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सत्य निकेतन हादसा: 7 छात्रों की मौत के बाद जागा सिस्टम या अगली त्रासदी का इंतजार?

हादसे वाली बिल्डिंग के ठीक बगल में स्थित 12 और 13 नंबर की इमारतों को भी एमसीडी ने खतरनाक माना है. दोनों को तीन दिन का नोटिस जारी किया गया है.

दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार को गिरी एक इमारत ने सिर्फ सात लोगों की जान नहीं ली, बल्कि राजधानी में चल रहे अवैध निर्माण और जर्जर पीजी सिस्टम की भयावह सच्चाई भी उजागर कर दी. इस हादसे के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने एमसीडी और दिल्ली सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं. कोर्ट जानना चाहता है कि आखिर ऐसे खतरनाक ढांचों को लेकर प्रशासन कब जागेगा, क्योंकि जिस इमारत ने सात लोगों को मौत के मुंह में धकेला, उसके आसपास आज भी कई ऐसी इमारतें खड़ी हैं जो कभी भी अगला हादसा बन सकती हैं.

हादसे वाली बिल्डिंग के ठीक बगल में स्थित 12 और 13 नंबर की इमारतों को भी एमसीडी ने खतरनाक माना है. दोनों को तीन दिन का नोटिस जारी किया गया है. फिलहाल इन्हें लोहे के गार्डरों के सहारे टिकाया गया है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन को इन इमारतों की वास्तविक स्थिति अब पता चली है? क्या सात लोगों की मौत के बाद ही सिस्टम की नींद खुली है?

नींद से कब जागेगा सिस्टम?

सत्य निकेतन दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस का प्रमुख छात्र केंद्र है. यहां श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, जीसस एंड मैरी कॉलेज, मैत्रेयी कॉलेज, आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज, राम लाल आनंद कॉलेज, मोतीलाल नेहरू कॉलेज और आर्यभट्ट कॉलेज जैसे सात बड़े कॉलेज मौजूद हैं. लेकिन इन सात कॉलेजों में सिर्फ दो कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा है. वेंकटेश्वर कॉलेज में लगभग 175 सीटें हैं, जबकि मैत्रेयी कॉलेज में केवल 27 सीटें उपलब्ध हैं. ऐसे में हजारों छात्र मजबूरन निजी पीजी और हॉस्टलों में रहने को विवश हैं.

यही मजबूरी इलाके में पीजी कारोबार का सबसे बड़ा आधार बन चुकी है. इलाके के कई मकान मालिक खुद कहीं और शिफ्ट हो चुके हैं और अपने मकानों को पीजी में बदलकर मोटी कमाई कर रहे हैं. अनुमान है कि सत्य निकेतन और आसपास के इलाकों में 200 से ज्यादा पीजी और प्राइवेट हॉस्टल संचालित हो रहे हैं, जिनमें करीब 8 से 10 हजार छात्र रहते हैं.

लेकिन इन छात्रों को जिन इमारतों में रखा जा रहा है, उनकी हालत बेहद चिंताजनक है. संकरी गलियां, बेतरतीब निर्माण, एक-दूसरे से सटी हुई इमारतें और सुरक्षा मानकों की खुली अनदेखी यहां आम बात है. जहां चार मंजिल की अनुमति है, वहां पांच और छह मंजिल तक निर्माण खड़ा कर दिया गया है. रिहायशी इलाकों को व्यावसायिक केंद्रों में बदल दिया गया है और नियम-कानून केवल कागजों तक सीमित नजर आते हैं.

दरअसल, यह सिर्फ सत्य निकेतन की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की तस्वीर है जहां हादसा होने तक सब कुछ चलता रहता है. फिर कोई इमारत गिरती है, कुछ लोगों की जान जाती है, कुछ अधिकारियों को निलंबित किया जाता है, कुछ नोटिस जारी होते हैं और फिर मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है.

हालांकि, इस बार दिल्ली सरकार ने कई सख्त कदमों की घोषणा की है. सरकार के मुताबिक, पांचवीं मंजिल वाले अवैध निर्माणों को तुरंत सील किया जाएगा. आसपास के पीजी और अन्य इमारतों की जांच होगी. सुरक्षा मानकों का उल्लंघन पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई की जाएगी. इसके अलावा पीजी, नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य सार्वजनिक गतिविधियों वाली इमारतों के लिए समय-समय पर स्ट्रक्चरल ऑडिट और बिल्डिंग सेफ्टी सर्टिफिकेट अनिवार्य करने की तैयारी की जा रही है. जर्जर इमारतों के मालिकों को उन्हें खुद गिराने का नोटिस दिया गया है, अन्यथा एमसीडी कार्रवाई कर खर्च की वसूली करेगी.

हादसे का कौन कसूरवार?

लेकिन इन घोषणाओं से उन परिवारों का दर्द कम नहीं होगा जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया है. इस हादसे में जान गंवाने वालों में अधिकांश छात्र थे. मध्य प्रदेश के कटनी निवासी अक्षत यादव, देवास के अर्पित जाज, छत्तीसगढ़ के दुर्ग के युवराज सोनी, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र के अभिषेक और औरैया के पवन अपने परिवारों के सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली आए थे. लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि जिस इमारत में वे रह रहे हैं, वही एक दिन उनकी मौत का कारण बन जाएगी.

अर्पित जाज दिल्ली यूनिवर्सिटी के आत्माराम सनातन धर्म कॉलेज में बीकॉम द्वितीय वर्ष का छात्र था. हादसे के बाद उसका दोस्त उसे ढूंढ़ते हुए अस्पताल पहुंचा, लेकिन परिवार के दिल्ली पहुंचने तक आशंका हकीकत में बदल चुकी थी. वहीं अक्षत यादव और युवराज सोनी जैसे छात्र भी मलबे में दबकर हमेशा के लिए अपने परिवारों से बिछड़ गए. युवराज हादसे के वक्त अपने दोस्त से फोन पर बात कर रहा था, लेकिन इमारत गिरने के साथ ही उसकी आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई.

आज इन परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उनके बच्चों की मौत का जिम्मेदार कौन है? बिल्डिंग मालिक, प्रशासन, एमसीडी या फिर वह पूरा सिस्टम जिसने वर्षों तक अवैध निर्माण को नजरअंदाज किया? दिल्ली में पिछले तीन वर्षों के दौरान इमारत गिरने की 1,133 घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 98 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में सत्य निकेतन का हादसा कोई पहला मामला नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आखिरी होगा?

अगर सात छात्रों की मौत के बाद भी अवैध निर्माण, जर्जर इमारतों और नियमों की अनदेखी पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि राजधानी अगली त्रासदी का इंतजार कर रही है. और तब फिर वही सवाल गूंजेगा-आखिर जिम्मेदार कौन है?

राजेश कुमार पत्रकारिता जगत में पिछले करीब 14 सालों से ज्यादा वक्त से अपना योगदान दे रहे हैं. राष्ट्रीय और सामाजिक मुद्दों से लेकर अपराध जगत तक, हर मुद्दे पर वह स्टोरी लिखते आए हैं. इसके साथ ही, किसी खबरों पर किस तरह अलग-अलग आइडियाज के साथ स्टोरी की जाए, इसके लिए वह अपने सहयोगियों का लगातार मार्गदर्शन करते रहे हैं. इनकी अंतर्राष्ट्रीय जगत की खबरों पर खास नज़र रहती है, जबकि भारत की राजनीति में ये गहरी रुचि रखते हैं. इन्हें क्रिकेट खेलना काफी पसंद और खाली वक्त में पसंद की फिल्में भी खूब देखते हैं. पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर ऑफ ब्रॉडकास्ट जर्नलिज्म किया है. राजनीति, चुनाव, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर राजेश कुमार लगातार लिखते आ रहे हैं.
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