'कई हजार नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं....', दाऊदी बोहरा समुदाय में बच्चियों की खतना प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि महिलाओं की खतना प्रथा को दुनिया के लगभग 59 देशों में बैन कर दिया गया है, जबकि मिस्र और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की अदालतों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है.

दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में की जाने वाली महिलाओं के खतना की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. कोर्ट ने गुरुवार (7 मई, 2026) को कहा कि यह प्रथा संविधान के तहत स्वास्थ्य के दायरे में आ सकती है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अलावा स्वास्थ्य के आधार पर भी धार्मिक प्रथाओं और अनुष्ठानों को प्रतिबंधित किया जा सकता है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने महिलाओं के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. यह बेंच महिलाओं के साथ धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है, जिनमें केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़ा मामला भी शामिल है. साथ ही, यह पीठ दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस प्रथा को दुनिया के लगभग 59 देशों में बैन कर दिया गया है, जबकि मिस्र और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की अदालतों ने इस मामले में हस्तक्षेप किया है.
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सिद्धार्थ लूथरा ने कहा, 'भारत में इस पर कोई विशिष्ट प्रतिबंध नहीं है.' उन्होंने कहा कि यहां अहम सवाल यह है कि क्या कोई समुदाय या संप्रदाय सहमति के अभाव में किसी नाबालिग के जीवन को प्रभावित करता है, क्योंकि नाबालिग के लिए सार्थक सहमति संभव ही नहीं है. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया सात साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है और इससे उनके शरीर में बदलाव होते हैं, जो उनके यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में कई हजार नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं.
सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें इस पर अमल न करने पर धर्म से बहिष्कृत किए जाने का डर होता है. उन्होंने कहा कि इस प्रथा के एक जरूरी धार्मिक प्रथा होने का दावा नहीं किया जा सकता और इसे अनुच्छेद-26 के तहत किसी संप्रदाय के अधिकारों के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है.
पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, 'जहां तक महिलाओं के खतना का सवाल है, हमें इन सभी मुद्दों और अन्य अधिकारों पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत भी नहीं हो सकती है. स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य शब्द ही इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं.' सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि जहां कोई प्रथा शारीरिक स्वायत्तता में अतिक्रमण करती है और किसी महत्वपूर्ण अंग को विकृत करती है, वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सीमाओं, यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है.
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बेंच में शामिल जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत नैतिकता के दायरे में भी आ सकती है. एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि कोर्ट को समुदाय के भीतर सक्रिय सत्ता संरचनाओं और व्यक्तियों के सामने मौजूद सामाजिक विवशताओं पर भी विचार करना चाहिए.
सीजेआई सूर्यकांत ने उनसे पूछा कि क्या वह यह सुझाव दे रहे हैं कि अनुच्छेद 25 और 26 के बीच परस्पर संबंध की परवाह किए बिना, अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए. सिद्धार्थ लूथरा ने हां में जवाब देते हुए कहा कि इस प्रथा की शिकार नाबालिग लड़कियां हैं, जो सहमति देने में असमर्थ हैं. अब कोर्ट इन याचिकाओं पर 12 मई को सुनवाई करेगा.
























