स्कूली छात्रों के लिए बनाई गई 'अपार' (Automated Permanent Academic Account Registry) आईडी का फॉर्म भरते समय 'ऑप्ट आउट' यानी 'सहमति नहीं' का विकल्प मिल सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने 'अपार' का विरोध करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इसका संकेत दिया है. याचिका में कहा गया था कि इस आईडी को कागजों पर स्वैच्छिक बताया जाता है, लेकिन इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जा रहा है.
अभिषेक बख्शी समेत 4 अभिभावकों की याचिका की पैरवी वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने की. उन्होंने कहा, "छात्रों की सहमति के बिना उनका डेटा जुटाया जा रहा है और उसे स्थायी रूप से रखा जाएगा. यह निजता का हनन है. 'अपार' आईडी बनवाने के लिए 'आधार' का ब्यौरा लिया जा रहा है. यह 'निजता के अधिकार' को लेकर आए 'पुत्तास्वामी बनाम भारत सरकार' फैसले के खिलाफ है. डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का भी उल्लंघन है."
चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि 'अपार' पहचान को छात्रों के हित में ही लागू किया गया है. हालांकि, जज इस बात से सहमत नज़र आए कि अगर यह योजना 'स्वैच्छिक' है तो फिर इसे सबके लिए 'अनिवार्य' नहीं बनाया जा सकता. जजों ने ओडिशा हाई कोर्ट के एक आदेश की भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि ओडिशा हाई कोर्ट ने 'अपार' के फॉर्म में 'ऑप्ट आउट' का विकल्प भी रखने को कहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहासुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने CBSE से कहा कि वह याचिका में उठाई गई चिंताओं पर विचार करे. कोर्ट ने यह भी कहा कि वह ओडिशा हाई कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू करने का आदेश देगा. इससे याचिका में उठाए गए मुद्दे का कुछ हद तक समाधान हो सकेगा.
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