मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग सुनने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है. याचिकाकर्ता का कहना था कि जो लोग मतदान न करें, उन्हें सरकारी सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए. कोर्ट ने इस मांग को अव्यवहारिक बताया है. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता सरकार के सामने अपनी बात रखें.

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अजय गोयल नाम के याचिकाकर्ता की याचिका में कहा गया था कि मतदान में नागरिकों की भागीदारी लोकतंत्र के लिए जरूरी है. लोगों को मतदान के लिए प्रेरित करने के लिए कुछ कड़े कदम उठाने की जरूरत है. कोर्ट इस पर सुझाव देने के लिए एक कमेटी के गठन का आदेश दे. जजों ने इसे पूरी तरह नीतिगत विषय कहते हुए दखल से मना कर दिया.

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चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता मतदान के लिए लोगों को बाध्य करने की मांग कर रहा है. इसके आगे कोई मांग कर सकता है कि वोट न डालने वाले को सजा भी दी जाए. जबरदस्ती करने की जगह लोगों को मतदान के लिए जागरूक करना बेहतर होगा.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनिवार्य मतदान के नियम से उन लोगों पर असर पड़ेगा, जो काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं. उन्हें मतदान के लिए विवश किया गया तो उनके रोजगार का क्या होगा. चीफ जस्टिस ने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि इस मांग को मान लिया जाए तो उनके साथी जज जस्टिस बागची को 29 अप्रैल को कोर्ट का काम छोड़ कर वोट डालने पश्चिम बंगाल जाना होगा.

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