सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (24 मार्च, 2026) को कहा कि शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) की महिला अधिकारी परमानेंट कमीशन की हकदार हैं. कोर्ट ने माना कि सिस्टम में महिलाओं को असमानता का सामना करना पड़ा है. कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में व्यवस्था दी कि मनमाने मूल्यांकन के चलते स्थाई कमीशन से वंचित की गईं भारतीय सशस्त्र बलों की महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी पूर्ण पेंशन लाभ की हकदार हैं.

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने फैसले में कहा कि स्थाई कमीशन से वंचित सैन्य महिला अधिकारियों की सेवा को 20 साल का मानकर पेंशन लाभ दिया जाए, जिनके नाम पर बोर्ड ने 2019, 2020 और 2021 में विचार किया था. कोर्ट ने कहा कि इन  अधिकारियों के संबंध में पेंशन के लिए जरूरी न्यूनतम 20 साल की सेवा पूरी कर ली गई मानी जाएगी, भले ही उन्हें इस अवधि से पहले सेवा से मुक्त कर दिया गया हो.

यह निर्णय विंग कमांडर सुचेता एडन और अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर आया, जिनमें 2019 में नीतिगत बदलावों और पिछले सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के फैसलों के आधार पर स्थाई कमीशन न दिए जाने को चुनौती दी गई थी.

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फैसले के मुख्य भागों को पढ़ते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिला अधिकारियों के लिए वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) को अक्सर इस धारणा के तहत श्रेणी प्रदान की जाती है कि वे करियर में प्रगति या स्थाR कमीशन के लिए पात्र नहीं होंगी.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, 'एसीआर इस धारणा के साथ लिखी गई कि उनके करियर में कोई प्रगति नहीं होगी. इससे उनकी समग्र योग्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. बेंच ने वायुसेना, नौसेना और थलसेना की शॉर्ट सर्विस कमीशन  महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन से वंचित किए जाने के मामले पर अलग-अलग विचार किया.

वायुसेना के संबंध में बेंच  ने पाया कि 2019 में पेश किए गए सेवा अवधि मानदंड और न्यूनतम प्रदर्शन मानदंड को जल्दबाजी में लागू किया गया था, जिससे अधिकारियों को उन्हें पूरा करने का उचित अवसर नहीं मिला.

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए बेंच ने कहा कि एक बार के उपाय के रूप में, 2019, 2020 और 2021 में चयन बोर्डों में स्थायी कमीशन के लिए विचार किए गए सभी एसएससी अधिकारियों को 20 वर्ष की अर्हक सेवा पूरी कर चुका माना जाएगा, जिनमें 2021 में सेवा से मुक्त किए गए अधिकारी भी शामिल हैं.

संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय करने के लिए कोई भी आदेश पारित करने का अधिकार देता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पेंशन 20 साल की मानी गई सेवा के आधार पर तय की जाएगी, जो 1 नवंबर, 2025 से प्रभावी होगी. हालांकि, कोर्ट ने कार्यात्मक प्रभावशीलता का हवाला देते हुए बहाली का आदेश देने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि यह वित्तीय लाभों से वंचित करने का आधार नहीं हो सकता.

थलसेना और नौसेना से संबंधित मुद्दों के संदर्भ में, कोर्ट ने मूल्यांकन मॉडल में समान खामियां पाईं और कहा कि मूल्यांकन मानदंडों का खुलासा न करने से इन अधिकारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. कोर्ट ने मानी गई समयसीमा के आधार पर सक्रिय सेवा में न रहने वाले अधिकारियों के लिए विंग कमांडर की रैंक पर पदोन्नति के आग्रह से संबंधित याचिका को खारिज कर दिया.

इससे पहले, केंद्र ने अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा था कि सेना की प्रक्रियाएं लिंग-तटस्थ हैं और सेवा मुक्त करना बल को युवा बनाए रखने की नीति का हिस्सा है.

 

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