सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए याचिका दाखिल करने वाली संस्था से सुप्रीम कोर्ट ने कड़े सवाल पूछे हैं. 9 जजों की संविधान पीठ ने याचिका दायर करने के आधार और याचिका की विश्वसनीयता पर भी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि याचिका दाखिल करते समय 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन (IYLA)' के अध्यक्ष नौशाद अली थे. मंदिर के नियमों में उनकी दिलचस्पी समझ से परे है.
संस्था की दलीलमौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर चल रही विस्तृत सुनवाई के 11वें दिन IYLA की तरफ से पेश वकील ने कहा कि नौशाद अली का सिर्फ अध्यक्ष की हैसियत से याचिका में है. संस्था का मानना है कि 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में न जाने देना स्त्रीत्व का अपमान है. संस्था ने यह याचिका मीडिया में छपी रिपोर्ट के आधार पर दाखिल की थी.
'PIL बने पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन'बेंच की सदस्य जस्टिस बी वी नागरत्ना ने PIL का आधार बनने वाले मीडिया रिपोर्ट्स पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, 'कई बार लेख छपवाए ही इसलिए जाते हैं कि उनके आधार पर PIL दाखिल हो सके. पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन अब प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन, पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन, पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गया है.'
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'कूड़ेदान में फेंकना चाहिए था'बेंच की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि मंदिर के नियमों के विरुद्ध वहां जबरन प्रवेश की कोशिश 'इंडिविजुअल मिसकंडक्ट' यानी व्यक्तिगत दुर्व्यवहार था. ऐसी हरकत पर कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन उसे अधिकार की तरह बताते हुए याचिका दाखिल कर दी गई. CJI सूर्यकांत ने सख्त लहजे में कहा, '2006 में दाखिल याचिका सिर्फ अखबारों की खबरों के आधार पर दायर की गई थी. ऐसी याचिका को तो शुरू में ही कचरे के डिब्बे में डाल देना चाहिए था.'
'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग'बेंच के सदस्य जस्टिस अरविंद कुमार ने याचिकाकर्ता संस्था से पूछा कि क्या उसके यहां याचिका दायर करने से पहले कोई बैठक हुई? याचिका दायर करने के लिए कोई अधिकृत प्रस्ताव पारित किया गया? याचिकाकर्ता के वकील ने इसकी जानकारी न होने की बात कही. इस पर बेंच के एक अन्य सदस्य जस्टिस एम एम सुंदरेश ने इस तरह से याचिका दायर करने को 'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग' कहा.
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पूर्व CJI पर टिप्पणीIYLA का पक्ष रख रहे वकील रवि प्रकाश गुप्ता ने जजों का ध्यान इस ओर दिलाया कि पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस याचिका को बड़ी बेंच को भेजा था. उन्होंने याचिकाकर्ता वकीलों को मिल रही धमकी के चलते उनकी सुरक्षा का भी आदेश दिया था. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'पूरे सम्मान के साथ मैं यह कहना चाहूंगी कि वकीलों को सुरक्षा देने की बजाय उन्हें यह याचिका खारिज कर देनी चाहिए थी. इस तरह उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो जाती.'
