Rajasthan Political Crisis: कांग्रेस (Congress) की राजनीति में वो सब हो रहा है जिसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी. रविवार को जयपुर (Jaipur) में गांधी परिवार के वफादार कहे जाने वाले अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के समर्थकों ने खुलेआम बगावत करके बता दिया कि गहलोत की मर्जी के बिना राज चलाना आसान नहीं है. रविवार दोपहर दो ढाई बजे तक सब कुछ सामान्य लग रहा था.

दिल्ली से अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे जयपुर पहुंच चुके थे. शाम 7 बजे विधायक दल की बैठक प्रस्तावित थी जिसमें नए सीएम के नाम पर चर्चा होनी थी और इस बैठक से पहले गहलोत तनोट माता का आशीर्वाद लेने जैसलमेर गये थे.

इस बीच दोपहर करीब साढे तीन बजे जैसलमेर में तनोट माता के दर्शन के बाद सीएम अशोक गहलोत का बयान आया. गहलोत ने कहा कि वो अंतिम सांस तक राजस्थान की सेवा करना चाहते हैं और सीएम उसी को होना चाहिए जो अगला चुनाव जितवा सके. माना जा रहा है कि जयपुर से साढ़े पांच सौ किलोमीटर दूर जैसलमेर में अशोक गहलोत ने जो बयान दिया उसके बाद पूरा पासा पलट गया.

इस तरह बदल गई पूरी तस्वीर

शाम चार बजे के आसपास खबर आई. खबर ये कि गहलोत कैंप से जुड़े राज्य के यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल ने अपने घर गहलोत समर्थकों की बैठक बुलाई है. शाम 5 बजे बुलाई गई इस बैठक में गहलोत समर्थक ज्यादातर मंत्री विधायक पहुंचे और फिर बगावत की बुनियाद रख दी गई.

राजस्थान की राजनीति में दोपहर 3 बजे तक सब कुछ सामान्य प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ता हुआ दिख रहा था लेकिन घंटे भर के भीतर ही तस्वीर बदलने लगी. शाम 7 बजे मुख्यमंत्री निवास में होने वाली विधायक दल की बैठक से पहले गहलोत कैंप ने समानांतर बैठक करके इरादे जाहिर कर दिये.

जयपुर में विरोध के वक्त गांधी परिवार कहां था

जयपुर में रविवार दोपहर बाद जिस वक्त गहलोत कैंप का शक्ति प्रदर्शन शुरू हुआ उस वक्त राहुल गांधी केरल के त्रिशूर जिले में थे. त्रिशूर जिले के वडक्कांचेरी में राहुल अपनी यात्रा के 18वें दिन पहुंचे थे. कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल राहुल के साथ थे और वेणुगोपाल के जरिये ही जयपुर की जानकारी राहुल को मिल रही थी.

रात को विधायकों की बगावत की खबर जब टीवी पर चलने लगी तक मल्लिकार्जुन खड़गे से वेणुगोपाल की बात हुई. रविवार को राहुल गांधी ट्विटर पर ज्यादा सक्रिय नहीं थे. शाम सवा सात बजे उन्होंने उत्तराखंड की घटना को लेकर कल का आखिरी ट्वीट किया.

सोनिया कर रहीं थी नीतीश और लालू से मुलाकात

राहुल केरल में थे तो रविवार की शाम 7 बजे के आसपास सोनिया गांधी दस जनपथ में लालू यादव और नीतीश कुमार से मिल रहीं थी. जिस वक्त लालू और नीतीश सोनिया से मिलने पहुंचे उस वक्त गहलोत कैंप की बगावत की खबर सामने आ चुकी थी. सोनिया गांधी ने लालू नीतीश से भविष्य की रणनीति पर बात नहीं की.

तीन चेहरों पर चल रहा पावर गेम

प्रियंका गांधी भी कल पार्टी की गतिविधियों को लेकर ट्विटर पर एक्टिव नहीं दिखी. कल दोपहर को उन्होंने उत्तराखंड की घटना को लेकर ही ट्विट किया. जिस वक्त बगावत शुरू हुई उस वक्त सोशल मीडिया पर प्रियंका गांधी नहीं दिख रही थी. इस वक्त तीन चेहरों के आसपास राजस्थान का ये पूरा पावर गेम चल रहा है. पहला चेहरा सोनिया गांधी का, दूसरा अशोक गहलोत का और तीसरा सचिन पायलट का.

पायलट प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर

साल 2018 में कांग्रेस की जीत के बाद ये तीसरा मौका है जब पायलट प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है. चुनाव के वक्त सचिन पायलट कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे और उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें सीएम बनाएगी लेकिन डिप्टी सीएम की कुर्सी से संतोष करना पड़ा.

साल 2020 में कुर्सी के लिए सचिन ने बगावत की लौ जलाई तो गहलोत की रणनीति ने उन्हें फिर से पटखनी दी और अब ये तीसरा मौका है जब अशोक गहलोत पाय़लट की पॉलिटिक्स पर भारी पड़े हैं.

राजस्थान में कांग्रेस का मतलब गहलोत

रविवार की रात सोनिया गांधी के दूत बनकर गये मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को गहलोत समर्थकों ने न सिर्फ खुली चुनौती दी बल्कि रात के अंधेरे लेकर दिन के उजाले तक में साफ संदेश दे दिया कि राजस्थान में कांग्रेस का मतलब गहलोत ही है दूसरे के बारे में सोचना भी मत. अब सूत्रों की मानें तो गहलोत कैंप इस बात पर अड़ गया है कि सीएम या तो अशोक गहलोत रहेंगे या फिर गहलोत जिसके माथे पर हाथ रखेंगे वो सीएम बनेगा. इसिलिए अब सवाल ये कि

  • क्या गांधी परिवार की हनक खत्म हो गई है?
  • क्या गहलोत गांधी परिवार से बड़े हो गए हैं?
  • क्या गहलोत की बात नहीं मानी गई तो कांग्रेस टूट जाएगी?

वैसे तो गहलोत और पायलट का झगड़ा पुराना है लेकिन ताजा विवाद की वजह है उदयपुर की वो बैठक जिसमें पार्टी ने एक व्यक्ति एक पद का फॉर्मूला बनाया था. गांधी परिवार अपने सबसे भोरेसेमंद नेताओं में से एक अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाकर पार्टी पर पकड़ बनाये रखना चाहता है लेकिन गहलोत की नजर अध्यक्ष के साथ ही सीएम की कुर्सी पर भी है और यही इस बगावत की जड़ में है.

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