कारण बताओ नोटिस जारी कर कर्मचारी का VRS टालने की कोशिश, सुप्रीम कोर्ट ने बैंक को लगाई फटकार- ऐसा नहीं कर सकते....
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि बैंक से नौकरी छोड़ने के लगभग 8 महीने बाद, संदिग्ध लेन-देन के संबंध में 5 मार्च, 2012 को कर्मचारी के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल, 2026) को कहा कि कोई एंप्लॉयर कारण बताओ नोटिस जारी करके एंप्लॉइ को वॉलेंट्री रिटायरमेंट यानी वीआरएस लेने से नहीं रोक सकता है. कोर्ट ने कहा कि वीआरएस नौकरी छोड़ने या काम बंद करने की क्रिया नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार है जो निर्धारित वर्षों की सेवा पूरी होने के बाद प्राप्त होता है.
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती देने वाली अपीलों पर यह फैसला सुनाया. एक बैंक ने ये अपील दायर की थीं. बैंक ने एक एंप्लॉइ को कारण बताओ नोटिस जारी किया हुआ है, जबकि उस कर्मचारी की वीआरएस की एप्लीकेशन पेंडिंग थी. हालांकि, एप्लीकेशन पर तीन महीने में फैसला लेना था, लेकिन बैंक ने उस पर कोई फैसला नहीं लिया इसलिए कर्मचारी ने अवधि पूरी होने के बाद बैंक का काम बंद कर दिया. बैंक ने वीआरएस एप्लीकेशन पर फैसला नहीं लिया और लेन-देन के कुछ मामलों को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के बजाय एंप्लॉइ के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया.
हाईकोर्ट ने बैंक को कर्मचारी को सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान करने का निर्देश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के नोटिस में निर्दिष्ट तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद या काम पर आना बंद करने की तारीख से, उसे स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त माना जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि कर्मचारी की नियुक्ति सितंबर 1983 में हुई थी और अप्रैल 2007 में उसे प्रबंधक के पद पर पदोन्नत किया गया. कोर्ट ने कहा कि जुलाई 2010 में, रायपुर शाखा प्रबंधक के रूप में काम करते समय, दो खातों में कुछ संदिग्ध लेनदेन बैंक के संज्ञान में आए. इस बीच, बैंक कर्मचारी ने 4 अक्टूबर, 2010 को महाप्रबंधक को वीआरएस का नोटिस भेजा और इसके जवाब में, क्षेत्रीय कार्यालय ने पेंशन नियमों के तहत नया आवेदन मांगा.
बाद में, वीआरएस के लिए नोटिस में निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण, कर्मचारी ने 16 मई, 2011 से बैंक में काम करना बंद कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि बैंक से नौकरी छोड़ने के लगभग 8 महीने बाद, संदिग्ध लेन-देन के संबंध में 5 मार्च, 2012 को उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया.
बाद में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को अस्वीकार किए जाने और शुरू की गई जांच और बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील की. अपीलों पर सुनवाई करते हुए, बेंच ने पेंशन और सेवा नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों का उल्लेख किया.
बेंच ने कहा, '... यह स्पष्ट है कि अगर कोई कर्मचारी 1 नवंबर 1993 को या उसके बाद 20 सालों की अर्हक सेवा पूरी कर लेता है और नियुक्ति प्राधिकारी को कम से कम तीन महीने का नोटिस देता है, तो वह स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हो सकता है.'
बेंच ने कहा कि स्वेच्छा से सेवानिवृत्त होने की मंशा दर्शाने वाला तीन महीने का नोटिस 4 अक्टूबर 2010 को दिया गया था और यह अवधि 4 जनवरी 2011 को समाप्त होनी थी, लेकिन नोटिस अवधि के भीतर इसे अस्वीकार करने का आदेश नहीं दिया गया.
कोर्ट ने कहा कि नोटिस अवधि समाप्त होने और काम बंद किए जाने के बाद 29 जून 2011 को दी गई अस्वीकृति निरर्थक थी. बेंच ने कहा कि बैंक की ओर से 11 नवंबर 2010 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, लेकिन इससे सेवा नियमों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की मंशा का संकेत नहीं मिलता है.
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के निर्देशानुसार, कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले सभी लाभों का हकदार होगा. कोर्ट ने बैंक को निर्देश दिया कि वह तीन महीने के भीतर ब्याज समेत सभी बकाया राशि का भुगतान करे.
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Source: IOCL


























