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Explained: लोकसभा में महिला आरक्षण बिल फेल! अब आगे क्या होगा? केंद्र सरकार के पास यह 5 विकल्प बचे

Delimitation Bill Defeated: 16 अप्रैल को लोकसभा में परिसीमन बिल पर शुरू हुई बहस दूसरे दिन खत्म हो गई. इस बिल को जरूरी एक तिहाई वोट नहीं मिले. विपक्ष ने परिसीमन बिल को सिरे से नकार दिया. अब क्या होगा?

लोकसभा में शुक्रवार (17 अप्रैल) को शाम 7:45 बजे महिला आरक्षण बिल गिर गया. इस बिल को पास होने के लिए 326 वोट्स की जरूरत थी, लेकिन पक्ष में सिर्फ 298 वोट ही मिले, जबकि विरोध में 230 वोट पड़े. इसी के साथ सदन के विशेष सत्र का मकसद अधूरा रह गया. अब सवाल है कि इस बिल को पास कराने के लिए सरकार के पास क्या रास्ते बचे हैं? जानते हैं एक्सप्लेनर में...

सवाल 1: क्या सरकार जॉइंट सेशन से इस बिल को पास करा सकती है?  

जवाब: नहीं, बिल्कुल नहीं. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त सत्र सिर्फ साधारण विधेयकों के लिए होता है, जब दोनों सदनों में मतभेद हो. लेकिन संविधान संशोधन बिल (131वां संशोधन बिल) के लिए संयुक्त सत्र की कोई व्यवस्था नहीं है. अनुच्छेद 368 साफ कहता है कि संविधान संशोधन के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग विशेष बहुमत जरूरी है. कोई भी संयुक्त सत्र इस बिल को पास नहीं करा सकता. अगर लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, तो संयुक्त सत्र का रास्ता बंद है. यह सरकार के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है.

सवाल 2: बिल पास न होने से महिला आरक्षण पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब: हां, यही सबसे बड़ा असर है. 2023 में पास हुआ महिला आरक्षण कानून (106वां संशोधन, नारी शक्ति वंदन अधिनियम) पहले से ही लागू हो चुका है, लेकिन उसका इम्प्लिमेंटेशन परिसीमन पर टिकी हुई है. मूल कानून कहता था कि महिला आरक्षण पहली जनगणना के बाद परिसीमन के बाद ही लागू होगा. 131वां संशोधन बिल इसी को बदलने के लिए लाया गया था, ताकि 2011 जनगणना के आधार पर परिसीमन हो और 2029 के लोकसभा चुनाव से ही 33% महिला आरक्षण शुरू हो जाए.

अब यह बिल पास नहीं होने से 2023 का मूल कानून वैसा का वैसा रहेगा. मतलब, महिला आरक्षण अब अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन पूरा होने के बाद ही लागू होगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह 2034 या उसके बाद के चुनावों में लागू हो सकता है. कोई ऑटोमैटिक पांच साल की देरी नहीं, बल्कि मूल कानून की वजह से देरी बनी रहेगी.

सवाल 3: आगे सरकार के पास क्या विकल्प हैं और बिल को कैसे पास कराया जा सकता है?

जवाब: सरकार के पास कई व्यावहारिक रास्ते हैं, लेकिन सबमें समय और राजनीतिक सहमति लगेगी:

  1. बिल फिर से पेश करना: अब सरकार अगले सत्र (मॉनसून सत्र या बजट सत्र) में बिल को दोबारा लोकसभा में पेश किया जा सकता है. फिर से पूरी प्रक्रिया यानी परिचय, चर्चा और मतदान किया जाएगा.
  2. संशोधन करके दोबारा लाना: अगर विपक्ष की दक्षिण राज्यों का अनुपात बनाए रखने जैसी कुछ मांगें मान ली जाएं, तो बिल में बदलाव करके फिर से पेश किया जा सकता है.
  3. राज्यसभा में भी बहुमत जुटाना: लोकसभा पास होने के बाद राज्यसभा में भी विशेष बहुमत चाहिए. अगर राज्यसभा में अटकता है, तो फिर से चर्चा या संशोधन का रास्ता खुला है.
  4. विपक्ष से बातचीत: सरकार पहले ही कह चुकी है कि महिला आरक्षण सभी दल चाहते हैं. अगर सहमति बनी तो पास होना आसान हो जाएगा, लेकिन फिलहाल विपक्ष (खासकर दक्षिण के दल) परिसीमन को लेकर चिंतित है.
  5. कोई छोटा संशोधन: कुछ एक्सपर्ट्स सुझाव देते हैं कि बिना परिसीमन बढ़ाए, सिर्फ महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने के लिए अलग छोटा संशोधन लाया जा सकता है, लेकिन सरकार का मौजूदा प्लान सीटें बढ़ाने का है.

सवाल 4: बिल तो पास नहीं हुआ, तो अब 2029 चुनाव में क्या होगा?

जवाब: एक्सपर्ट्स कहते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव अभी 543 सीटों पर ही होंगे. परिसीमन नहीं होगा, इसलिए लोकसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ेगी. महिला आरक्षण भी लागू नहीं होगा. दक्षिण राज्यों की चिंता तुरंत टल जाएगी, लेकिन महिला आरक्षण में देरी हो जाएगी. सरकार का कहना है कि बिल पास होने पर 2029 से ही नई सीटें और आरक्षण दोनों शुरू हो सकते हैं. अगर बिल गिरा तो दोनों चीजें 2029 चुनाव तक टल जाएंगी.

परिसीमन-महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पास न होने से बिल गिर चुका है. कोई संयुक्त सत्र का कोई रास्ता नहीं है और महिला आरक्षण 2029 की बजाय 2034 या उसके बाद लागू होगा. सरकार को बिल को दोबारा लाना पड़ेगा या विपक्ष से सहमति बनानी पड़ेगी. यह सिर्फ संख्या का बिल नहीं, बल्कि देश की संसद की संरचना, संघीय ढांचे और महिला सशक्तिकरण का बिल है.

ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज़ में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. टेलीविजन और डिजिटल जर्नलिज्म की दुनिया में उन्हें 8 साल से ज्यादा का तजुर्बा है. इससे पहले वे 3 बड़े मीडिया संस्थानों में भी अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में सीनियर सब एडिटर रहे. ज़ाहिद आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर लीड भी कर चुके हैं. देश-विदेश, सियासत, कारोबार, एजुकेशन, एंटरटेनमेंट, चुनाव और समाजी मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है. आसान लहजे में असरदार और भरोसेमंद एक्सप्लेनर पेश करना उनकी पहचान है.

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