Delimitation Bill: क्या राज्यसभा की ताकत पहले से कमजोर हो जाएगी? एक्सपर्ट्स से समझें लोकसभा की बढ़ती शक्ति का गणित
Delimitation Bill: परिसीमन बिल से लोकसभा की सीटें बढ़ाने की कवायद तेज है, लेकिन राज्यसभा पर किसी का ध्यान नहीं गया. अगर दोनों सदनों में सीटों का अंतर बढ़ गया तो इसके नतीजे क्या होंगे?

संविधान के 131वां संशोधन में परिसीमन बिल 2026 में लोकसभा की अधिकतम सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, जिसमें 815 राज्यों के लिए और 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए. संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राज्यसभा की अधिकतम सीटें 250 ही रहेंगी यानी बिल में इसे बढ़ाने या बदलने का कोई प्रावधान नहीं है. PRS इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इससे लोकसभा और राज्यसभा के बीच सीटों का अनुपात 2.2:1 से बढ़कर 3.3:1 हो जाएगा. यानी पहले लोकसभा सीटों की संख्या राज्यसभा की तुलना में लगभग दोगुनी थी, अब तीन गुना से ज्यादा हो जाएगी. यह बदलाव सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि संसद की शक्ति संतुलन का है...
सवाल 1: राज्यसभा की ताकत कम होने का सबसे बड़ा असर क्या होगा?
जवाब: पॉलिटिकल एक्सपर्ट हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं कि राज्यसभा की ताकत कम होने का सबसे बड़ा असर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में दिखेगा. राष्ट्रपति चुनाव का निर्वाचक मंडल लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों से बनता है. राज्यसभा सदस्यों का सापेक्ष हिस्सा घटने से राज्यसभा का वजन कम हो जाएगा. इसी तरह उपराष्ट्रपति का चुनाव सिर्फ संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से होता है.
हालांकि, हर्षवर्धन त्रिपाठी का यह भी कहना है कि अब राष्ट्रपति चुनाव 2027 में होगा, तब तक सीटों की व्यवस्था जस की तस रहेगी. लोकसभा की सीटें बढ़ने का असर 2029 के बाद दिखना शुरू होगा, वो भी अगर राज्यसभा की सीटें कम रहें. यानी फिलहाल राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति चुनाव पर परिसीमन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा. वैसे भी राज्यसभा की सीटों पर लोकसभा से ज्यादा विधानसभा का असर पड़ता है. बस यह सारे बदलाव सही वक्त पर होना चाहिए.
वहीं, PRS इंडिया के मुताबिक राज्यसभा सदस्यों का सापेक्ष हिस्सा घटने से इन चुनावों में राज्यसभा का प्रभाव कम हो जाएगा, जबकि लोकसभा का दबदबा बढ़ जाएगा. इसका मतलब यह है कि राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली राज्यसभा अब केंद्र सरकार या लोकसभा के बहुमत वाले दल के फैसलों पर कम रोक लगा पाएगी.
सवाल 2: तो क्या जॉइंट सिटिंग में राज्यसभा की भूमिका क्या कमजोर हो जाएगी?
जवाब: पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं कि यह सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है. अनुच्छेद 108 के तहत अगर कोई बिल एक सदन में पास हो जाए लेकिन दूसरे सदन में अटक जाए, तो संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है. पहले लोकसभा और राज्यसभा के बीच अनुपात 2.2:1 था, इसलिए राज्यसभा का वजन ज्यादा था. 3.3:1 अनुपात होने से लोकसभा का वजन बहुत बढ़ जाएगा. अगर विपक्ष के पास राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत हो, तब भी सरकार अगर लोकसभा में सिर्फ 56 प्रतिशत सीटें रखती है तो संयुक्त बैठक में बिल पास करा सकती है.' यानी राज्यसभा अब बिलों को लंबे समय तक रोकने या संशोधन कराने में पहले जितनी प्रभावी नहीं रहेगी. लेकिन यह तब मुमकिन होगा जब लोकसभा में सीटें 815 हो चुकी हों और राज्यसभा में 250 ही रह गई हों.
सवाल 3: परिसीमन बिल का काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स और फेडरलिज्म पर क्या असर पड़ेगा?
जवाब: अनुच्छेद 75 के मुताबिक, केंद्र सरकार में मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा सदस्यों की 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकती. PRS इंडिया के अनुसार, लोकसभा की सीटें 543 से 815 हो जाने पर मंत्रियों की अधिकतम संख्या 81 से बढ़कर 122 हो जाएगी. यानी प्रधानमंत्री को ज्यादा मंत्रियों की नियुक्ति का अधिकार मिल जाएगा. यह सरकार को ज्यादा बड़े मंत्रिमंडल बनाने की छूट देगा, लेकिन राज्यसभा का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कमजोर हो जाएगा, क्योंकि कई मंत्री राज्यसभा से होते हैं.
राज्यसभा को 'राज्यों का सदन' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके सदस्य राज्य विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं और सीटें राज्यों की आबादी के हिसाब से तय होती हैं. लोकसभा बढ़ने पर राज्यसभा अपरिवर्तित रहने से संसद का संतुलन लोकसभा की तरफ झुक जाएगा. PRS इंडिया की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इससे 'राज्यसभा का संसदीय बिलों पर नियंत्रण कमजोर' हो जाएगा. विपक्ष और दक्षिणी राज्य इसे संघीय भावना के लिए खतरा मान रहे हैं, क्योंकि राज्यसभा छोटे और कम आबादी वाले राज्यों को भी समान आवाज देती है. सरकार का तर्क है कि लोकसभा जनता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है, इसलिए उसकी ताकत बढ़ना लोकतंत्र को मजबूत करेगा.
हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं, 'मान लीजिए परिसीमन बिल आज ही पास हो गया, तब भी फौरन लागू नहीं होगा. इसके लिए 2029 तक इंतजार करना ही पड़ेगा, लेकिन राज्यसभा की शक्तियां कमजोर होना आसान बात नहीं है. जिस तरह परिसीमन से लोकसभा की सीटें बढ़ा दी गईं, वैसे ही राज्यसभा की भी बढ़ाई जा सकती हैं. इसके लिए पहले विधानसभा की सीटें बढ़ानी होंगी, क्योंकि राज्यसभा का प्रतिनिधित्व विधानसभा से तय होता है. यह कोई 4-6 महीनों का काम नहीं होगा, इसमें काफी समय लगेगा.'
सवाल 4: क्या यह सिर्फ संख्या का बदलाव है या संसद की पूरी कार्यप्रणाली प्रभावित होगी?
जवाब: यह सिर्फ संख्या का बदलाव नहीं है. इससे पूरा संसदीय संतुलन बदलेगा:
- बिल पास होने पर लोकसभा का दबदबा बढ़ेगा.
- राज्यसभा बिलों को आसानी से रोक नहीं पाएगी.
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में राज्यसभा का वजन घटेगा.
- मंत्रिमंडल बड़ा हो सकेगा.
अगर बिल पास हो गया तो 2029 चुनाव के बाद नई लोकसभा बनेगी. राज्यसभा की 250 सीटें वैसे ही रहीं, तो उसका सापेक्ष प्रभाव 30 प्रतिशत तक गिर जाएगा. बिल में राज्यसभा सीटें बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है, इसलिए यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहेगी. 131वें संविधान संशोधन बिल 2026 लोकसभा को आबादी के हिसाब से ज्यादा प्रतिनिधित्व देगा, लेकिन राज्यसभा को अपरिवर्तित छोड़कर संसद के दोनों सदनों के बीच शक्ति संतुलन बदल देगा. पहले राज्यसभा लोकसभा की लगभग आधी ताकत रखती थी, फिर सिर्फ एक-तिहाई रखेगी. इस बात को दोहराना जरूरी है कि यह तभी मुमकिन है, जब राज्यसभा की सीटों में कोई बदलाव न किया जाए.
Source: IOCL



























