भारत में प्लास्टिक के नोटों को लेकर चर्चा तेज है, लेकिन यह तकनीक दुनिया के लिए नई नहीं है. करीब चार दशक पहले ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले प्लास्टिक यानी पॉलिमर करेंसी की शुरुआत की थी और आज 60 से ज्यादा देशों में इसका इस्तेमाल हो रहा है. अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी इस विकल्प पर विचार कर रहा है, हालांकि फिलहाल इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है.
1988 में ऑस्ट्रेलिया ने की थी शुरुआतदुनिया में सबसे पहले प्लास्टिक नोट ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में जारी किए थे. इन नोटों को ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए पॉलिमर तकनीक का इस्तेमाल किया गया था. बाद में कनाडा, ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने भी इसी मॉडल को अपनाया. आज प्लास्टिक करेंसी को लंबी उम्र और बेहतर सुरक्षा के लिए जाना जाता है.
अब भारत में भी हो रही है चर्चाआरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में कहा कि केंद्रीय बैंक प्लास्टिक नोटों की संभावना पर विचार कर रहा है. उन्होंने बताया कि अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और विशेषज्ञ इसकी उपयोगिता, लागत और व्यवहारिकता का अध्ययन कर रहे हैं. योजना फिलहाल शुरुआती चरण में है.
क्यों पसंद किए जाते हैं प्लास्टिक नोट?पॉलिमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा मजबूत होते हैं. ये जल्दी फटते नहीं, पानी से खराब नहीं होते और लंबे समय तक चल सकते हैं. साथ ही इनमें सुरक्षा फीचर बेहतर होने के कारण नकली नोट बनाना भी मुश्किल माना जाता है.
हर तकनीक की तरह इसके भी हैं कुछ नुकसानप्लास्टिक नोटों की छपाई कागजी नोटों के मुकाबले अधिक महंगी होती है. इसके अलावा इन्हें रीसायकल करना भी आसान नहीं होता. यही वजह है कि किसी भी बड़े फैसले से पहले आरबीआई सभी पहलुओं का गहराई से मूल्यांकन कर रहा है.
कैश को लेकर घबराने की जरूरत नहींआरबीआई गवर्नर ने यह भी साफ किया है कि देश में नकदी की कोई कमी नहीं है. बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त मात्रा में करेंसी उपलब्ध है और जरूरत पड़ने पर एटीएम व बैंकों तक समय पर नकदी पहुंचाई जा रही है.
फिलहाल इंतजार करना होगादुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल हो रहे प्लास्टिक नोट भारत में भी आएंगे या नहीं, इसका फैसला अभी बाकी है. आरबीआई का कहना है कि सभी पहलुओं की जांच के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाएगा. ऐसे में फिलहाल लोगों को आधिकारिक घोषणा का इंतजार करना होगा.
