सुप्रीम कोर्ट ने नार्को-टेरर के आरोपी को दी जमानत, दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद को बेल से मना करने वाले अपने ही फैसले पर उठाए सवाल
जजों ने गुलफिशा फातिमा केस और गुरविंदर सिंह मामले के फैसले पर सवाल उठाए. गुरविंदर सिंह फैसले में कहा गया कि UAPA के आरोपी को जमानत पाने के लिए अपनी बेगुनाही के बारे में कोर्ट को आश्वस्त करना चाहिए.

हंदवाड़ा नार्को-टेरर केस के आरोपी जम्मू कश्मीर के सैयद इफ्तेखार अंद्राबी को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है. अंद्राबी पर UAPA और NDPS एक्ट की धाराओं के तहत आरोप हैं. उसे रिहा करते समय सुप्रीम कोर्ट ने बिना ट्रायल लंबे समय से जेल में रहने को आधार बनाया. अंद्राबी को जून 2020 में गिरफ्तार किया गया था.
अपने फैसले में जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले की भी चर्चा की. उन्होंने दोनों को जमानत न देने वाले दूसरी बेंच के फैसले पर असहमति जताई. उन्होंने कहा कि अंद्राबी को जिस न्यायिक सिद्धांत के तहत जमानत दी जा रही है, उसे 3 जजों की बेंच ने तय किया था. उमर खालिद के मामले में 2 जजों की बेंच ने उस सिद्धांत का पालन नहीं किया.
इस साल 5 जनवरी को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने खालिद और शरजील को जमानत पर रिहा करने से मना किया था. दोनों ने 5 साल से ज्यादा समय से हिरासत में होने का हवाला देते हुए जमानत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने मामले में उनकी भूमिका को केंद्रीय बताते हुए इससे मना कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने इन दोनों के साथ याचिका दाखिल करने वाले बाकी पांच आरोपियों को जमानत दी थी.
इस आदेश पर असहमति जताते हुए जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस भुइयां की बेंच ने कहा है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) बहुत महत्वपूर्ण है. UAPA की धारा 43D(5) की कठोर शर्तें उससे ऊपर नहीं हो सकती हैं. UAPA के मामलों में भी 'जेल की बजाय बेल' नियम लागू होता है. मुकदमे में देरी हो रही हो, तो उसके चलते किसी को अनिश्चित समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता.
जजों ने 'गुलफिशा फातिमा' केस (दिल्ली दंगा) के अलावा 2024 के 'गुरविंदर सिंह' मामले के फैसले पर भी सवाल उठाए हैं. गुरविंदर सिंह फैसले में कहा गया था कि UAPA के आरोपी को जमानत पाने के लिए अपनी बेगुनाही के बारे में कोर्ट को आश्वस्त करना चाहिए. अंद्राबी की रिहाई के आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इन फैसलों में 2021 में आए 'के ए नजीब' मामले के फैसले की अनदेखी की गई. नजीब फैसले में 3 जजों की बेंच ने मुकदमे में देरी को जमानत का मजबूत आधार माना था.
जस्टिस भुइयां ने फैसले में लिखा है, 'न्यायिक अनुशासन का तकाजा है कि छोटी बेंच हमेशा बड़ी बेंच के फैसलों को माने. कोई भी छोटी बेंच बड़ी बेंच की तरफ से तय कानून को न तो हल्का कर सकती है और न ही उसकी अनदेखी कर सकती है.' कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर 'गुरविंदर सिंह' फैसले को लागू किया गया तो जांच एजेंसियां शुरुआती सबूत दिखाकर किसी भी व्यक्ति को सालों तक बिना मुकदमे के जेल में रख सकती हैं.
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