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'अदालत में जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता', बोला सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धाराएं 467, 468 और 471 उन अपराधों से संबंधित हैं, जो सार्वजनिक और कानूनी दस्तावेजों की प्रमाणिकता और शुचिता को कमजोर करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (23 जून, 2026) को कहा कि न्यायिक कार्यवाही में जालसाजी और नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल गंभीर अपराध हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब वह एक व्यक्ति को न्यायिक कार्यवाही के तहत मुचलके के तौर पर जाली राजस्व दस्तावेज का इस्तेमाल करने को लेकर मिली पांच साल की सजा में बदलाव कर रही थी.

बेंच ने कहा, 'इसमें कोई शक नहीं है कि न्यायिक कार्यवाही में जालसाजी और नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल गंभीर अपराध हैं. भारतीय दंड संहिता की धाराएं 467 (धोखाधड़ी), 468 (धोखाधड़ी के मकसद से जालसाजी) और 471 (नकली दस्तावेज का इस्तेमाल) उन अपराधों से संबंधित हैं, जो सार्वजनिक और कानूनी दस्तावेजों की प्रमाणिकता और शुचिता को कमजोर करते हैं. अदालत के सामने नकली दस्तावेजों के इस्तेमाल को हल्के में नहीं लिया जा सकता.'

बेंच ने कहा कि सजा तय करते समय, अदालत को अपराध की प्रकृति और उससे जुड़े तथ्यों और हालात, आरोपी की भूमिका, जेल में बिताई गई अवधि, बीते समय और सजा तय करने के नियमों से जुड़ी अन्य राहत देने वाली परिस्थितियों के बीच संतुलन बनाना होता है. बेंच के अनुसार, 'सजा तय करने की प्रक्रिया में ‘आनुपातिकता का सिद्धांत’ अहम है. सजा तय करने को सिर्फ बदला लेने की कार्रवाई नहीं माना जा सकता, जो मामले के तथ्यों और अपराधी की परिस्थितियों से अलग हो.'

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित घटना 2014 की है और वह व्यक्ति एक दशक से ज्यादा समय से आपराधिक कार्यवाही के साये में जी रहा है. बेंच ने कहा, 'इस अदालत के सामने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया है जिससे पता चले कि अपीलकर्ता आदतन अपराधी है या वह मौजूदा घटना से पहले या बाद में किसी ऐसी ही आपराधिक गतिविधि में शामिल रहा हो.'

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मामला संगठित अपराध, बड़े पैमाने पर आर्थिक धोखाधड़ी, सरकारी संस्थानों को प्रभावित करने वाली सुनियोजित जालसाजी या बार-बार की जाने वाली ऐसी धोखाधड़ी से जुड़ा नहीं है, जिससे बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान हुआ हो.

बेंच ने सजा को घटाकर उतनी ही अवधि का कर दिया, जितनी सजा वह व्यक्ति पहले ही काट चुका है. बेंच ने कहा, 'हालांकि अपराध को हल्के में नहीं लिया जा सकता, लेकिन सजा अंततः मामले के तथ्यों और अपराध की गंभीरता के अनुपात में ही होनी चाहिए.' उस व्यक्ति ने इस मामले में दो साल से ज्यादा समय जेल में बिताया था.

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Input By : PTI

About the author नीलम

नीलम पिछले आठ सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही हैं. वह मुख्य रूप से पॉलिटिकल, वर्ल्ड और नेशनल मुद्दों पर खबरें लिखती हैं. साथ ही एंटरटेनमेंट बीट पर भी काम कर चुकी हैं. उनके पास विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम करने का अनुभव है. नीलम ने पत्रकारिता की पढ़ाई जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी से की है और बायोलॉजी में बीएससी किया है.

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