नेपाल में आई भयानक बाढ़ ने देश के हाइड्रोपावर दांव से जुड़े जोखिमों को पूरी तरह से उजागर कर दिया है. बिजली पैदा करने की क्षमता में आई कमी ने दुनिया के सबसे ज्यादा जोखिम वाले पहाड़ी इलाकों में से एक में रिन्यूएबल एनर्जी के बड़े पैमाने पर विस्तार को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. नेपाल सरकार का कहना है कि कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों की सुरंगों में 100 से ज्यादा मजदूर अभी भी जिंदा फंसे हो सकते हैं, इसमें सबसे ज्यादा कोशिश त्रिशूली-3ए और त्रिशूली-3बी साइटों पर केंद्रित हैं.

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मजदूरों को बचाने के लिए लगातार चलाया जा रहा अभियान

रसुवा जिले के त्रिशूली-3ए में सेना ने शनिवार (29 अगस्त, 2026) की शाम में ड्रिल से सुरंग के ऊपरी हिस्से में छेद किया, हवा पंप की और कैमरे को अंदर भेजा. रात की बारिश और बढ़ते पानी से सुबह काम रुक गया, लेकिन दोपहर तक टीम ने ड्रिलिंग मशीन, एक्स्केवेटर और हाइड्रोलिक कटर से सुरंग का मुहाना खोजने का काम फिर शुरू कर दिया.

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हाइड्रोपावर क्षमता को कितना हुआ नुकसान? 

नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल ढेर अचानक टूटा. इससे भोटेकोशी और त्रिशूली घाटियों में भयंकर बाढ़ आई. कुछ ही मिनटों में नेपाल की 12 प्रतिशत से ज्यादा और 431 मेगावाट का हाइड्रोपावर क्षमता बंद हो गई. कुल 14 परियोजनाएं क्षतिग्रस्त या नष्ट हुईं, जिनमें 6 निर्माणाधीन थीं. निर्माणाधीन परियोजनाओं को मिलाकर, नुकसान लगभग दोगुना हो जाता है.

 

सबसे ज्यादा प्रभावित परियोजनाओं में त्रिशूली-1 (Upper Trishuli-1) शामिल है. यहां सुरंग से 63 भारतीय मजदूरों को निकाला गया, लेकिन 100 से ज्यादा मजदूर अभी भी लापता बताए जा रहे हैं. यह बाढ़ सिर्फ बिजली परियोजनाओं का नुकसान नहीं है. यह एक बड़ी मानवीय त्रासदी भी है. इस त्रासदी में अब तक 768 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं, 2,500 से ज्यादा लोग लापता हैं और 93,000 लोगों को मदद की जरूरत है.

नेपाल किन दो बड़े जोखिमों पर बैठा?

नेपाल ने हिमालय की नदियों पर भारी दांव लगाया है. देश खुद को अक्षय ऊर्जा का बड़ा उत्पादक और निर्यातक बनाना चाहता है. भारत, चीन और अन्य देशों की कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश कर रही हैं, लेकिन यह बाढ़ दिखाती है कि पहाड़ी और जोखिम भरे इलाके में इतनी बड़ी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट कितनी नाजुक हो सकती हैं.

नेपाली शोधकर्ता पुष्पा शर्मा का कहना है कि नेपाल दो बड़े जोखिमों पर बैठा है, इसमें पहला जलवायु परिवर्तन से बढ़ते हिमनद-संबंधी खतरे और दूसरी इन परियोजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता है. हालांकि, नेपाल की हाइड्रोपावर की महत्वाकांक्षा सही दिशा में है, लेकिन इस तरह की आपदाएं उसके आर्थिक भविष्य की कमजोर कड़ी को उजागर कर रही हैं. 

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