दक्षिणी राज्यों की ताकत घटाने की साजिश? लोकसभा सीट बढ़ाने के प्रस्ताव पर CM रेवंत रेड्डी का बड़ा सवाल
Telangana Politics: रेवंत रेड्डी ने कहा कि महिला आरक्षण, परिसीमन और सीटें बढ़ाना तीनों अलग विषय हैं. उन्होंने मौजूदा सीटों के तहत ही 33% आरक्षण को लागू करने और बिना सीट बढ़ाए परिसीमन कराने की बात कही.

- तेलंगाना सीएम ने लोकसभा सीटें बढ़ाने पर जताई चिंता
- दक्षिण राज्यों को कमजोर कर सकती है जनसंख्या आधारित वृद्धि
- सीएम ने सर्वदलीय बैठक और हाइब्रिड मॉडल का सुझाव दिया
- महिला आरक्षण और परिसीमन पर अलग से हो विचार
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर सीटों का विस्तार केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो इससे दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है.
रेवंत रेड्डी ने पीएम मोदी को लिखा पत्र
रेवंत रेड्डी ने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा और सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है. उनका कहना है कि इतना बड़ा फैसला बिना आम सहमति के नहीं लिया जाना चाहिए. सिर्फ केंद्र ही नहीं, बल्कि उन्होंने तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और पुडुचेरी के मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखकर दक्षिणी राज्यों से एकजुट होने की अपील की है. उनका संदेश साफ है. अगर यह प्रस्ताव लागू होता है, तो दक्षिण भारत को सामूहिक रूप से अपनी आवाज उठानी होगी.
सीट विस्तार के प्रस्ताव पर बोले मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री ने इस पूरे मुद्दे को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटते हुए स्पष्ट किया कि महिलाओं का आरक्षण, परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाना. ये तीनों अलग विषय हैं. उन्होंने मौजूदा 543 सीटों के भीतर ही 33% महिला आरक्षण को तुरंत लागू करने का समर्थन किया. साथ ही बिना सीट बढ़ाए परिसीमन कराने की भी वकालत की.
रेवंत रेड्डी ने हाइब्रिड मॉडल का दिया सुझाव
रेवंत रेड्डी ने यह भी कहा कि दक्षिणी राज्यों ने विकास और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन अगर सीटों का बंटवारा केवल जनसंख्या के आधार पर होगा, तो इसका फायदा उन राज्यों को मिलेगा जहां आबादी ज्यादा है. इससे एक तरह का अन्यायपूर्ण संतुलन पैदा होगा. समाधान के तौर पर उन्होंने एक हाइब्रिड मॉडल का सुझाव दिया है. इस मॉडल के तहत आधी सीटें जनसंख्या के आधार पर और बाकी आधी आर्थिक प्रदर्शन व विकास के मानकों के आधार पर तय की जाएं. उनका मानना है कि इससे संघीय ढांचे में संतुलन बना रहेगा और सभी राज्यों के साथ न्याय होगा.
यह मुद्दा अब धीरे-धीरे राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. जहां आने वाले समय में केंद्र और राज्यों के बीच टकराव की स्थिति भी बन सकती है.
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Source: IOCL


























