EXPLAINER: इलाज के नाम पर अस्पतालों का बड़ा धोखा? संसद की रिपोर्ट में खुलासा
राज्यसभा में रखी गई रिपोर्ट में संसदीय समिति ने प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की बढ़ती लागत, जरूरत से ज्यादा जांच, दवाइयों के मार्जिन और इंश्योरेंस से जुड़ी कई समस्याओं पर चिंता जताई है.

अस्पताल में मरीज जाता है इलाज कराने, लेकिन कई बार इलाज के साथ बिल, टेस्ट, दवाइयों और मेडिकल सामान का ऐसा खर्च सामने आता है, जिसे समझना आम आदमी के लिए आसान नहीं होता. अब देश के हेल्थकेयर सिस्टम को लेकर संसद समिति की एक रिपोर्ट ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं. 7 अगस्त को राज्यसभा में रखी गई 361 पन्नों की रिपोर्ट में संसदीय समिति ने प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की बढ़ती लागत, जरूरत से ज्यादा जांच, मेडिकल इम्प्लांट की कीमत, दवाइयों के मार्जिन और इंश्योरेंस से जुड़ी कई समस्याओं पर चिंता जताई है. समिति ने कई मामलों में सुधार की सिफारिश भी की है.
सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में इतना बड़ा अंतर
रिपोर्ट में सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के खर्च का अंतर भी बताया गया है. एक बीमारी के इलाज का औसत खर्च सरकारी अस्पताल में करीब 6,631 रुपये बताया गया है, जबकि प्राइवेट अस्पताल में यही खर्च करीब 50,508 रुपये है. बच्चे के जन्म के मामले में भी बड़ा अंतर है. सरकारी अस्पताल में औसत खर्च करीब 2,299 रुपये है जबकि प्राइवेट अस्पताल में यह करीब 37,630 रुपये तक पहुंच जाता है, यानी कई मामलों में मरीज को सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के बीच कई गुना ज्यादा खर्च करना पड़ता है.
इलाज की कीमत तय कैसे होती है?
संसदीय समिति ने अस्पतालों में इलाज की कीमत तय करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ जगहों पर कीमतें मांग और परिस्थितियों के हिसाब से तय हो सकती हैं. इसका सबसे बड़ा असर इमरजेंसी में पहुंचने वाले मरीजों पर पड़ सकता है. जब मरीज की हालत गंभीर होती है तब परिवार के पास कीमत पर बातचीत करने या दूसरे विकल्प तलाशने का समय बहुत कम होता है.
आखिर कमरा बदलने से इलाज का खर्च क्यों बदल जाता है?
रिपोर्ट में कमरे की कैटेगरी के हिसाब से इलाज के पैकेज की कीमत बदलने पर भी सवाल उठाया गया है. अगर डॉक्टर ऑपरेशन और मेडिकल प्रक्रिया वही है तो सिर्फ जनरल वार्ड से प्राइवेट या डीलक्स रूम में जाने पर इलाज की कीमत में बड़ा अंतर क्यों हो? यह सवाल समिति ने उठाया है. समिति ने ऐसी व्यवस्था को खत्म करने की जरूरत बताई है.
जरूरत से ज्यादा टेस्ट भी बढ़ा सकते हैं बिल
अस्पतालों में ज्यादा खर्च का एक बड़ा कारण जरूरत से ज्यादा मेडिकल टेस्ट भी हो सकते हैं. समिति के सामने ऐसी शिकायतें आईं कि कई प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को जरूरत से ज्यादा जांच लिखी जाती हैं. कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में PET Scan, MRI, CT Scan और Genetic Test जैसी महंगी जांच बार-बार कराने से इलाज का खर्च कई गुना बढ़ सकता है. समस्या यह भी है कि कई मेडिकल जांचों की कीमत हर अस्पताल में अलग-अलग हो सकती है.
बिना जरूरत ऑपरेशन पर भी समिति की नजर
प्राइवेट अस्पतालों में बढ़ती C-Section यानी सिजेरियन डिलीवरी की दर पर भी समिति ने चिंता जताई है. यहां ध्यान रखना जरूरी है कि जरूरत पड़ने पर C-Section मां और बच्चे दोनों के लिए जरूरी और जीवन बचाने वाला इलाज हो सकता है. सवाल उन मामलों का है, जहां मेडिकल जरूरत के बिना ऑपरेशन किए जाने की आशंका हो. समिति ने ऐसे मामलों की ऑडिट और जांच की जरूरत बताई है.
अस्पताल की अपनी दुकान, मरीज की अपनी मजबूरी
कई अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल से ही दवा, मेडिकल सामान या इम्प्लांट लेने के लिए कहा जाता है. इस व्यवस्था पर भी समिति ने सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में बेलगावी के एक मेडिकल कॉलेज का उदाहरण दिया गया है, जहां खरीद कीमत पर करीब 20 प्रतिशत मार्जिन जोड़कर बिल करने की बात सामने आई. यही वजह है कि समिति ने मेडिकल सामान पर मार्जिन को नियंत्रित करने की जरूरत बताई है.
इम्प्लांट की कीमत लाखों में - सवाल मार्जिन का
मेडिकल इम्प्लांट इस पूरी रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा है. रिपोर्ट में घुटने के इम्प्लांट की कीमत करीब 2.5 से 5 लाख रुपये, कूल्हे के इम्प्लांट की 2.5 से 6 लाख रुपये, पेसमेकर की 2 से 5 लाख रुपये और ICD की कीमत 5 से 12 लाख रुपये तक बताई गई है. रीढ़ के इम्प्लांट की कीमत करीब 3 से 8 लाख रुपये, जबकि हार्ट वाल्व की कीमत 3 से 8 लाख रुपये तक बताई गई है. समिति ने कहा है कि निर्माता से लेकर अस्पताल तक अलग-अलग स्तरों पर जुड़ने वाले मार्जिन की वजह से मेडिकल डिवाइस की कीमत काफी बढ़ सकती है.
सरकार ने कुछ मेडिकल डिवाइस की कीमतों पर सीमा लगाई है, लेकिन समिति ने बाकी डिवाइस और इम्प्लांट की कीमतों को भी नियंत्रित करने की जरूरत बताई है.
दवाइयों में कितना मार्जिन?
रिपोर्ट में फार्मेसी के मार्जिन और बिलिंग को लेकर भी चिंता जताई गई है. रिपोर्ट के मुताबिक आम दवाओं पर औसत मार्जिन करीब 43 प्रतिशत और कुछ कैंसर की दवाओं पर 50 से 60 प्रतिशत तक हो सकता है. समिति ने यह भी चिंता जताई है कि कीमत नियंत्रण से बचने के लिए कुछ कंपनियां अलग ताकत या फॉर्मूलेशन वाली दवाएं बाजार में ला सकती हैं, जो कीमत नियंत्रण के दायरे में नहीं आतीं.
हेल्थ इंश्योरेंस भी पूरी तरह आसान नहीं
लोगों को लगता है कि हेल्थ इंश्योरेंस होने के बाद अस्पताल का खर्च बड़ी समस्या नहीं रहेगा, लेकिन रिपोर्ट में इंश्योरेंस सिस्टम से जुड़ी कई दिक्कतों का भी जिक्र है. क्लेम में देरी, क्लेम रोकना और डिस्चार्ज में देरी जैसी शिकायतों पर समिति ने चिंता जताई है. समिति ने अस्पतालों की तरफ से होने वाली गड़बड़ियों का भी जिक्र किया है. इनमें बढ़ा-चढ़ाकर बिल बनाना, फर्जी क्लेम और मेडिकल रिकॉर्ड में हेरफेर जैसी शिकायतें शामिल हैं यानी अगर इंश्योरेंस सिस्टम में फर्जीवाड़ा बढ़ता है तो उसका असर आखिरकार इंश्योरेंस प्रीमियम पर भी पड़ सकता है.
सरकारी अस्पताल में भी मरीज को खरीदना पड़ सकता है सामान
रिपोर्ट में सरकारी अस्पतालों की समस्याओं को भी सामने रखा गया है। RIMS इंफाल ने समिति को बताया कि वहां ऑपरेशन मुफ्त हो सकता है, लेकिन अगर अस्पताल के स्टोर में जरूरी सामान उपलब्ध नहीं है तो मरीज को बाहर से करीब 15 से 20 हजार रुपये का सामान खरीदना पड़ सकता है. समिति ने सरकारी अस्पतालों में जीरो स्टॉकआउट पॉलिसी लागू करने की जरूरत बताई है ताकि इलाज के दौरान मरीज को बाहर से जरूरी सामान खरीदने की मजबूरी न हो.
सस्ती सरकारी जमीन पर बने अस्पतालों से गरीबों को क्या फायदा?
समिति ने उन प्राइवेट अस्पतालों पर भी सवाल उठाया है, जिन्हें सरकार से सस्ती जमीन मिली है. ऐसे अस्पतालों में गरीब मरीजों के लिए मुफ्त या सस्ता इलाज देने जैसी शर्तें हो सकती हैं. समिति ने सिफारिश की है कि ऐसे अस्पतालों में 20 प्रतिशत तक बेड गरीब मरीजों के लिए सरकारी तय दरों पर रखना कानूनी रूप से जरूरी किया जाए, यानी अगर अस्पताल को सरकार की जमीन का फायदा मिला है तो उसका फायदा गरीब मरीजों तक भी पहुंचना चाहिए.
अस्पतालों ने भी रखी अपनी बात
संसदीय समिति ने सिर्फ अस्पतालों की कमियां नहीं गिनाईं. अस्पतालों ने भी अपने पक्ष में कई बातें रखीं. राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट जैसे अस्पतालों ने कहा कि आयुष्मान भारत और CGHS जैसी सरकारी योजनाओं में तय पैकेज रेट कई बार अस्पताल की वास्तविक लागत से कम होते हैं. बड़े अस्पताल बनाने, महंगी मशीनें लगाने और विशेषज्ञ डॉक्टरों की व्यवस्था करने में भारी निवेश होता है.
ऐसे में अगर सरकारी योजना के मरीज का इलाज कम रेट पर करना पड़ता है तो अस्पतालों का कहना है कि लागत और पैकेज के बीच का अंतर भी बड़ी समस्या है. समिति ने इस ओर भी इशारा किया है कि कम सरकारी पैकेज रेट की भरपाई कभी-कभी दूसरे मरीजों से ज्यादा वसूली करके की जा सकती है.
मरीज अपने आपको कैसे बचाए?
अस्पताल में इलाज के दौरान कुछ सावधानियां मरीज के लिए काफी मददगार हो सकती हैं.
1. सबसे पहले भर्ती होने से पहले लिखित खर्च का अनुमान मांगें. यह भी पूछें कि पैकेज में क्या शामिल है और क्या अलग से देना होगा.
2. दूसरा - हमेशा आइटमाइज्ड बिल मांगें. सिर्फ कुल रकम देखकर भुगतान न करें.
3. तीसरा- दवाइयों की कीमत खुद भी चेक करें. 'Pharma Sahi Daam' जैसे प्लेटफॉर्म से कीमत की जानकारी ली जा सकती है.
4. इसके अलावा जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी जैसे विकल्पों की कीमत भी तुलना की जा सकती है.
5. सबसे जरूरी बात- डॉक्टर से सवाल पूछने में झिझकें नहीं. कौन सा टेस्ट जरूरी है ,ऑपरेशन क्यों करना है, इम्प्लांट की कीमत कितनी है और दूसरा विकल्प क्या है, ये सवाल मरीज या उसके परिवार को पूछने का पूरा अधिकार है.
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अभी ये कानून नहीं - सिफारिशें हैं
यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है. संसदीय समिति की रिपोर्ट में की गई सिफारिशें अपने आप कानून नहीं बन जातीं. अब सरकार को इन सिफारिशों पर जवाब देना होगा और तय करना होगा कि इनमें से किन सुझावों को किस तरह लागू किया जाए, लेकिन इस रिपोर्ट ने देश के हेल्थकेयर सिस्टम को लेकर एक बड़ी बहस जरूर खड़ी कर दी है.
इलाज की कीमत कौन तय करता है? मरीज को कितनी जानकारी मिलती है? मेडिकल सामान पर कितना मार्जिन जुड़ता है? और आखिर इलाज के पूरे सिस्टम में सबसे ज्यादा बोझ किसकी जेब पर पड़ता है? यही वो सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय में सरकार और हेल्थकेयर सिस्टम दोनों को देना होगा.
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