह से वे भी किसी भी तरह के समझौते से इनकार करते हुए सीधे कानूनी लड़ाई के पक्ष में हैं.

'नफरत' में भी एकता: दोनों एकमत कैसे हुए?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि एक तरफ हिंदू पक्ष जहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूतों के दम पर कोर्ट से पूर्ण न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम पक्ष संवैधानिक कानून की आड़ में पूरी कानूनी प्रक्रिया को ही चुनौती दे रहा है. दोनों के इनकार की वजहें बिल्कुल अलग हैं, लेकिन मंजिल एक ही है. यह अपने-आप में एक विरोधाभासी 'एकता' है, जहां दोनों को लगता है कि कानूनी जीत का ताज उन्हीं के सिर सजेगा.

मध्यस्थता ठुकराने के बाद अब आगे क्या रास्ते बचे हैं?

दोनों पक्षों के इनकार के बाद सुप्रीम कोर्ट के पास मध्यस्थता को आगे बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं बचता. अब सारे मामले अपने-अपने निचली अदालतों में वापस लौट जाएंगे:

  • निचली कोर्ट में सुनवाई तेज होगी: अब वाराणसी, मथुरा और संभल की सिविल कोर्टें इन मामलों की रोजाना सुनवाई करेंगी. इसमें दोनों पक्षों की दलीलें, गवाहों के बयान और सबूतों की परख होगी.
  • ASI रिपोर्ट और सबूत: काशी और मथुरा में ASI सर्वे की रिपोर्ट्स पहले ही कोर्ट में जमा हो चुकी हैं. हिंदू पक्ष इन्हीं के दम पर अपना केस लड़ेगा, जबकि मुस्लिम पक्ष इन रिपोर्ट्स की विश्वसनीयता और कानूनी वैधता को चुनौती देगा.
  • पूजा स्थल अधिनियम पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: इन सभी मामलों की सबसे बड़ी अड़चन पूजा स्थल अधिनियम, 1991 है. इस कानून की संवैधानिक वैधता को पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. अगर सुप्रीम कोर्ट इस कानून को रद्द कर देता है, तो हिंदू पक्ष के लिए तीनों मुकदमों की राह आसान हो जाएगी. अगर कानून बरकरार रहता है, तो मुस्लिम पक्ष का पलड़ा भारी हो जाएगा और हो सकता है कि मुकदमे वहीं खत्म हो जाएं.
  • लंबी कानूनी लड़ाई तय: इन मामलों में निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक अपील का सिलसिला चलता रहेगा. यह एक ऐसी कानूनी मैराथन है जो सालों नहीं, दशकों तक खिंच सकती है.

इस लंबी कानूनी लड़ाई का निचोड़ क्या है?

काशी, मथुरा और संभल में मध्यस्थता का रास्ता बंद होने के बाद अब ये तीनों शहर देश की सबसे बड़ी कानूनी जंग के अखाड़े बन गए हैं. एक तरफ आस्था है, तो दूसरी तरफ कानून. इन दोनों के बीच से जो भी रास्ता निकलेगा, वह देश की सामाजिक बुनावट और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल जरूर बनेगा.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें करीब 9 साल का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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