सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान मुस्लिम औरतों के मस्जिद में दाखिले और वहां नमाज अदा करने को लेकर बना मुद्दा अब अवामी बहस में है. अदालत में बहस के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील एमआर शमशाद ने कहा कि मुस्लिम औरतों के मस्जिद में दाखिले में कोई मनाही नहीं है और उन्हें नमाज पढ़ने को लेकर पूरी छूट है. सुनवाई के दौरान ये बात भी आई कि भारत में मुस्लिम औरतें मस्जिदों में नमाज पढ़ने जाने को बहुत तरजीह नहीं देतीं.
इस मामले में हालांकि, पुणे की रहने वाली आफरीन पीरजादा ने अपनी अर्जी में मांग की कि उन्हें मस्जिद की अगली सफ (लाइन) में नमाज अदा करने के लिए जगह दी जाए. इस अपील के जवाब में मुस्लिम पक्ष के वकील ने अपनी दलील दी कि मस्जिद में कोई भी जगह किसी खास के लिए रिजर्व नहीं होती है.
ऐसे में सवाल उठते हैं, ऐसे कौन-कौन से मुद्दे हैं जहां मुस्लिम मर्द और औरतों के अधिकारों में अंतर है और कहां औरत को मर्द पर और मर्द को औरत पर तरजीह दी गई है. हम यहां उन मामलों में जिम्मेदारियों और अधिकारों की बात कर रहे हैं जहां ये फर्क साफ जाहिर है या सीधे तौर पर जहां अंतर दिखता है...
1. विरासत (मीरास) में औरतों के लिए हुक्म क्या?
मोटे तौर पर इस्लाम में बेटा और बेटी को विरासत में फर्क के साथ अधिकार दिए गए हैं. दो बेटियों और एक बेटे का हिस्सा बराबर होता है. इसके पीछे का तर्क साफ है कि मर्द पर परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी होती है. बेटे पर बूढ़े माता-पिता के भरण-पोषण की जिम्मेदारी होती है, जबकि बेटी को इससे छूट दी गई है.
दूसरा, लड़की को शौहर की तरफ से हक मिलता है. एक टीकाकार की राय है कि इस्लाम में विरासत के अधिकार को समझने के लिए देश के महिला आरक्षण को समझ सकते हैं, जहां महिलाओं को 33 फीसदी ही आरक्षण दिया गया, क्योंकि उन्हें सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार होता है और इस तरह उनका प्रतिनिधित्व बराबर हो सकता है. इसी तरह महिलाओं को मायके और ससुराल, दोनों तरफ से हिस्से का अधिकार है, जो कुल मिलाकर बराबर हो जाता है.
2. आर्थिक जिम्मेदारी में मर्द को कहा गया 'कव्वाम'
मर्द पर परिवार का खर्च (नफका) फर्ज है, मर्द को कव्वाम कहा गया है, जबकि औरत अपनी कमाई और संपत्ति की खुद मालिक होती है. उस पर खर्च करने की जिम्मेदारी नहीं होती. यहां आर्थिक जिम्मेदारी के मामले में औरतों पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती, उन्हें इससे पूरी तरह से छूट दी गई है. भोपाल के शहर मुफ्ती रईस अहमद कासमी अपनी किताब खजाना-ए-मीरास में मर्द और औरत की जिम्मेदारी बताते हुए कहते हैं:
- मर्द की भूमिका: परिवार में मर्द को कव्वाम कहने का मतलब है कि परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करना, सुरक्षा देना और सही रास्ता दिखाना उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. शादी के समय मर्द को मेहर देना होता है.
- महिला की भूमिका: महिला को इस आर्थिक बोझ से पूरी तरह आजाद रखा गया है. वह अपनी संपत्ति की मालिक होती है और चाहे तो अपनी इच्छा से परिवार पर खर्च कर सकती है, लेकिन यह उस पर अनिवार्य नहीं है.
3. महिलाओं की गवाही (शहादत) के नियम पेचीदा
गवाही का मुद्दा इस्लाम में काफी विवादित है और इसे लेकर इस्लाम के अलग-अलग संप्रदायों में खासा मतभेद भी है. लेकिन भारत में इस्लाम के जिस संप्रदाय की बहुलता है, वहां औरतों की गवाही को मर्दों के बराबर नहीं माना गया है.
जैसे सुन्नी इस्लाम के हनफी संप्रदाय में शादी-विवाह यानी निकाह के लिए दो मर्दों की गवाही जरूरी मानी गई है. अगर गवाह औरत हो तो एक मर्द की जगह दो औरतों की गवाही जरूरी मानी गई है. कुछ मामलों (जैसे वित्तीय लेन-देन) में भी दो औरतों की गवाही एक मर्द के बराबर मानी गई है. हालांकि हर केस में यह नियम लागू नहीं होता, इसके नियम बहुत ही पेचीदा हैं.
मुफ्ती रईस अहमद कासमी का कहना है, 'इसका आधार कुरान की वह आयत है जो कर्ज के लेन-देन में दो महिलाओं के गवाह होने की बात करती है ताकि यदि एक भूल जाए तो दूसरी उसे याद दिला सके. हालांकि, अन्य मामलों जैसे पारिवारिक कानून (जैसे बच्चे के जन्म, स्तनपान) में एक महिला की गवाही ही काफी और मान्य होती है. यहां तक कि कुछ मामलों में पुरुषों की गवाही भी स्वीकार नहीं की जा सकती. यह किसी महिला की ईमानदारी या बुद्धि पर सवाल नहीं है, बल्कि उसकी सामाजिक भूमिका के संदर्भ में एक सावधानी है.'
4. शादी और तलाक के मामले में औरतों के क्या हुकूक?
मर्द को तलाक देने का अधिकार सीधा है, लेकिन औरत को खुला ( शर्तों के साथ शादी तोड़ने का अधिकार) या अदालत के जरिए तलाक लेना होता है. इसी तरह मर्द को एक से ज्यादा शादी (चार तक) की अनुमति है, लेकिन भारत के कुछ राज्यों में पोलीएंड्री जैसी रस्में हैं, जबकि इस्लाम में इसकी इजाजत नहीं है.
5. पारिवारिक भूमिका में औरतों का क्या रोल?
परिवार में मर्द को ‘कव्वाम’ (जिम्मेदार/प्रमुख) माना गया है. इसका सीधा अर्थ हुआ कि जिम्मेदारी और जवाबदेही मर्द की ज्यादा है, लेकिन इस हैसियत से महिलाओं को दूर रखा गया है.
मुफ्ती रईस अहमद कासमी इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि यह मर्द और औरत के बीच श्रेष्ठता का मामला नहीं है. इसे एक 'अधिकार' नहीं बल्कि मर्द पर एक भारी 'जिम्मेदारी' के रूप में देखा जाता है, जिसके लिए उसे अल्लाह के सामने जवाबदेह होना पड़ेगा. यह विभाजन जैविक और सामाजिक अंतर के आधार पर बेहतर सामाजिक व्यवस्था बनाने के लिए है, जिसमें दोनों की भूमिका एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करना है.
6. इबादत से जुड़े औरतों के नियम क्या?
नमाज में जमाअत की अगुवाई यानी इमामत का अधिकार मर्द को दिया गया है. जहां-जहां औरतें इमामत का काम कर रही हैं, वहां उन्हें औरतों की जमात की ही अगुवाई की इजाजत दी गई है. हालांकि, बदलते वक्त में ऐसी मिसालें मिल रही हैं जहां औरतें इमामत कर रही हैं, लेकिन मोटे तौर पर इस्लाम की मुख्यधारा में औरत की इमामत का चलन या स्वीकार्यता नहीं है.
आखिर सबसे अहम बात- इस्लामी स्कॉलरों ने इन फर्क को इस्लाम में ‘बराबरी’ से ज्यादा ‘न्याय‘ के नजरिए से समझाने की कोशिश करते हैं.
