सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत विभिन्न राज्यों में बनाए गए धर्मांतरण रोधी कानूनों (Anti Conversion Law) के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है. मंगलवार (11 नवंबर, 2025) को एक याचिकाकर्ता ने इसी महीने सुनवाई का आग्रह किया था, जिस पर कोर्ट ने इनकार कर दिया.

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पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मुख्य न्यायधीश भूषण रामकृष्ण गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की बेंच के सामने मामला रखा गया. कोर्ट ने कहा कि इन याचिकाओं को दिसंबर में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा. एक याचिकाकर्ता के वकील ने कानूनों पर रोक से संबंधित अंतरिम याचिका अगले हफ्ते सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया. इस पर, सीजेआई बी आर गवई ने कहा, 'यह संभव नहीं है.'

मुख्य न्यायधीश गवई 23 नवंबर को रिटयर हो रहे हैं. कोर्ट ने 16 सितंबर को राज्यों से इन याचिकाओं पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए कहा था. नोटिस जारी करते समय मुख्य न्यायधीश की बेंच ने यह स्पष्ट किया था कि जब तक राज्य जवाब नहीं देते, तब तक कोर्ट कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगाने पर विचार नहीं करेगा.

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बेंच ने तब राज्यों को उनके जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया था और इसके बाद याचिकाकर्ताओं को दो हफ्ते में अपना उत्तर दाखिल करने की अनुमति दी थी. इस मामले को छह हफ्ते के बाद सूचीबद्ध किया गया था.

6 जनवरी, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरधार्मिक शादियों की वजह से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत विभिन्न राज्यों की ओर से लाए गए विवादास्पद कानून की जांच पर सहमति जताई थी. 

उत्तर प्रदेश का धर्मांतरण रोधी कानून न सिर्फ अंतरधार्मिक विवाहों से जुड़ा है, बल्कि सभी तरह की धर्म परिवर्तन प्रक्रियाओं से भी संबंधित है. अगर कोई व्यक्ति दूसरा धर्म अपनाना चाहता है तो यह कानून उसके लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करता है. उत्तराखंड के कानून में जबरन या लालच देकर धर्मांतरण करवाने के लिए दो साल तक की जेल का प्रावधान है. 

सुप्रीम कोर्ट उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक सरकार के बनाए गए धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा.