सहारनपुर मस्जिद ढहाने पर सियासी बवाल, कांग्रेस और ओवीसी ने क्या कहा?
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में करीब 115 साल पुरानी बताई जा रही मस्जिद को शनिवार सुबह प्रशासन ने अदालत के आदेश के बाद ढहा दिया.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में करीब 115 साल पुरानी बताई जा रही मस्जिद को ढहाए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है. प्रशासन ने शनिवार सुबह करीब 5 बजे मस्जिद को हटाने की कार्रवाई की. प्रशासन का कहना है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बनी थी और यह कार्रवाई अदालत के आदेश के बाद की गई. वहीं, विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई के तरीके और मस्जिद की जमीन को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद, समाजवादी पार्टी सांसद इकरा हसन, कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी, आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, बसपा प्रमुख मायावती और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अलग-अलग बयान जारी कर कार्रवाई की आलोचना की है.
इकरा हसन बोलीं- लोगों को हाईकोर्ट जाने का समय तक नहीं मिला
कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि मस्जिद को गिराने से पहले लोगों को अपनी बात रखने और हाईकोर्ट जाने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि निचली अदालत का आदेश आने के बाद मस्जिद को सील कर दिया गया था और आसपास बैरिकेडिंग कर दी गई थी.
इकरा हसन के मुताबिक, लोग अधिकारियों से मिलकर कुछ समय देने की मांग करना चाहते थे, ताकि मामले को हाईकोर्ट में ले जाया जा सके. उनका आरोप है कि समय नहीं दिया गया और सहारनपुर जिले के कई प्रमुख लोगों को उनके घरों में ही रोक दिया गया. इसके बाद सुबह मस्जिद को गिरा दिया गया.
उन्होंने इस कार्रवाई को शर्मनाक बताते हुए कहा कि जिस तरीके से इसे अंजाम दिया गया, वह लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है. इकरा हसन ने कहा कि मामले को अदालत में ले जाया जाएगा और यह उनका अधिकार है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार के आदेश के आधार पर ही अगर हर फैसला होना है तो फिर कानूनी व्यवस्था की जरूरत क्या रह जाती है.
इमरान प्रतापगढ़ी बोले- 100 साल पुरानी मस्जिद भी अवैध?
कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मस्जिद गिराए जाने को लेकर सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने सवाल उठाया कि अगर करीब 100 साल पुरानी मस्जिद को भी अवैध बताया जा रहा है तो फिर देश में क्या कुछ वैध है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की कार्रवाई धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने का हिस्सा है. इमरान प्रतापगढ़ी ने जौहर विश्वविद्यालय और कलेक्ट्रेट से पहले अंग्रेजों के समय बनी मस्जिद का उदाहरण देते हुए सरकार से सवाल किए.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अपने ही देश के नागरिकों और उनके धर्मस्थलों को सरकारी साजिश के तहत गिराया जा रहा है. उन्होंने कहा कि यह कोई एक दिन का मामला नहीं है और चुनाव से पहले सरकार छात्रों से जुड़े मुद्दों के बीच ऐसे कदम उठा रही है.
संजय सिंह ने उठाया जमीन के रिकॉर्ड का सवाल
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने मस्जिद की जमीन को लेकर सवाल उठाया. उन्होंने दावा किया कि खसरा नंबर 539 याकूब खान और वहीद खान के नाम दर्ज है और इसी जमीन पर मंदिर, मस्जिद और कलेक्ट्रेट मौजूद हैं. संजय सिंह ने दावा किया कि मस्जिद वर्ष 1947 से पहले की है और वक्फ बोर्ड में भी दर्ज है. उन्होंने आरोप लगाया कि वक्फ बोर्ड को मामले में पक्ष बनाए बिना एकतरफा फैसला लेकर मस्जिद गिरा दी गई. उन्होंने इसे चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में नफरत फैलाने की कोशिश बताया.
मायावती बोलीं- मस्जिदों को जल्दबाजी में गिराना ठीक नहीं
बसपा प्रमुख मायावती ने भी सहारनपुर की मस्जिद समेत उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्थलों को लेकर हो रही कार्रवाई पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि मस्जिदों को जल्दबाजी में अवैध बताकर गिराने का सरकारी अभियान ठीक नहीं है. मायावती ने सरकार से ऐसे कदमों पर तुरंत रोक लगाने और विवादों का समाधान निकालने के दूसरे रास्ते तलाशने की अपील की. उन्होंने कहा कि एक संवैधानिक और धर्मनिरपेक्ष सरकार की जिम्मेदारी है कि वह सभी धर्मों के लोगों और उनके धार्मिक स्थलों का समान रूप से सम्मान और सुरक्षा करे.
उन्होंने यह भी कहा कि नियम-कानून का सही तरीके से पालन किए बिना किसी आरोपी का मकान गिराकर उसके पूरे परिवार को सजा देने जैसी कार्रवाई से लोगों में चिंता पैदा होती है. मायावती ने सरकार और अदालतों दोनों से इस मामले पर ध्यान देने की अपील की. साथ ही उन्होंने सभी लोगों से सौहार्द बनाए रखने की अपील भी की.
ओवैसी का सवाल- क्या धार्मिक आजादी का अधिकार नहीं बचा?
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी सहारनपुर की मस्जिद गिराए जाने पर सवाल उठाए. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि धार्मिक स्थलों को कमजोर आधारों पर बार-बार बुलडोजर से गिराए जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है. ओवैसी ने दावा किया कि सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मौजूद मस्जिद को शनिवार सुबह 5 बजे गिराया गया. उन्होंने सवाल किया कि क्या अब मुसलमानों के लिए धार्मिक आजादी का संवैधानिक अधिकार भी नहीं बचा है. उन्होंने धार्मिक स्थलों पर बार-बार बुलडोजर चलाए जाने पर भी सवाल उठाया.
ओवैसी ने कहा कि मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 के दस्तावेज पेश किए थे. उनके मुताबिक, इन दस्तावेजों के जरिए यह बताने की कोशिश की गई थी कि मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले से मौजूद थी.
ओवैसी ने जमीन के सरकारी दावे पर भी उठाया सवाल
ओवैसी ने मस्जिद की जमीन पर सरकार के दावे को लेकर भी सवाल खड़े किए. उन्होंने लिमिटेशन एक्ट का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार को किसी जमीन पर अपना दावा करने के लिए असीमित समय नहीं मिल जाता. उन्होंने कहा कि अगर किसी जमीन पर एक सदी से ज्यादा समय से खुले तौर पर लगातार कब्जा रहा है तो सरकार अचानक यह नहीं कह सकती कि जमीन अब उसकी है. ओवैसी ने कहा कि इतने लंबे समय तक कब्जे की स्थिति में एडवर्स पजेशन का सवाल भी उठता है.
उन्होंने यह भी दावा किया कि मस्जिद पहले बनी थी और उसके बाद कलेक्ट्रेट का निर्माण हुआ. ओवैसी ने कहा कि किसी को मस्जिद दिखाई देने से परेशानी होती है तो यह उसकी समस्या है, लेकिन इस आधार पर मस्जिद पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता. उन्होंने कहा कि उनकी धार्मिक आजादी किसी की दया पर निर्भर नहीं है.
अदालत के आदेश के बाद हुई कार्रवाई
दरअसल, सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को प्रशासन ने शनिवार सुबह करीब 5 बजे ढहा दिया. प्रशासन के मुताबिक यह कार्रवाई अदालत के आदेश के बाद की गई. 4 सितंबर को जिला जज की अदालत ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट के पहले के आदेश को बरकरार रखा था. इसके बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की.
मस्जिद के खिलाफ पिछले साल बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी ने शिकायत की थी. शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर में मस्जिद का निर्माण अवैध तरीके से किया गया था. परिसर के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के अलावा व्यावसायिक कामों के लिए किए जाने का भी आरोप लगाया गया था. इनमें एक डाकघर और कुछ कमरों को निजी लोगों को किराये पर देने का दावा शामिल था.
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सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद मस्जिद को हटाने का आदेश दिया था. इसके साथ ही कथित अतिक्रमण और सरकारी जमीन के इस्तेमाल को लेकर करीब 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना या क्षतिपूर्ति भी लगाया गया था. प्रशासन की कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास भारी पुलिस बल तैनात रहा.





















