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सहारनपुर में मस्जिद गिराने का दावा, भड़के ओवैसी बोले- 'खुन्नस मिटाने के लिए...'

सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद गिराए जाने के दावे के बाद पुराने जमीन रिकॉर्ड, धार्मिक स्वतंत्रता और एडवर्स पजेशन को लेकर सवाल उठे हैं. जानें पूरे मामले में क्या है विवाद.

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में एक मस्जिद को सुबह करीब 5 बजे गिराए जाने का दावा सामने आया है. इस मामले पर लोकसभा सासंद और AIMIM के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल खड़े किए हैं.  उन्होंने एक्स पर ट्वीट कर कर लिखा कि इस कार्रवाई के बाद मस्जिद की जमीन, उसके पुराने रिकॉर्ड और धार्मिक स्थल के रूप में इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं. मामले को लेकर संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और सरकारी जमीन पर बने धार्मिक स्थलों से जुड़े कानूनी नियमों पर भी बहस शुरू हो गई है.

ओवैसी ने इसको लेकर एक्स पर पोस्ट शेयर की है. उन्होंने लिखा, 'कुछ लोगों को शायद मस्जिद दिख जाने पर भी तकलीफ़ होती है. लेकिन यह उनका मसला है, हमारा नहीं. नज़र फेरनी है तो फेर लो. लेकिन अपनी खुन्नस मिटाने के लिए हमारी मस्जिद पर बुलडोजर नहीं चला सकते.'

मस्जिद कमेटी का कहना है कि इस धार्मिक स्थल के अस्तित्व से जुड़े दस्तावेज उसके पास मौजूद हैं. कमेटी के अनुसार, 1911 तक के रिकॉर्ड में मस्जिद का उल्लेख मिलता है और यहां लंबे समय से नमाज पढ़ी जाती रही है. इसी आधार पर कमेटी ने मस्जिद को पुराने धार्मिक स्थल के तौर पर मान्यता देने और उसके कानूनी संरक्षण का दावा किया है. हालांकि, इन दावों के साथ-साथ जमीन का वास्तविक मालिकाना हक, राजस्व रिकॉर्ड और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज स्थिति भी मामले में अहम होगी. किसी धार्मिक स्थल के पुराने होने मात्र से जमीन के मालिकाना हक का फैसला अपने आप नहीं हो जाता.

एडवर्स पजेशन को लेकर भी सवाल

मस्जिद कमेटी की ओर से जमीन पर लंबे समय से लगातार इस्तेमाल और कब्जे का तर्क भी दिया गया है. इसी आधार पर एडवर्स पजेशन यानी लंबे समय तक खुले और लगातार कब्जे से जुड़े कानूनी सिद्धांत का सवाल उठाया गया है, लेकिन एडवर्स पजेशन का दावा अपने आप जमीन पर मालिकाना हक साबित नहीं करता. ऐसे मामलों में जमीन की प्रकृति, सरकारी रिकॉर्ड, कब्जे की स्थिति और लागू कानूनों को अदालत या सक्षम प्राधिकारी के सामने साबित करना पड़ता है.

कलेक्ट्रेट से पहले मस्जिद होने का दावा

मस्जिद कमेटी का एक प्रमुख दावा यह भी है कि मस्जिद कलेक्ट्रेट बनने से पहले से मौजूद थी. कमेटी का कहना है कि अगर पुराने दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं, तो मस्जिद को सिर्फ हाल में बनी संरचना मानकर हटाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है. इस दावे की पुष्टि के लिए 1911 से जुड़े रिकॉर्ड समेत दूसरे दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी. जमीन का रिकॉर्ड, निर्माण की अनुमति और सरकारी अभिलेख इस विवाद में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

धार्मिक स्वतंत्रता पर भी बहस

मस्जिद गिराए जाने के दावे के बाद धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. भारत का संविधान नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन धार्मिक स्थलों से जुड़े जमीन और निर्माण के विवादों पर अलग-अलग कानून और प्रशासनिक नियम भी लागू होते हैं, इसलिए इस मामले में यह देखना जरूरी होगा कि प्रशासन ने किस कानूनी आधार पर कार्रवाई की, जमीन का रिकॉर्ड क्या कहता है और मस्जिद कमेटी के पुराने दस्तावेजों की स्थिति क्या है.

कार्रवाई के कानूनी आधार पर जवाब जरूरी

मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि मस्जिद को हटाने से पहले प्रशासन ने किस प्रक्रिया का पालन किया. यदि जमीन सरकारी या सार्वजनिक संपत्ति के रूप में दर्ज थी, तो उस पर धार्मिक निर्माण को लेकर अलग कानूनी स्थिति हो सकती है. वहीं, यदि कमेटी के पुराने रिकॉर्ड और अधिकारों का दावा सही है, तो कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठ सकता है. फिलहाल मस्जिद कमेटी की ओर से लगाए गए आरोपों और दावों को संबंधित सरकारी रिकॉर्ड तथा आधिकारिक कार्रवाई के विवरण से मिलाना जरूरी है. इसी से स्पष्ट होगा कि मस्जिद को हटाने का वास्तविक कानूनी आधार क्या था.

About the author सौरव कुमार

4 सालों से डिजिटल मीडिया में काम कर रहे हैं. साल 2022 से एबीपी न्यूज़ से जुड़े हुए हैं. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय डेस्क की भी जिम्मेदारी संभालते हैं. सेंट्रल यूनिर्वसिटी ऑफ साउथ बिहार से 2022 में पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक की डिग्री हासिल की. राजनीति, चुनाव, सामाजिक विषयों और साहित्य में रुचि है. तथ्यों की गहराई और भाषा की संवेदनशीलता पर जोर देते हैं. राजनीति से जुड़ी खबरों पर लगातार लिख रहे हैं

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