सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (15 जून, 2026) को एक आरटीआई एक्टिविस्ट की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि आजकल आरटीआई अर्जी दायर करना एक नया धंधा बन गया है. कोर्ट ने आरटीआई एक्टिविस्ट राकेश कुमार बहल के साथ उनका साथ देने वाले अन्य लोगों की अग्रिम जमानत अर्जी भी खारिज कर दी है. इन लोगों पर सड़क निर्माण का कार्य कर रहे सरकारी लोगों के काम को बाधित करने का आरोप है. 

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पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगियों को खूब फटकार लगाई और सड़क निर्माण कार्य की निगरानी करने के उनके अधिकार पर सवाल उठाए.

जस्टिस संदीप मेहता ने कहा, 'आरटीआई अर्जी दायर करना एक नया धंधा बन गया है. केंद्र सरकार ने निधि जारी कर दी है, यह सड़क निर्माण के कार्य की देखरेख करेगी. आपकी इसमें कोई भूमिका नहीं है. तथाकथित आरटीआई एक्टिविस्ट! याचिका खारिज की जाती है.'

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जस्टिस संदीप मेहता की राय से सहमति जताते हुए जस्टिस बिश्नोई ने कहा, 'इन सभी सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले आप कौन होते हैं? क्या आप कोई बड़े अधिकारी हैं...?' राकेश कुमार बहल ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था.

राकेश कुमार बहल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि उन्हें इस मामले में फंसाया गया है, क्योंकि उन्होंने सड़क निर्माण कार्य में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर किया था. प्राथमिकी के अनुसार, राकेश बहल ने एक अन्य आरोपी राजीव कुमार उर्फ ​​मिंटू के साथ मिलकर पंजाब के गुरदासपुर जिले के बटाला में जारी सड़क निर्माण कार्य में कथित तौर पर व्यवधान डाला और उस व्यक्ति को धमकाया, जिसकी देखरेख में यह काम हो रहा था. इसके अलावा, निर्माण स्थल पर मौजूद मजदूरों को भी धमकाया.

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उन्होंने मजदूर के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की और शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाई. आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की संबद्ध धाराओं के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई.

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 14 मई को अपने आदेश में कहा था कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों से सरकारी काम में बाधा डालने में उनकी विशिष्ट और सीधी भूमिका का पता चलता है, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार किया जाता है.

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