नई दिल्ली: ओडिशा को रसगुल्ला का जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग (GI टैग) मिल गया है. बंगाल और ओडिशा के बीच रसगुल्ले को लेकर लंबे वक्त से खींचतान चल रही थी. जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्रार चेन्नई ने जियोग्राफिकल इंडिकेशन कानून 1999 के आधार पर रसगुल्ला को 'ओडिशा रसगुल्ला' के तौर पर सर्टिफिकेट जारी किया है. जीआई टैग से किसी वस्तु को किसी खास जगह का विशेषाधिकार होने का प्रमाण पत्र मिलता है.

जीआई टैग को 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत 'जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स' के तहत लागू किया गया है. किसी वस्तू, फल या मिठाई को किसी स्थान विशेष का जीआई टैग मिल जाने से इन सभी को उस जगह की स्पेशलिटी माना जाता है. जिससे देशभर में उसे उस जगह के नाम से पहचान मिलती है, साथ ही विदेशी पर्यटक भी इन सब चीजों को लेकर उस जगह पर जाना पसंद करते हैं.

बताया जाता है कि ओडिशा में 15 वीं शताब्दी से रसगुल्ला बनाया जा रहा है, और यह भगवान जगन्नाथ को अर्पित किया जा रहा है. जीआईआर की रिपोर्ट के अनुसार, ओएसआईसी ने कहा है कि राज्य के सभी 30 जिलों में मिठाई निर्माता जीआई टैग का उपयोग कर सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ओडिशा रसगुल्ला जगन्नाथ मंदिर के साथ सदियों से जुड़ा हुआ है. मंदिर के अधिकारों के अनुसार, "भगवान जगन्नाथ की ओर से रासगुल्ला भोग को पारंपरिक रूप से देवी लक्ष्मी को अर्पित किया जाता है."

भारत में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर को बासमती चावल की अलग-अलग किस्मों का जीआई टैग मिला है. मध्य प्रदेश के झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गा, कांगड़ा की पेंटिंग, नागपुर को संतरा, कश्मीर को पश्मीना, चंदेरी को साड़ी और दार्जिलिंग को चाय का जीआई टैग मिला है.

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