नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में अल्पसंख्यक का दर्जा किसे मिले? 68 फीसदी आबादी वाले मुसलमानों को या हिन्दू, सिख और बौद्धों को? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर ये तय करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने दोनों सरकारों से बैठक कर चार हफ्ते में रिपोर्ट देने को कहा है.

अंकुर शर्मा नाम के शख्स की तरफ से पिछले साल दाखिल याचिका में राज्य में अल्पसंख्यकों का सही निर्धारण नहीं किए जाने की शिकायत की गयी थी. कहा गया था कि राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय तय करने के लिए कोई कानून नहीं बनाया है. इस वजह से अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री की 15 सूत्री योजनाओं का फायदा मुस्लिम उठा रहे हैं. जबकि उनकी आबादी 68 फीसदी है.

याचिका में मांग की गयी थी कि ये लाभ हिन्दू, सिख और बौद्ध समुदाय को मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर केंद्र और राज्य सरकार से जवाब मांगा था. आज दोनों ही सरकारों ने इस मसले का हल निकालने को ज़रूरी माना.

केंद्र की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, "कानूनन हर राज्य को आबादी और दूसरी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अल्पसंख्यकों का निर्धारण करना चाहिए. जिन राज्यों में भी ऐसा नहीं हुआ, वहां इसे करने की ज़रूरत है."

याचिकाकर्ता ने पहले जम्मू-कश्मीर की बात किए जाने का आग्रह करते हुए कहा, "जिन राज्यों में अल्पसंख्यकों का निर्धारण नहीं हुआ, वहां केंद्रीय कानून लागू है. जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वजह से केंद्रीय कानून लागू नहीं है. राज्य ने भी कानून नहीं बनाया. सब कुछ मनमाने तरीके से चल रहा है."

राज्य की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि राज्य सरकार इस मसले का हल निकालना चाहती है. इसके लिए केंद्र के साथ बैठक की जाएगी. केंद्र सरकार ने भी इसकी सहमति दी है.

मामले की सुनवाई कर रही 3 जजों की बेंच के अध्यक्ष चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा, "हम केंद्र और राज्य की इस बात के लिए सराहना करते हैं कि वो इस गंभीर मसले को मिल कर हल करना चाहते हैं. आप जल्द बैठक करें और 4 हफ्ते में रिपोर्ट दाखिल करें."