उपभोक्ता आयोगों में मामलों के वर्षों तक लंबित रहने पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा है कि उपभोक्ता आयोग रिटायर्ड जजों के ‘पुनर्वास केंद्र’ या ‘आरामगाह’ नहीं हैं. बुनियादी ढांचे में सुधार के बावजूद आयोगों का प्रदर्शन निराशाजनक है. कोर्ट ने देश भर के उपभोक्ता आयोग के कामकाज पर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है.

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चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा है कि सुविधाएं और भत्ते दिए जाने के बावजूद आयोगों का प्रदर्शन लचर है. यह उनके गठन के उद्देश्य पर ही सवालिया निशान लगाता है. जिला स्तर के उपभोक्ता आयोग के कामकाज की गुणवत्ता खास तौर पर काफी खराब है. ज़िला आयोग अपने यहां दाखिल होने वाले मामलों की प्रकृति और उनके सुनवाई योग्य होने या न होने की जांच करने में भी बुरी तरह असफल साबित हो रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने रिपोर्ट में क्या कुछ मांगा?

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिला उपभोक्ता आयोग से लेकर राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग तक मामलों की सुनवाई और निपटारे की रफ्तार बेहद धीमी है. अभी सदस्यों के वेतन-भत्ते तय हैं. अगर उनके भुगतान को मामलों के निपटारे के आधार पर निर्धारित किया जाए, तो निपटारे की रफ्तार कई गुना बढ़ जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC ( राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग) के अध्यक्ष को 2 सप्ताह में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. इस रिपोर्ट में उन्हें अपने यहां लंबित मामलों की संख्या, मामलों के निपटारे की औसत दर, आयोग के सदस्यों की संख्या और लंबित मामलों के निपटारे में लगने वाले अनुमानित समय की जानकारी देनी होगी. कोर्ट ने राज्य उपभोक्ता आयोगों से भी कहा कि वह अपने यहां लंबित मामलों का आंकड़ा उपलब्ध करवाएं.

कोर्ट ने सभी राज्य उपभोक्ता आयोगों के अध्यक्षों को अपने-अपने राज्यों के जिला उपभोक्ता आयोगों के पिछले 3 सालों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने का भी निर्देश दिया है. जजों ने संकेत दिया है कि वह लंबित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए NCDRC में सदस्यों की संख्या बढ़ाने और अधिक शिकायतों वाले क्षेत्रों में सर्किट बेंच स्थापित करने की संभावना पर विचार करेंगे.