El Nino Explained: देशभर में इस साल भीषण गर्मी को लेकर पहले से ही चिंता बढ़ रही है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार सामान्य अल नीनो नहीं, बल्कि 'सुपर अल नीनो' बनने की आशंका है. अगर ऐसा हुआ तो गर्मी, हीटवेव और कमजोर मानसून के मामले में कई पुराने रिकॉर्ड टूट सकते हैं. लेकिन आखिर अल नीनो क्या होता है और इसका भारत की गर्मी व बारिश से क्या संबंध है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.
क्या होता है अल नीनो?
'अल नीनो' स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका मतलब होता है 'छोटा बच्चा' या 'बालक'. यह नाम मौसम में होने वाले एक बड़े बदलाव को दिया गया है, जो हर कुछ साल में प्रशांत महासागर में दिखाई देता है. स्पेनिश नाम होने की वजह यह है कि दक्षिण अमेरिका के कई देशों पर पहले स्पेन का शासन था और वहां स्पेनिश भाषा बोली जाती है. इसी कारण इस मौसमी बदलाव का नाम भी स्पेनिश में पड़ा.
दक्षिण अमेरिका से भारत तक कैसे पड़ता है असर?
अल नीनो का असर दक्षिण अमेरिका के पास प्रशांत महासागर में शुरू होता है, लेकिन इसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर भारत तक महसूस किया जाता है. सामान्य परिस्थितियों में दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र का पानी ठंडा रहता है, जबकि इंडोनेशिया और फिलीपींस की ओर पानी ज्यादा गर्म होता है. इस दौरान पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली हवाएं, जिन्हें ट्रेड विंड्स कहा जाता है, गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती रहती हैं. इससे दक्षिण अमेरिका की ओर ठंडा पानी ऊपर आता रहता है और एशिया की तरफ गर्म पानी जमा रहता है.
जब कमजोर पड़ती हैं हवाएं
हर 2 से 7 साल में कभी-कभी ये ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं. तब प्रशांत महासागर का गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है. इस दौरान महासागर का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है. इसी स्थिति को अल नीनो कहा जाता है. समुद्र का पानी गर्म होने से वहां बादल ज्यादा बनते हैं और भारी बारिश दक्षिण अमेरिका की तरफ होने लगती है, जबकि एशिया की ओर बादल कम पहुंचते हैं.
भारत में क्यों बढ़ जाती है गर्मी?
भारत में मानसून मुख्य रूप से अरब सागर और हिंद महासागर से आने वाली नम हवाओं पर निर्भर करता है . लेकिन अल नीनो के दौरान हवा का पूरा पैटर्न बदल जाता है. जो हवाएं भारत की तरफ नमी लेकर आती हैं, वे कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं. इससे भारत में बादल कम बनते हैं और बारिश घट जाती है. अप्रैल, मई और जून में जब आसमान साफ रहता है, तो सूरज की किरणें सीधे जमीन पर पड़ती हैं . इससे जमीन तेजी से गर्म होती है और उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे इलाकों में भीषण गर्मी पड़ती है.
2023 में भी दिखा था असर
2023 में भी मजबूत अल नीनो के कारण भारत के कई शहरों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था. उस समय मानसून कमजोर रहा, बारिश कम हुई और गर्मी लंबे समय तक बनी रही.
अब क्या है ‘सुपर अल नीनो’?
विशेषज्ञों के अनुसार इस साल अल नीनो और ज्यादा खतरनाक रूप ले सकता है. इसे 'सुपर अल नीनो' कहा जाता है. जब मध्य प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तब उसे सुपर अल नीनो माना जाता है. फिलहाल मध्य प्रशांत महासागर का तापमान पहले ही लगभग +0.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है और समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है.
पहले भी कुछ बार आ चुका है सुपर अल नीनो
1950 के बाद सुपर अल नीनो जैसी स्थिति बहुत कम बार देखने को मिली है. साल 1982, 1997 और 2015 में सुपर अल नीनो का असर दर्ज किया गया था. इस बार वैज्ञानिक इसलिए ज्यादा चिंतित हैं क्योंकि प्रशांत महासागर का पानी बहुत तेजी से गर्म हो रहा है.
ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ा रही खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी पृथ्वी पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से गर्म हो रही है. ऐसे में अगर सुपर अल नीनो आता है तो उसका असर और ज्यादा खतरनाक हो सकता है. समुद्र के अंदर जमा गर्म पानी ऊपर आकर वातावरण को और गर्म कर रहा है.
भारत पर क्या हो सकता है असर?
अगर इस साल सुपर अल नीनो बनता है, तो भारत में मानसून कमजोर हो सकता है. इससे कई इलाकों में सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. इसके अलावा हीटवेव लंबी और ज्यादा खतरनाक हो सकती है. उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो इस साल गर्मी कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ सकती है और धरती भट्टी जैसी महसूस हो सकती है.
