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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दिया समान नागरिक संहिता का सुझाव, कहा- यह पर्सनल लॉ की विषमताओं को दूर करेगा, लेकिन निर्णय संसद को लेना है

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर 1937 का कानून हट जाता है, तब भी संविधान के अनुच्छेद 372 के चलते मुस्लिम उत्तराधिकार पारंपरिक पर्सनल लॉ से चलेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता की जरूरत बताई है. मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह टिप्पणी की है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा है कि यूसीसी कई विषमताओं को खत्म करेगा, लेकिन इस पर निर्णय लेना संसद का काम है.

जजों ने जिस मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की उसे वकील पॉलोमी पवनी शुक्ला और न्याय नारी फाउंडेशन नाम की संस्था की निदेशक आयशा जावेद ने दाखिल किया था. याचिका में 1937 के शरीयत एक्ट के उस प्रावधान का विरोध किया गया था जो मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में संपत्ति में आधा हिस्सा देता है. याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश वकील प्रशांत भूषण ने इस प्रावधान को संविधान से हर नागरिक को मिले समानता के अधिकार का हनन बताया.

प्रशांत भूषण ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट शायरा बानो बनाम भारत सरकार मामले में एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर चुका है. इस मामले में भी ऐसा किए जाने की जरूरत है. इस पर कोर्ट ने कहा, 'आप ने मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लिकेशन एक्ट, 1937 को चुनौती दी है. मान लीजिए कि इसे रद्द कर दिया जाता है, तो उसके बाद कौन-सा कानून लागू होगा? यह बहुत अहम सवाल है. कानून को हटाने से जो शून्य पैदा होगा, उस पर विचार जरूरी है.'

जस्टिस बागची ने कहा कि अगर 1937 का कानून हट जाता है, तब भी संविधान के अनुच्छेद 372 के चलते मुस्लिम उत्तराधिकार पारंपरिक पर्सनल लॉ से चलेगा. इस पर प्रशांत भूषण ने सुझाव दिया कि कोर्ट यह आदेश दे कि 1937 का कानून खत्म होने के बाद मुसलमानों के उत्तराधिकार के मामले इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 के तहत चलेंगे क्योंकि यह कानून पुरुष और महिला को बराबर अधिकार देता है.

इसके बाद जजों ने इस विषय को संसद के अधिकार क्षेत्र का बताया. बेंच ने कहा कि कानून बनाने का काम विधायिका का है. संसद ही व्यापक सुधार कर सकती है. चीफ जस्टिस ने कहा, 'इस तरह के मुद्दों का वास्तविक समाधान यूनिफॉर्म सिविल कोड के जरिए ही संभव है. इससे सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून लागू हो सकेंगे. हम पहले भी इसका सुझाव दे चुके हैं. निर्णय संसद को लेना है.'

सुनवाई के अंत में कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वह अपनी याचिका में संशोधन कर दोबारा दाखिल करें. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता व्यवहारिक सुझाव दें. तभी वह इस मामले पर आगे विचार कर सकेगा. प्रशांत भूषण ने इस पर सहमति जताते हुए कहा कि वह संशोधित याचिका दाखिल करेंगे.

करीब 2 दशक से सुप्रीम कोर्ट के गलियारों का एक जाना-पहचाना चेहरा. पत्रकारिता में बिताया समय उससे भी अधिक. कानूनी ख़बरों की जटिलता को सरलता में बदलने का कौशल. खाली समय में सिनेमा, संगीत और इतिहास में रुचि.
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