बैंकों से उनके डूब रहे कर्ज को खरीदने वाली एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARC) के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है. याचिका में कुछ मामलों का हवाला देते हुए बताया गया है कि हजारों करोड़ के कर्ज को बैंकों ने ARC कंपनियों को सस्ते में बेच दिया. इस प्रक्रिया में कर्ज का भुगतान न कर रहे कर्जदार की भी मिलीभगत रही. इस तरह लोगों के पैसों को लुटाया जा रहा है.

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चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने बैंकों और ARC की तरफ से लोन की वसूली में बरती जा रही लापरवाही को चिंताजनक बताया. लोन सेटलमेंट के तौर-तरीकों पर गहरी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'यह बैंकों, एआरसी और कर्जदारों के बीच का एक गहरा गठजोड़ है. जनता के पैसे को लापरवाही से लोन के रूप में बांट दिया जाता है. इसके बाद उसे वसूलने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जाता. ऐसा रवैया बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता.'

याचिका में खास तौर पर जेकेएम इन्फ्रा से जुड़े मामले की जानकारी कोर्ट को दी गई थी. कहा गया था कि नोएडा की 'जेकेएम इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड' कंपनी पर सरकारी बैंकों का करीब 1,537 करोड़ रुपए का कर्ज बकाया था. इसे दो एआरसी- प्रूडेंट और फीनिक्स के जरिए सिर्फ 73.50 करोड़ रुपयों में सेटल कर दिया गया. यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने को 95 प्रतिशत से अधिक का नुकसान है.

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याचिकाकर्ता की तरफ से पेश वकील अश्विनी उपाध्याय ने एक फॉरेंसिक ऑडिट का हवाला दिया. उन्होंने बताया कि इस ऑडिट के मुताबिक बैंकों से लिए गए 912 करोड़ के लोन में से 902 करोड़ से अधिक की राशि को शेल कंपनियों को ट्रांसफर की गई. यह पैसे फर्जी इनवॉइस के जरिए दूसरी जगह भी भेजे गए. इसके बावजूद, बैंकों ने इसे धोखाधड़ी घोषित करने के बजाय कर्ज को बेहद कम कीमत पर एआरसी को बेच दिया.

जेकेएम इंफ्रा की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला पहले ही कई एजेंसियों के सामने है. उनकी आपत्ति को दरकिनार करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि यह सिर्फ इस विशेष मामले तक सीमित विषय नहीं है. याचिका में बैंकिंग सिस्टम में चल रही एक बड़ी गड़बड़ी की जानकारी दी गई है. इस पर सुनवाई जरूरी है.

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